Sun. Sep 15th, 2019

लोगों के स्वाद में मिठास घोलने वाले गन्ना किसानों की दीवाली रहेगी फीकी

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चरण सिंह

नई दिल्ली। दीवाली के त्योहार में गरीब लोग भी खरीदारी कर रहे हैं। विडंबना देखिये कि जो किसान रात-दिन मेहनत कर गन्ना पैदा करता है। दीवाली में मिठास घोलता है। उसकी दीवाली इस बार फीकी रहेगी। किसानों के जिस गन्ने से मिठाइयां बनती हैं। उसका स्वाद गन्ना किसानों और उनके बच्चों को नहीं नसीब होगा। वजह साफ है। क्योंकि गन्ना किसानों के पिछले साल के बकाए का भी भुगतान नहीं हो पाया है। कुछ चीनी मिलों की पेराई शुरू करवाने को ही योगी सरकार भुगतान की भरपाई मान बैठी है। पहले छोटे किसान क्रेशरों पर गन्ना डालकर त्योहार की व्यवस्था कर लेते थे। इस साल वह भी नहीं चले हैं।

गन्ने पर निर्भर रहने वाले उत्तर प्रदेश के किसानों का साढ़े बारह हजार करोड़ रुपया मिलों पर बकाया है। यह स्थिति तब है जब कुछ माह पहले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ हजार करोड़ रुपए का पैकेज देने के साथ ही गन्ना किसानों से वार्ता कर उन्हें उनके बकाए के भुगतान का आश्वासन दिया था। केंद्रीय खाद्य मंत्री राम विलास पासवान ने बकाया भुगतान करने के लिए एक फंड बनाने की बात कही थी। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो किसानों को बेवकूफ बनाना अपना अधिकार समझते हैं। उन्होंने तो इन बड़े नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया।

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गन्ना किसानों की पीड़ा समझने के बजाय वो उनका मजाक बनाने लगे। गत दिनों बागपत में एक सड़क उद्‌घाटन के कार्यक्रम में उन्होंने गन्ना किसानों को गन्ने के अलावा दूसरी फसलें उगाने की नसीहत दे डाली। उन्होंने इसके पीछे जो तर्क दिया वह भी शर्मनाक था। योगी ने कहा कि शुगर के कारण लोग बीमार हो जाते हैं और उन्हें डायबिटीज हो जाती है। सूबे के मुख्यमंत्री ने 15 अक्तूबर तक चीनी मिलों से बकाया भुगतान कराने की बात कही थी। लेकिन वो 15 अक्तूबर कब का बीत गया। लेकिन उस दिशा में शुरुआत भर नहीं हुई।

लेकिन किसान भी कहां चुप बैठने वाले हैं। उन्होंने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दीवाली से पहले भुगतान न होने पर भारतीय किसान यूनियन ने कहा है कि गन्ना किसान डीएम कार्यालयों में जाकर अपना गन्ना डाल आएंगे। यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सवालिया लहजे में कहा कि मिलों पर गन्ना हम क्यों डालें जब सरकार ने अभी तक पिछले साल के गन्ने का भुगतान भी नहीं किया है? 

उनका कहना था कि सरकारें मिल मालिकों को तो सहायता दे रही हैं लेकिन किसानों के बकाया गन्ना भुगतान की उनको कोई चिंता नहीं है। गन्ने का भुगतान न होने पर भाकियू (भानू) भी आंदोलित है। संगठन ने मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिव (गन्ना) को पत्र भेजकर दीपावाली से पूर्व गन्ने का भुगतान कराने की मांग की थी। भाकियू भानु के नेता अमित प्रधान ने कहा कि चीनी मिलें चलने की बातें की जा रही हैं पर पिछले वर्ष का भुगतान नहीं हो रहा है। उनका कहना था कि इन परिस्थितियों में किसान दीवाली कैसे मनाएंगे।

सूबे का पश्चिमी हिस्सा अपने गन्ने की खेती और पैदाइश के लिए ही जाना जाता है। और आय का प्रमुख स्रोत होने के नाते किसानों के बेटों की पढ़ाई से लेकर शादी और स्वास्थ्य से लेकर त्योहार सब उसी की आय पर निर्भर होते हैं। विडंबना यह है कि किसान कर्ज लेकर गन्ने की फसल तैयार करता है और फिर उसे चीनी मिलों पर डाल आता है। और फिर भुगतान के लिए सालों साल इंतजार करना पड़ता है। और फिर उसके खिलाफ आंदोलन करने पर उसे लाठियां खानी पड़ती हैं। 

अजब व्यवस्था यह है कि गन्ना किसानों को कर्जे का ब्याज न चुकता करने पर जेल जाना पड़ता है जबकि सरकार कारपोरेट के लाखों करोड़ कर्जे को एक कलम से माफ कर दे रही है। उनकी जमीन की आरसी काट दी जाती है। जबकि चीनी मिलें कई-कई सालों तक किसानों का भुगतान नहीं करती हैं। लेकिन सरकार उनका कुछ नहीं कर पाती। उल्टे चीनी मिल मालिक गन्ने के भुगतान का दबाव बनाकर सरकार से ब्याज मुक्त कर्जा ले लेते हैं। ऊपर से उन पैसों को किसानों को देने की जगह अपने दूसरे कामों में लगा देते हैं। सरकारें हैं कि न तो गन्ना भुगतान के लिए दबाव बनाती हैं और न ही उन पैसों का हिसाब पूछती हैं।

चीनी के कटोरे के रूप में जाने जाना वाला यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से भी बहुत अहमियत रखता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश की 14 लोकसभा की 71 विस सीटों पर गन्ना किसानों की तादाद सर्वाधिक है। गत लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस क्षेत्र की सभी सीटें जीती थी। सैनी, कश्यप, गुर्जर, जाट, कोरी, जोगी, बिंद, प्रजापति समेत 30 ओबीसी जातियों ने इस जीत में अहम भूमिका निभाई थी । आज की तारीख में गन्ना किसानों के साथ ही युवाओं व किसानों में सुलगती नाराजगी, विपक्ष की घेराबंदी, भाजपा का अंदरूनी घमासान और मुस्लिम-दलित मतों का एक साथ आना भगवा खेमे के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।

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