Fri. Aug 23rd, 2019

मिलिए बस्तर की कुंती से

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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। कुंती एक आम आदिवासी महिला है। कुंती का गांव बस्तर के बीहड़ जंगलों से भरपूर अबूझमाड़ में है। जहां सड़क-बिजली-पानी का नामोनिशान नहीं है। वहां कुंती रहती है। जहां आज तक सरकार की पहुंच न के बराबर है। आदिवासियों की अनंत कालीन महान संस्कृति की धरोहर बस्तर अभी युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो चुका है, ये उसी युद्ध में पिसती कुंती की कहानी है। जो अपने पति की बेगुनाही का एक आवेदन भी नहीं लिख सकती है।

कुंती बताती है उसने पढ़ाई नही की है । उसकी शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी। जल्दी शादी करने का कारण कुंती नक्सलियों को बताती है । नक्सली संगठन रोजाना उस पर अपने साथ होने का दबाव बनाते थे। कुंती उनके साथ नहीं जाना चाहती थी। जिसके डर के चलते कुंती ने 14 साल की उम्र में शादी कर घर बसा लिया। शादी करने के बाद नक्सलियों ने उस पर दबाव बनाना छोड़ दिया और वो हंसी खुशी अपने पति सास,ससुर के साथ जीने लगी । कुंती के पति किसान हैं । खेती किसानी कर अपना जीवन-यापन करते हैं । 

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कुंती बताती है नक्सल उन्मूलन के नाम पर जब-जब पुलिस गश्त पर आती है आस-पास गांव के पुरुषों को उठा कर ले जाती है । कुंती को नक्सलियों से तो छुटकारा मिल गया लेकिन अब पुलिस का डर सताने लगा । नक्सली भी इन्हीं सब घटनाओं का जिक्र करते उससे जुड़ने के लिए कहते है । कुंती बताती है स्थिति आज यह बन गई है कि गाँव से ज्यादातर नौजवान युवक-युवतियों को पुलिस ने उठा लिया है जो बचते हैं वो गुस्से में नक्सलियों के कहने पर सरकार से बगावत कर लेते हैं । कुंती कहती है वो नक्सली नहीं हैं उनके साथ ऐसी घटनाएं हुईं की वो गुस्से में हथियार उठा लेते हैं। लड़ने वाले लोग हैं वे, पुलिस के आत्याचार के कारण वे हथियार उठाते हैं। कुंती बताती है कि “मेरी जब शादी हुई तब भी यही होता था लेकिन मैंने हथियार नहीं उठाया और घर बसा लिया”।

कुंती बताती है हमारे शादी को 4 साल हो गए हैं और 4 छोटे बच्चे भी हैं जिनमें 2 लड़के 2 लड़कियां हैं । कुंती कहती है हमारी तरफ सुविधा नहीं होने के कारण मेरे बच्चे बहुत कमजोर हैं। कुपोषण के शिकार हैं। जिनका इलाज कराने मैं कभी-कभी ब्लाक मुख्यालय आती हूँ। कुंती आगे बताती है मेरा परिवार हंसी खुशी रह रहा था। मैंने सुना था पुलिस वाले गस्त में आ कर घरो से पुरुषों को ले जाते हैं । लेकिन एक दिन ये हमारे साथ भी होगा ऐसा मैंने नहीं सोचा था। मानसून का पहला पानी गिरा था । खेती बुआई का सीजन आ चुका है । मेरे पति बैल-हल लेकर खेत मे जुताई कर रहे थे। तभी दोपहर अचानक वर्दी में बड़ी-बड़ी बंदूकें पकड़े पुलिस वाले आए और खेत में हल जोत रहे मेरे पति और ससुर को पकड़ लिया। कुंती बताती है पुलिस ने मेरे पति और ससुर को ही नहीं बल्कि आस-पास खेत में अन्य जो ग्रामीण काम कर रहे थे सबको पकड़ लिया । 

मैं उस समय घर में खाना पका रही थी। मेरे पड़ोस की महिला खेत में मौजूद थी। पुलिस वाले पकड़ कर उन्हें ब्लॉक मुख्यालय स्थित कैम्प ले गए। मेरे पड़ोस की महिला ने 30 किमी पैदल चलकर उनका पीछा किया । तब तक हमारे गांव में खबर फैल गई थी कि गांव के पुरुषों को पुलिस उठा कर ले गई है । तब तक पड़ोस की महिला भी वापस आ गई थी उसने कुंती को बताया कि उसके पति और गांव के बाकी लोगों को ब्लाक मुख्यालय ले जाया गया है, जहां एक बस में बैठाया जा रहा था । गांव वाले समझ गए कि उन्हें जिला मुख्यालय ले जाया गया है । कुंती बताती है अब उनके घर में कोई पुरुष नहीं बचा था। खेत में हल के साथ बैल बंधे हुए थे जिसको उसने जा कर खोला और घर ले आयी।

कुंती के घर के साथ पूरे गांव में इस घटना को लेकर सन्नाटा पसरा हुआ था। कुंती बताती है कि उसने जिला मुख्यालय जा कर अपने पति को छुड़ाने का निर्णय लिया। इस निर्णय में बाकी गांव वाले भी साथ हुए और राशन पानी की व्यवस्था कर अपने गांव से जिला मुख्यालय जिसकी दूरी तकरीबन 100 किमी दूर है निकल गए। कुंती कहती है रास्ते में बहुत सारे पुलिस कैम्प पड़ते हैं लेकिन वो सभी जंगल के रास्ते जिला मुख्यालय पहुंच गए। कुंती के साथ उनके चार बच्चे और उनकी सास भी आईं। गांव से लगभग एक दर्जन महिलाएं और 2 से 3 पुरूष आए थे। कुंती कहती है हम सबसे पहले जिला मुख्यालय में स्थित थाना पूछते-पूछते गए। जहाँ जाने के बाद पुलिस के लोग आए और कहा कि उसके पति और गांव के लोगों को छोड़ देंगे। तुम लोग अभी यहीं रहना मुख्यालय में ऐसा बोल कर उसने पति, मेरे ससुर और गांव के अन्य लोगों के आधार कार्ड मांग लिए। कुंती बताती है आधार कार्ड देने के बाद एक पुलिस अधिकारी ने हड़काते हुए कहा कि रोज थाने आना होगा तुम्हारे लोग नक्सलवादी हैं उन्हें सजा दी जाएगी। कुंती कहती है हम और गांव के लोग उन्हें छोड़ने की पुलिस से गुहार लगाते रहे लेकिन पुलिस ने नहीं छोड़ा । 

हम थाने से वापस हो गए और वहीं जिला मुख्यालय के पास एक जगह में खाना पका कर सभी लोग खा के सो गए। मेरे साथ चार छोटे बच्चे भी हैं जिसमें से दो रोज पूछते हैं कि पापा कहां हैं। मैं उनको क्या कहूँ? रोज रोते हैं । कुंती कहती है हम लोग 22 दिनों तक जिला मुख्यालय में हैं । रोज थाने जाते हैं छोड़ने की गुहार लगाते हैं पुलिस वाले भगा देते हैं फिर कहीं रुक जाते हैं सुबह से शाम तक थाने के बाहर ही बैठे रहते हैं । कुंती कहती है जहां हम रुके थे वहां के सूट-बूट पहने व्यक्ति ने बताया कि हमारे लोगों को नक्सली बोल के जेल भेज दिया है पेपर में छपा है। कुंती कहती है उस व्यक्ति ने बताया कि उसके पति तथा ससुर और अन्य लोगों को एक दिन पहले ही पकड़ने की बात छपी है । लेकिन कुंती बताती है 30 दिन से ज्यादा हो गए उसके पति और अन्य गांव के लोगों को पकड़े हुए।

वो कहती है कि मेरे पति जेल में हैं भी कि नहीं उन्हें नही मालूम । वो आशंका जताती है कि कहीं उन्हें मार तो नहीं दिया गया है ? कुंती कहती है हमें क्यों परेशान किया जाता है? हम तो खेती बाड़ी जंगल से अपना जीवन चलाते हैं । कुंती कहती है अब मैं अकेले अपने परिवार को कैसे संभालूंगी ? कुंती आगे कहती है कि जब तक मैं अपने पति को छुड़वा नहीं लूंगी जिला मुख्यालय से नहीं जाऊंगी। कुंती कहती है मैं किसको अपने पति के बेगुनाही का आवेदन दूं? मुझे तो आवेदन लिखने भी नहीं आता। 

ये थी कुंती की कहानी किस तरह से पहले नक्सल फिर पुलिस के बीच वो पिसती रही है, अभी हाल में पुलिस ने ताम-झाम के साथ 16 नक्सली पकड़ने का दावा किया था उन 16 नक्सलियों में से एक कुंती के पति और ससुर भी हैं ऐसे ही बाकी गांव के लोग भी हैं । मै समझता हूं नक्सली कोई पेड़ पर नहीं उगते हैं हमारी पूंजीवादी सरकारें और उनके संरक्षण में लगी पुलिस के अमानवीय तौर-तरीकों ने ही उन्हें हथियार उठा कर लड़ने पर मजबूर किया है।  सरकार ने ही नक्सलवाद और नक्सली पैदा किए हैं।

(तामेश्वर पेशे से पत्रकार हैं और अपनी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।)

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