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फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट:दंतेवाड़ा के फुलपाड में माओवादियों ने की आदिवासियों की बेरहमी से पिटाई

विशद कुमार/ तामेश्वर

समाज सेवी सोनी सोरी, लिंगाराम कोडोपी, बेला भाटिया, ज्यां द्रेज़ की एक फैक्ट-फाइंडिंग जांच टीम ने 17 सितम्बर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया है कि ”कुछ दिनों पहले एक खबर आई थी कि फुलपाड गांव में माओवादियों ने गांव वालों की पिटाई की है। हम लोग इस खबर का सत्यापन करने के लिए 15 सितम्बर को फुलपाड गए।”

फैक्ट-फाइंडिंग जांच टीम के अनुसार टीम के सदस्यों के आग्रह पर गांव की अनके महिलाएं एवं पुरुष एक स्कूल के पास जमा हुए और घटना के बारे में जानकारी दी। इकट्ठे हुए लोगों में सभी साधारण किसान परिवार के थे। उनके बयान के अनुसार 5 सितम्बर की रात तीन बजे के करीब कई माओवादी कार्यकर्ता (जिनमें से एक-दो को छोड़कर अधिकतर सादा ड्रेस वाले थे) फुलपाड के कोयलानपारा और मारकापारा पहुंचे। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को उठाया और कहा कि, “सब को जमा होना है”। गांव के सभी महिला परुष और बच्चे इकट्ठे हुए ।

उसी बीच कुछ पुरुषों को अलग ले जाया गया। उनमें से कुछ के हाथों को पीठ के पीछे बांध दिया गया था। कच्चे बांस के डंडे से उनकी पिटाई की गई। इस क्रम में जब एक युवक की मां ने उनको कहा कि “मेरे बेटे को जो कुछ भी करना है जनता के सामने करो” तो उसकी व उसके पति की भी पिटाई की गई। इस तरह कुल 9 लोगों की पिटाई की गई, जिनमें से 8 कोयलानपारा के थे।

विज्ञप्ति के अनुसार जांच टीम को कुछ पीड़ितों ने पिटाई के निशान दिखाए, जो दस दिनों के बाद भी उनकी पीठ और टागों पर साफ़ दिख रहे थे। एक पुरुष जिसकी सब से ज्यादा पिटाई की गई थी, वह दंतेवाड़ा हॉस्पिटल में भर्ती है। उससे जांच टीम शाम को मिली तब उसने बताया कि “मुझे ज़मीन पर लिटाया गया, एक भारी व्यक्ति मेरे पीठ पर बैठ गया। फिर कच्ची लकड़ी से पैरों के तलवों पर पीटा गया।”

वह बहुत डरा हुआ था, क्योंकि पीटने के बाद माओवादियों ने उसे हॉस्पिटल जाने से मना किया था। लेकिन घटना के बाद पुलिस को जब जानकारी मिली तो वह गांव में आई थी और घायल लोगों को ढूंढ रही थी। बाकी लोग पुलिस पहुंचने के पहले भाग गये थे। लेकिन यह आदमी गंभीर रूप से जख्मी होने के कारण नहीं भाग पाया था। अब उसको डर लग रहा है की माओवादी लोग उसको पुन: मारेंगे।

माओवादियों द्वारा ऐसी घटना को अंजाम देने के कारणों पर विज्ञप्ति में बताया गया है कि मारने के कारण को समझना आसान नहीं है, लेकिन लोगों के बयान से यह लग रहा है कि माओवादी उनसे इसलिए नाराज़ थे क्योंकि गांव वाले सरकार से संपर्क करने लगे थे। उदाहरण के लिए कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री आवास योजना के पैसे से घर बनाया है। कुछ लोग गांव का संपर्क मार्ग बनवाने में शामिल हैं। कुछ लोग क्रिकेट सम्बंधित गतिविधियों में शामिल हुए हैं, जो किसी स्थानीय सरकारी कर्मचारी ने आयोजित की थी (यह कर्मचारी भाजपा का नेता भी है)।

शायद माओवादियों की एक शिकायत यह भी थी कि सीआरपीएफ जवान कभी कभी गांव आते हैं (फुलपाड से करीब 4 किलोमीटर दूर एक सीआरपीएफ कैंप है)। इससे उनका शक बढ़ रहा है कि गांव वाले किनके साथ हैं? – हमारे साथ या सरकार के साथ? इस घटना से गांव वाले कफी चिंतित हैं, क्योंकि माओवादियों ने उनको गांव छोड़ कर शहर में रहने को कहा है। फसल काटने को भी मना किया है। गांव वालों ने जांच टीम को बताया कि उन्होंने उसी दिन जवाब दे दिया था कि ”हम लोग गांव नहीं छोड़ेंगे।” जांच टीम के सामने भी लोगों ने यही दोहराया कि वे लोग गांव में ही रहेंगे।

फैक्ट-फाइंडिंग जांच टीम के सदस्यों ने अपने प्रेस बयान में बताया है कि ”यह घटना साधारण लोगों पर उत्पीड़न और अत्याचार का मामला है। दुख की बात है कि बस्तर में इस तरह की घटना अनोखी नहीं है। इस तरह के पीड़ित लोगों की सब से बड़ी दिक्कत यह है की वे कहां जाएं और किनके के सामने शिकायत करें? उनको संवेदनशीलता से मदद करने के बदले सरकार ने कई बार इस तरह की स्थिति का फ़ायदा उठाने की कोशिश की हैं जिसके कारण लोगों के खतरा बढ़ जाता है। हमारी आशा है कि सरकार इस बार ऐसा नहीं करेगी और माओवादियों से हमारी मांग है कि वे इस तरह की घटना को नहीं दोहराएंगे और फुलपाड के लोगों को अपनी इच्छा अनसुार जीने की आज़ादी देंगे”।

जाहिर है उक्त घटना की विश्वसनीयता पर फैक्ट-फाइंडिंग जांच टीम की रिपोर्ट के बाद संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बचती है, मगर घटना के तरीकों पर कई सवाल खड़े होते हैं। एक महिला द्वारा उसके बेटे की पिटाई के क्रम में कहा जाता है कि “मेरे बेटे को जो कुछ भी करना है जनता के सामने करो” तो उसकी व उसके पति की भी पिटाई की गई। जबकि माओवादी इस तरह दंड जन अदालत लगाकर करते हैं, जिसे वह महिला जानती थी और इसी जानकारी के आधार पर शायद उसने अपने बेटे की पिटाई का विरोध किया होगा। तब सवाल उठता है कि क्या माओवादी अपने तरीके बदल रहे हैं या उनके नाम पर कोई दूसरे तत्व ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इस सवाल का जवाब तो माओवादी ही दे सकते हैं। अगर उन्होंने इसे अंजाम दिया है तो ऐसा करने के कारणों को सामने रखते हुए इसे स्वीकार करें।

This post was last modified on December 3, 2018 8:26 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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