आदिवासी मुख्यमंत्री के राज में आदिवासी मजदूर नेता पर लगाया गया सीसीए

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झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के जोड़ापोखर हाई स्कूल कॉलोनी निवासी झारखंड कामगार मजदूर यूनियन एवं अखिल भारतीय क्रांतिकारी आदिवासी महासभा के केन्द्रीय अध्यक्ष जॉन मीरन मुंडा पर जिला प्रशासन ने 13 सितम्बर, 2021 को 6 माह के लिए सीसीए लगा दिया है और उन्हें अपने कार्यक्षेत्र झींकपानी व टोंटो थाना क्षेत्र से थानाबदर करते हुए अपने घर से लगभग 102 किलोमीटर दूर जराईकेला थाना में प्रतिदिन 12:30 बजे हाजरी लगाने का आदेश दिया गया है।

पश्चिम सिंहभूम जिला प्रशासन द्वारा आदेश जारी करने के बाद उनकी पत्नी पुष्पा सिंकू 21 सितम्बर से सदर अनुमंडल कार्यालय के सामने 48 घंटे अखिल भारतीय क्रांतिकारी आदिवासी महासभा के साथियों के साथ अनशन पर बैठीं और वहीं से एक मांग पत्र अनुमंडल पदाधिकारी के माध्यम से झारखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भेजीं, जिसमें उन्होंने अपने पति जॉन मीरन मुंडा के ऊपर लगे सीसीए तथा झींकपानी व टोंटो थाने में दर्ज मामलों की सीबीआई से जांच कराने की मांग की।

आदिवासी मजदूर नेता जॉन मीरन मुंडा की पत्नी कहती हैं कि ‘‘पश्चिम सिंहभूम जिला आदिवासी बहुल जिला है और खनिज के मामलों में सम्पन्न है, मगर क्षेत्र के आदिवासियों की स्थिति दयनीय है। आदिवासी समुदाय आजादी के 74 वर्ष बीत जाने के बाद भी लकड़ी, दातुन, पत्ता, हड़िया (लोकल शराब) आदि बेचने को विवश है या फिर आदिवासी आबादी अन्य राज्यों की ओर पलायन करने को विवश है। मेरे पति का सवाल यही है कि धनी जिला के लोग गरीब क्यों? आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए बना 5वीं अनुसूची कानून आजादी के बाद भी अब तक लागू क्यों नहीं हुआ? खान-खदान क्षेत्र में अब तक समता जजमेंट क्यों लागू नहीं हुआ? किसानों के खेतों में अब तक पानी क्यों नहीं पहुंचा? इन्हीं सवालों को लेकर जब मेरे पति जनता को जागरूक कर रहे हैं, तो जिला प्रशासन के द्वारा उनकी आवाज को दबाने के लिए फर्जी सन्हा दर्ज कराने को आधार बनाकर सीसीए की धाराएं लगा दी गयी हैं।’’

पुष्पा सिंकू पूछती हैं कि भारतीय लोकतंत्र में तो शोषण के विरूद्ध आवाज उठाने का अधिकार सबको है, तो फिर शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले मेरे पति को जिला प्रशासन के द्वारा कुख्यात अपराधी की तरह क्यों बदनाम किया जा रहा है?

वे कहती हैं कि अगर मेरे पति कुख्यात अपराधी होते, तो जिले के अन्य थानों में भी उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए था, मगर झींकपानी और टोन्टो थाने में मामला दर्ज कराने के पीछे एसीसी प्रबंधन का हाथ है। क्योंकि एसीसी कम्पनी झींकपानी थाना क्षेत्र में स्थित है और एसीसी सीमेंट बनाने वाला चूना पत्थर टोंटो थाना क्षेत्र के रजंका, दोकट्टा आदि से आता है।

पुष्पा सिंकू कहती हैं कि मेरे पति पर सीसीए लगाने की मुख्य वजह यह है कि एसीसी प्रबंधन को लीज का विस्तारीकरण करना है और एफ-3 ब्लॉक का लीज लेना है। एफ-3 ब्लॉक का लीज लेने में कोई दिक्कत ना हो, इसलिए योजनाबद्ध तरीके से सीसीए की धाराएं लगाकर झींकपानी और टोंटो थाना क्षेत्र से 102 किलोमीटर दूर जराईकेला थाना में प्रतिदिन हाजरी लगाने का आदेश दिया गया है। ताकि एसीसी प्रबंधन आदिवासियों की जमीन को फिर से सस्ते में लूट सके। मेरे पति को परिवार से 102 किलोमीटर दूर जराईकेला थाना में हाजरी लगवाया जा रहा है, जिससे परिवार की माली हालत भी दयनीय हो रही है। मेरे पति को 6 माह परिवार से दूर रखना मेरे परिवार को भूखे मारने की साजिश है।

वहीं आदिवासी मजदूर नेता जॉन मीरन मुंडा कहते हैं कि मुझे झारखंड सरकार और जिला प्रशासन ने स्थानीय झामुमो विधायक दीपक बिरूआ व एसीसी प्रबंधन के इशारे पर गुंडा घोषित कर मेरे ऊपर 6 माह के लिए सीसीए लगाया है। मेरे ऊपर झींकपानी व टोंटो थाना में दर्ज 29 मुकदमे को सीसीए का आधार बनाया गया है, लेकिन मेरे ऊपर ये सारे मुकदमें एसीसी प्रबंधन व स्थानीय प्रशासन ने आंदोलन के कारण ही तो दर्ज किये हैं। सरकार मुझे गुंडा कहती है, जबकि मैं 2009 से रजिस्टर्ड मजदूर संगठन ‘झारखंड कामगार मजदूर यूनियन’ का केन्द्रीय अध्यक्ष हूं, जिसका पंजीयन संख्या 144/07 है। साथ ही 2010 से मैं अखिल भारतीय क्रांतिकारी आदिवासी महासभा का भी केन्द्रीय अध्यक्ष हूं। 2014 के झारखंड विधानसभा के चुनाव में चाईबासा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव भी लड़ा हूं, जिसमें मुझे तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था। 2014 में ही चाईबासा लोकसभा क्षेत्र से फारवर्ड ब्लॉक की तरफ से चुनाव लड़ा था।

वे कहते हैं कि 1991 से लेकर 2014 तक एसीसी सीमेंट कम्पनी ने लगभग 900 करोड़ का अवैध खनन चूना पत्थर का किया, जिसमें 2015 में उच्च न्यायालय के आदेश पर 48 करोड़ का जुर्माना भी भरना पड़ा है। लेकिन सभी आदिवासियों को ना तो नियोजन मिला और ना ही उचित मुआवजा। एफ-2 ब्लॉक के तहत लगभग 280 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था, अब एफ-2 ब्लॉक से खनन संभव नहीं है, इसलिए कम्पनी एफ-3 ब्लॉक के तहत लगभग 100 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करना चाहती है। हमारा सवाल यही है कि पहले एफ-2 ब्लॉक के विस्थापितों को नौकरी और मुआवजा मिले, तभी एफ-3 ब्लॉक के तहत जमीन का अधिग्रहण होने देंगे। इसमें अधिग्रहण क्षेत्र की तमाम जनता हमारे साथ है, लेकिन सत्ताधारी पार्टी झामुमो के विधायक और एसीसी प्रबंधन स्थानीय ग्राम प्रधानों (मानकी, मुंडा) आदि को करोड़ों रूपये देकर आदिवासी जनता की जमीन सस्ते दामों पर लूट लेना चाहती है।

वे बताते हैं कि जब हमारा आंदोलन नौकरी व उचित मुआवजा को लेकर तेज हुआ, तो पिछले महीने यानी अगस्त में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आकर 45 लोगों को नौकरी का भरोसा दिलाया और दो लोगों को नियुक्ति पत्र भी दिया, लेकिन उसमें ‘औपबंधिक नियोजन’ की बात थी और शर्त यह थी कि एफ-3 ब्लॉक में खनन प्रारंभ होने पर उसमें नौकरी मिलेगी और जनता एफ-3 ब्लॉक के लिए जमीन अधिग्रहण में कोई रूकावट नहीं डालेगी।

वे कहते हैं कि ये तो आदिवासी जनता के साथ सरासर अन्याय था, इसलिए हम लोगों ने इसका भी विरोध प्रारंभ किया, इसी विरोध को दबाने के लिए मुझे थानाबदर करते हुए 102 किलोमीटर दूर थाना में हाजरी लगाने बोला गया है।

आदिवासी मजदूर नेता जॉन मीरन मुंडा बताते हैं कि उन्होंने जराईकेला थाने से लगभग 30 किलोमीटर दूर आनंदपुर में किराये पर कमरा ले लिया है और वहीं से रोज हाजरी लगाने आते हैं। वे कहते हैं कि मुझे प्रतिदिन 4 घंटे थाने में रोका जाता है, जबकि सीसीए वाले ऑर्डर में ऐसा कहीं दर्ज नहीं है। विरोध करने पर थाना प्रभारी ने कहा कि ऊपर से आदेश है।

वे बताते हैं कि मेरे ऊपर तीन बार सीसीए लगाया गया है। पहली बार 2013 में लगाया गया था और साल भर के लिए जेल में बंद कर दिया गया था, उस समय भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ही थे। दूसरी बार 2018 में सीसीए लगाया गया और 6 महीने तक कोर्ट में 14 दिन के अंतराल पर हाजिर होना होता था, उस समय मुख्यमंत्री भाजपा के रघुवर दास थे। और तीसरी बार अभी लगाया गया है।

वे बताते हैं कि वे अब तक 10 बार जेल जा चुके हैं, जिसमें लगभग साढ़े तीन साल तक जेल में रहे हैं।

39 वर्षीय आदिवासी मजदूर नेता जॉन मीरन मुंडा कहते हैं कि अगर आदिवासियों व मजदूरों के लिए उन्हें हजारों बार भी जेल जाना पड़े, तो वे पीछे नहीं हटेंगे बल्कि और भी ताकत के साथ मजदूरों की आवाज को बुलन्द करते रहेंगे।

उनसे यह पूछने पर कि अब आप क्या करेंगे? वे कहते हैं कि सीसीए को जल्द ही उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे और आंदोलनात्मक कार्रवाई में 27 सितम्बर के भारत बंद में अपनी मांगों को जोड़ते हुए सड़क पर उतरेंगे।

उनसे यह पूछने पर कि क्या अब तक किसी भी ट्रेड यूनियन ने आप पर लगाए गये सीसीए का विरोध किया है? वे बताते हैं कि यही हमारे लिए अफसोसजनक है कि किसी भी ट्रेड यूनियन के किसी भी नेता ने मुझे अब तक फोन तक नहीं किया, चाहे वामपंथी ट्रेड यूनियन ही क्यों ना हो।  

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहते हैं।)

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