देश में घृणा का बाजार, नफरत फैलाने वालों में प्रधानमंत्री तक शामिल-एप्सो

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इंदौर। अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) का 15 वां राज्य सम्मेलन इंदौर में संपन्न हुआ। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए अनेक प्रतिनिधियों ने घर, परिवार, चौपाल से लेकर विश्व में शांति के प्रयासों पर चिंतन- मनन किया। सम्मेलन में भारत में निरंतर बढ़ रही फासीवादी प्रवृत्तियों के प्रतिरोध हेतु संयुक्त पहल के लिए एप्सो से अनुरोध किया गया। सम्मेलन में अनेक प्रस्ताव पारित किए गए नई कार्यकारिणी का गठन भी हुआ। वक्ताओं ने गांधीजी की शहादत के 75 वर्ष पर शासन की चुप्पी पर सवाल उठाए।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व सांसद समाजवादी नेता कल्याण जैन ने नफरत भरे माहौल में शांति के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि विश्व की बहुसंख्यक आबादी अमन चाहती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश राष्ट्रों के बीच विवादों को बढ़ावा देते हैं और हथियारों के व्यापार के माध्यम से मुनाफा कमाते हैं।

दुनिया में वर्ण भेद, रंगभेद, भाषा, जाति के नाम पर भी विवाद हैं। हर तरह के अन्याय के खिलाफ अहिंसक लड़ाई की जरूरत है। देश में घृणा का बाजार लगा है, नफरत फैलाने वालों में प्रधानमंत्री तक शामिल हैं। दुनिया की समस्याओं का कारण आर्थिक असमानता है। देश में एक प्रतिशत आबादी के पास देश की आधी संपत्ति है। यही समस्याओं का मूल है।

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अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन का राज्य सम्मेलन

अनूपपुर से आए विजेंद्र सोनी ने कहा कि व्यक्ति और समाज देश में शांति चाहते हैं। उन कारणों पर विचार करने की जरूरत है जिनके कारण अशांति पैदा होती है। राजनीति जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में राजनीतिक दृष्टि होना चाहिए। न्याय की आकांक्षा सदैव रही है। इसे प्रोत्साहित किये जाने की जरूरत है। देश में हिंसक प्रतीकों को माध्यम बनाकर डर फैलाया जा रहा है। पौराणिक कथाओं में से करुणा, दया,आपसी भाईचारे, प्रेम प्रसंगो के स्थान पर, उन घटनाओं को तरजीह दी जा रही है जो हिंसा के लिए उकसाते हैं। देश का मध्य वर्ग शांति का पक्षधर है। उसे अपने साथ जोड़ा जाना चाहिए।

भोपाल के प्रतिनिधि शैलेंद्र शैली ने अपने संबोधन में फासीवाद के प्रतिरोध हेतु व्यापक मोर्चा बनाने पर बल दिया। उन्होंने आग्रह किया कि एप्सो को इस हेतु पहल करना चाहिए। शैली ने कहां कि संगठन का फलक व्यापक है। विभिन्न मुद्दों के आधार पर कार्यकर्ताओं के लिए वैचारिक शिविर लगाने चाहिए। उन्होंने कहा कि संगठन को जन विरोधी गतिविधियों और नफरत की राजनीति का विरोध करना चाहिए।

पर्यावरणविद अरुण डीके ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म का सही विश्लेषण किया था। उसी को आगे बढ़ाकर महात्मा गांधी ने धर्म के मर्म से परिचय करवाया। गांधी की मशाल को विनोबा भावे आगे ले गए। जब तक देशवासी अन्य प्रादेशिक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त नहीं करेंगे तब तक भारत एकजुट नहीं रह सकता।

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राज्य सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधि

गांधीवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी के अनुसार वर्तमान में शांति आंदोलन की सर्वाधिक आवश्यकता है। इस हेतु एप्सो संगठन और उसके विचारों को विस्तारित करने की जरूरत है। देश में राजनीति पर बात ही नहीं की जाती है। जबकि खयालात ही हालात को बदलते हैं। देश में स्वतंत्र चिंतन को समाप्त करने के प्रयास हो रहे हैं। नागरिकों को रोबोट बनाया जा रहा है, उन्हें डराया जा रहा है। डराने वालों से डरने की जरूरत नहीं है। हमारी विरासत कायरता की नहीं शहादत की रही है।

देश में दंगा करने के लिए अनुमति की जरूरत नहीं होती लेकिन प्रेम विवाह के लिए अनुमति जरूरी है। प्रेम पर पहरा बिठा दिया गया है और नफरत सरेआम घूम रही है। वर्तमान पीढ़ी संचार साधनों और तकनीक के अनुरूप अपना जीवन गढ़ रही है। कॉरपोरेट संस्कृति पर विचार होना चाहिए। राज्य नाम की संस्था विलुप्त होती जा रही है अब राज्य का संचालन कारपोरेट कर रहे हैं। टेलीविजन और मोबाइल कंपनियों के बहिष्कार की जरूरत है।

संगठन के महासचिव अरविंद पोरवाल ने अपने प्रतिवेदन में विगत सम्मेलन पश्चात संगठन की गतिविधियों एवं आय-व्यय की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नव-उपनिवेशवाद ने स्थाई शांति की उम्मीद को धाराशाही कर दिया है। दुनिया में असमानता, बेरोजगारी और गरीबी में अभूतपूर्व वृद्धि के चलते उत्पीड़ित लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में भिन्न-भिन्न स्वरूपों में पूंजीवादी, फासीवादी सत्ता को चुनौती दी जा रही है। शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) मानव जाति की प्रगति और कल्याण में विश्वास करता है। देश में धर्मनिरपेक्ष विचारों की रक्षा की चुनौती है जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए। सम्मेलन में विगत वर्षों में दिवंगत हो चुके संगठन के पदाधिकारियों, सदस्यों, लेखकों, रंग कर्मियों, साहित्यकारों, चित्रकारों की सेवाओं का स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई ।

सम्मेलन में महात्मा गांधी की शहादत के 75 वर्ष पूरे होने पर उनकी शिक्षाओं को याद करते हुए विश्व शांति हेतु अनेक प्रस्ताव स्वीकार किए। फिलिस्तीन के नागरिकों द्वारा स्वतंत्रता एवं संप्रभु राष्ट्र की स्थापना हेतु चलाए जा रहे संघर्ष का समर्थन, यूक्रेन युद्ध और नाटो के विस्तार योजना का विरोध, ब्राजील में लोकतंत्र पर हमले की निंदा, लेटिन अमेरिका में साम्राज्यवादी दखल, यूरोप में ताकतवर होते दक्षिण पंथ, आर्थिक असमानता, भारत की विदेश नीति, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, सांप्रदायिक हमलों के विरोध पर तथा जलवायु संरक्षण पर प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित किए गए।

सभा पटल पर एक प्रस्ताव रख गया और इस पर कई लोगों ने अपने विचार रखे। भारत सिंह ठाकुर ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, रामदेव सायडीवाल ने रोजगार, रूद्र पाल यादव ने संविधान बचाने, भोपाल के जेपी दुबे ने युवाओं तक अपनी बात पहुंचाने, चुन्नीलाल वाधवानी ने देश के संघीय ढांचे पर हो रहे हमले पर चिंता व्यक्त की। सम्मेलन में सुशीला शिल्पी, सुषमा कौशल ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर नई राज्य कार्यकारिणी का गठन किया गया।

(इंदौर से हरनाम सिंह की रिपोर्ट।)

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