बंधुआ जिंदगी से आजाद होकर 30 सालों बाद अपने परिजनों से मिले फुचा महली

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झारखंड के गुमला जिले का फोरी गांव 3 सितंबर को एक अद्भुत मौके का गवाह बना जब वहां के रहने वाले 60 वर्षीय फुचा महली (आदिवासी) 30 वर्षों बाद अपने परिजनों से मिले। बताया जा रहा है कि वह 30 वर्षों से अंडमान निकोबार में फंसे हुए थे। फुचा और उनके परिजनों के लिए यह बेहद भावुक क्षण था उनकी पत्नी लुंदी देवी की आंखों से आंसू था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।  

बताते चलें कि फुचा महली 30 साल पहले काम की तलाश में अंडमान गए थे, परंतु वहां फंस गये थे। वे वहां पैसा कमाने गए थे, ताकि अपने परिवार को बेहतर सुविधाएं मुहैया करा सकें। अचानक कंपनी बंद हो गई। खाने के लाले तक पड़ गए। घर का रास्ता तो पता था, लेकिन किराए के लिए पैसा कहां से लाते। न जाने कितनों से गुहार लगायी, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। कई दिन और रातें भूखे गुजारनी पड़ीं। लोगों के लिए लकड़ी चीरते थे, तब वे खाना देते थे। खाने के लिए लोगों के घरों में नौकर बनकर उनकी गाय को खिलाने, चराने का काम किए, तब किसी तरह दो टाइम का खाना मिलता था।

इस तरह से कहा जा सकता है कि फुचा बंधुवा मजदूर की तरह रह रहे थे। कुछ दिन पहले इसकी जानकारी गुमला के पत्रकार दुर्जय पासवान को हुई जो प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ हैं, उन्होंने इसे गंभीरता से लिया। समाचार छपने के बाद सरकार हरकत में आयी। इसके बाद फुचा महली को अंडमान निकोबार से 3 सितंबर को झारखंड लाया गया। रांची पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से फुचा महली व उनके परिवार के लोगों ने मुलाकात की। इस मौके पर फुचा महली ने सरकार का आभार प्रकट किया। जिसकी पहल से उन्हें 30 वर्ष बाद अंडमान निकोबार से वापस लाया गया।

फुचा महली का उनके परिजनों से मिलने का यह मौका दोनों पक्षों के लिए बेहद भावुक था। उनकी आंखें लगातार पनीली बनी हुई थीं और पत्नी लुंदी देवी की तो मानो उजड़ी दुनिया फिर से बस गयी। उन्होंने इस खुशी को छिपाया भी नहीं पैर छूकर उन्होंने पति का आशीर्वाद हासिल किया। उसके बाद पैर धोकर फुचा महली का गृह प्रवेश कराया गया। बेटा रंथु महली, सिकंदर महली भी 30 वर्ष बाद अपने पिता को देखकर भावुक हो गये और उनसे लिपट गये। घर का बड़ा ही भावुक माहौल बन गया। गांव के लोग भी फुचा महली को देखने के लिए उमड़ पड़े। 

गुमला के श्रम अधीक्षक एतवारी महतो ने बताया कि पत्रकार दुर्जय पासवान द्वारा सबसे पहले पहल किया गया। फुचा महली को अंडमान निकोबार से वापस लाने की मांग की थी। इस मामले को प्रवासी नियंत्रण कक्ष में दर्ज किया गया। प्रवासी नियंत्रण कक्ष ने “शुभ संदेश फाउंडेशन” से संपर्क किया और फुचा महली को अंडमान निकोबार से लाने की जिम्मेवारी सौंपी। इसके बाद अंडमान निकोबार के उत्तर नॉर्थ के उपायुक्त से संपर्क किया गया। फुचा महली के पते की जांच करायी गयी। फिर “शुभ संदेश फाउंडेशन” के लोग अंडमान निकोबार जाकर फुचा महली को 3 सितंबर को लेकर रांची पहुंचे।

बेटा सिकंदर महली ने बताया कि मेरे पिता फुचा महली के रांची पहुंचने पर भाई रंथु महली व चाची सुकमनिया महली रांची गयी थीं। वे लोग रांची से लेकर मेरे पिता को गांव पहुंचे। 30 वर्ष बाद पिता को देखा, उन्हें छूआ। सिकंदर ने कहा कि मेरे पिता जब 30 वर्ष के थे। तभी वे रोजी-रोजगार की तलाश में अंडमान निकोबार चले गये थे। अंडमान पहुंचने के बाद उन्हें आश्रय व खाने के लिए भोजन तो मिला, परंतु मेहनताना नहीं दिया गया। इसके बाद वे एक घर में माली का काम करने लगे। जहां उन्हें सिर्फ तीन वक्त का खाना व रहने के लिए एक कमरा मिला था। फुचा गुमला अपने परिवार के पास आना चाहते थे। लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे। परंतु पत्रकार दुर्जय पासवान की पहल के बाद आज मेरे पिता वापस गांव आ पाये हैं।

रिश्तेदार सरोज कुमार महली ने बताया कि पत्रकार दुर्जय पासवान को धन्यवाद, जिनकी लेखनी के दम पर सरकार गंभीर हुई। जिसके बाद फुचा महली को वापस झारखंड लाया गया। सरोज ने बताया कि मैंने दो जुलाई को पत्रकार दुर्जय पासवान को जानकारी दी थी कि फुचा महली अंडमान निकोबार में फंसे हुए हैं, जिसके बाद पत्रकार दुर्जय पासवान ने समाचार प्रकाशित किया और जिसका असर हुआ। अब फुचा महली अपने गांव पहुंच गए।

बता दें कि फुचा के झारखंड आने के बाद कुछ अखबारों ने खबर लगा दी कि जब उन्हें 30 साल बाद झारखंड सरकार की मदद से वापस लाया गया तो उनके बच्चों ने पहचानने से साफ इंकार कर दिया, जो बाद में गलत साबित हुआ। अभी फुचा महली अपने परिवार के पास हैं।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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