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ये शर्मिंदगी ही मेरा हासिल है

धीरे धीरे वापस उसी बेफिक्र रोज़मर्रा की ज़िंदगी, अड्डेबाजी और प्रोग्राम्स में लौटने की कोशिश है। पर जैसे बहुत कुछ बदल गया है। बहुत समर्थन और प्यार मिला मगर आम और सरकार से संबद्ध लोगों में, बिज़नेस से जुड़े लोगों में जैसे एक हिचकता डर सा दिखा, समझने की कोशिश कर रहा हूं और ये वायदा भी… कि ये सत्ता बस दो साल और है…।

दिन-दिन भर दोस्तों से शुभचिंतकों से मुलाकातें आश्वस्ति दे रही हैं। वहीं देश-विदेश के मीडिया के सवाल-जवाब, कितने ही नेशनल-इंटरनैशनल ट्रिब्यूनल्स, फैक्ट फाइंडिंग टीम्स, थोड़ा एकरसता भी भर रही है। अब इससे तुरंत निकलना है…।

अब सुनिए, सच कहूं तो ये फूल-मालाओं-मिठाई आदि का ज़रा अंदाजा नहीं था। मैं तो जेल को, उसकी सादगी, उसके अनुशासन और उसके अजनबीपन को मिस कर रहा हूं…।

मुझसे मुझ पर हुए टार्चर के डिटेल्स पूछे जाते हैं और ये भी मैं अब उनके खिलाफ क्या करूंगा… रूटीन सवाल थे तो रूटीन ही जवाब दिए… मैं क्या करूंगा वो शायद एक रूटीन होगा। ये दुनिया ही एक रूटीन सी दुनिया है मगर… (ब्रेष्ट याद आते हैं और उनका मशहूर नाटक “एक्सेप्शन्स एन्ड रूल”, अभी जब तन्हाई में सोच रहा हूं तो लगता है इस दुनिया को बदलना है तो इसे प्रयोगों से अपवादों से भर देना होगा।

मुझे मेरे शरीर को सुजा देने वाले अधिकारी से ज़रा भी शिकायत नहीं महसूस हो रही है। न ही उस सर्वोच्च अधिकारी से जिसने मुझे दुबारा पिटवाने के बाद कम्युनिस्ट कहा…। मेरा मन उनसे मुस्कुराते हुए मिलने का है, उनसे बात करने का है, मैं उन्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहता… बल्कि उनकी बेवजह की नफरत को चाय पीते-पिलाते हुए, बात करते हुए, किस्से-कविता सुनाते हुए बदल देना चाहता हूं…।

ये शहर मेरी मुहब्बत है, मेरा कॉन्फिडेंस है, सचमुच मैं शॉक्ड था जब तख्ती पकड़ा कर मेरी तस्वीर खींची गई, यहां के हर कॉलेज-यूनिवर्सटी में, संस्थानों में बोला हूं, सम्मानित हुआ हूं, स्तब्ध था जब जिन अखबारों ने खबरें नहीं मेरे दर्जनों तो वाक़ये, इंटरव्यू, संस्मरण छापे। आज वो सब जानते हुए भी मुझे साजिश, सरगना, दबोचा, अभियुक्त या रसूखदार जैसे विशेषण दे रहे थे…. मगर फिर भी जाने दो यार…. उन पत्रकारों, संपादकों से भी मिलने का मन है कि क्या सिर्फ पुलिस की ब्रीफिंग ही होती है… क्या कोई दूसरा पक्ष नहीं होता?

हालांकि कुछ लोग सच्चा जर्नलिज़्म लेकर आये और जूझ गए।

मैं गांधी नहीं हूं, न भगत सिंह, न चेग्वेरा, न नक्सल और न कॉम्युनिस्ट…, इनमें से कुछ भी होने की मेरी हैसियत नहीं…। कम्युनिज़्म पसंद करता रहा, मगर मेरे जैसे मध्यवर्गीय की क्षमता से बाहर है कम्युनिस्ट जैसा जी पाना…,

लेकिन मैं इतना भर मनुष्य ज़रूर हूं कि जब अधिकारी स्त्रियों और बच्चियों को उद्बोधित करते हुए गालियां दे रहे थे तो मैं शर्मिंदा था… जब मुसलमान बच्चों ने बताया कि उन्हें कटुए कह के थूक चटाया गया तो मैं शर्मिंदा था… जब मज़हबी दाढ़ियों को नोचा गया… तो मैं शर्मिंदा था… और दुनिया में कहीं भी किसी जगह किसी के खिलाफ ऐसा हुआ तो मैं होता हूं….।

ये शर्मिंदगी ही मेरा हासिल है… और मैं इस पर ज़रा भी शर्मिंदा नहीं….।

और जेल! तो हुज़ूर जेल बहुत कुछ सिखाती है अगर ऐसी ही हो जहां मैं गया था… सिर्फ समानता और अनुशासन ही नहीं. आप जेल से सेक्युलरिज़्म सीख सकते हैं…, वज़न कम करने की तो जन्नत है… यहां बमुश्किल कोई मोटा होता है।

मेरा बिस्तर बिल्कुल सेंटर में लगवाया गया था। मेरे एक तरफ नमाज़ होती थी तो दूसरी तरफ प्रार्थना और पूजापाठ के लिए दीवार पर चित्रों से बना मंदिर। 70 लोगों से भरी बैरक में चार लोग देर रात नमाज़ पढ़ते तो जाड़ों में भी वहां सो रहे लोग बिना झिझक अपना बिस्तर छोड़ देते। पूजा और नमाज़ वाले खुद कभी किसी से नहीं कहते…. पर उन पर नज़र पड़ते ही कोई भी सबको डांट कर, गाली देकर टीवी की आवाज़ या शोर शराबा बंद करा देता। नमाज़ के पक्ष में हिन्दू ही दूसरे मुसलमानों को डांट-गाली देकर चुप करा सकता था और इससे उलट पूजा में कोई मुसलमान…।

जात-धर्म भूल के एक ही बर्तनों में अलग अलग झुंड चटनी के भरोसे ‘खाना उठाते’, जी वहां खाते नहीं उठाते हैं, जो बिना चटनी के मुश्किल होता था। एक दूसरे के कंबलों में घुस कर जाड़ा काटते, आपस में लड़ते… गालियां देकर फिर खुद ही गले लगाते लोग…। मुझे नहीं मालूम कौन किस अपराध में आया मगर… मस्त थी दुनिया।

मैंने दिन में दस-दस किलोमीटर वॉक किया। योगा, एरोबिक्स सब किया। मैं बिल्कुल जमे हुए काले सख्त खून की मोटी परत और धारियां लिए जेल गया था। पर मैं चाहता था मैं जब भी निकलूं वो सारे निशान मिट जाएं और मैं उस पुलिस अधिकारी से हंसते हुए कह सकूं (चिढ़ाते हुये नहीं) कि देखो पिटाइयां कभी नहीं टिकतीं… (लो नरेश सक्सेना की कविता पानी और पत्थर याद आ गई, अरे कल उनका जन्मदिन भी होगा)।

कई मज़ेदार किस्से हैं। अपने जेएनयू की बहादुर आइशी घोष से लेकर कन्हैया, मोहित पांडेय, शहला, विजु, बट्टी लाल बैरवा सबको बताना चाहता हूं कि जेएनयू पर हुए हमले के बाद जो विरोध हुए उसे सब क़ैदी देख रहे थे और बच्चों के साथ थे। उन्हें समझ आ रहा था कुछ गलत हो रहा है।

अचानक मैंने एक लंबी सज़ा काट रहे कैदी से पूछा… क्यों गब्बर! कुछ समझ में आ रहा है? क्या हो रहा है कि बेकार भाजपा को गरिया रहे हो…। तो बोला अरे वो सीधे-साधे ‘जैनियों’ को परेशान करते रहते हैं। मुख्तसर में ये कि वो जेएनयू को सुन सुन के समझता था।

गिरफ्तारी वाले दिन मैं शॉक्ड था। बस चुप रहा दिन भर। उन 38 युवाओं को संभालने की ज़िम्मेदारी भी थी जो दहशत-चोट-भूख प्यास से बिलख रहे थे। जाते-जाते मुझ पर आखिरी टिप्पणी उस IPS ऑफिसर की थी कि ‘ये कॉम्युनिस्ट’ है….।

रात 10 बजे जब मैं अपनी बैरक पहुंचा तो सींकचों पर दो लोग खड़े थे। उम्मीद से अलग उनमें से एक नौजवान ने कहा… भैया आप या तो पत्रकार हैं या शक़्ल से कम्युनिस्ट लगते हैं… और मैं दिन में पहली बार मुस्कुरा दिया… कि यहां भी।

आते समय जेल ने मुझे ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ तैयार करके, सुना के विदा किया। सुबह निकलते वक्त कोयले से दीवार पर मैंने कोई शेर और ‘वो सुबह कभी तो आएगी… वो सुबह हमीं से आएगी’ लिखा और पीछे देखा तो 450 क़ैदी खड़े हाथ हिला रहे थे….। मैं इतना शर्मिंदा हुआ कि जैसे बेवफाई कर रहा हूं और बोला… अरे अभी हफ्ते दो हफ्ते में लौट कर आता हूं।

बाहर जैसे करवटें लेता हुआ देश है। शाहीन बाग की औरतों से लेकर गांव-गांव, कस्बे-कस्बे गूंजते गीत-जुलूस, IIT-IIM से लेकर मुबई, कानपुर, मऊ, हर तरफ… अंबेडकर, गांधी और भगत सिंह की विरासत बढ़ाते लोग… फ़ैज़ को गाते लोग…।

हम किसी को हराएंगे नहीं,
मगर नफरत को जीतने नहीं देंगे
हम बदला नहीं लेना चाहते
बदलाव चाहते हैं

दीपक कबीर
(लेखक संस्कृतिकर्मी हैं और नागरिकता कानून का विरोध करने पर उन्हेें हाल में जेल भेज दिया गया था।)

This post was last modified on January 16, 2020 10:12 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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