Friday, January 27, 2023

गजरौला: खंडहरों में तब्दील होती औद्योगिक इकाइयों की दास्तान

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पश्चिमी यूपी में गजरौला को कभी रोजगार का हब बनाने का सपना देखा गया था। औद्योगिक नगरी की राह पर तीन दशकों में कई इकाइयां लगाई गईं, लेकिन जितनी औद्योगिक इकाइयां लगती गई उतनी ही संख्या में दम तोड़ती भी रहीं। औद्योगिक नगरी गजरौला में दर्जन भर से ज्यादा इकाइयां इस बीच दम तोड़ चुकी हैं, वहीं कुछ इकाइयां अपनी आखिरी सांसें गिन रहीं हैं।

सन् 1986 में नगर पंचायत बनाने के लिए शासन ने गजरौला के साथ-साथ अन्य पांच गांवों को एक में समाहित कर दिया था। उसके बाद बैंक से लोन लेकर उद्योगपतियों ने इकाईयां स्थापित करनी शुरू कीं, लेकिन लगातार घाटा झेलने के बाद मंझौले उद्योगपति खस्ताहाल होते चले गए और परिणामस्वरूप फैक्ट्रियों को बंद करना पड़ा, वहीं जो लंबी रेस के घोड़े थे वो दौड़ते रहे लेकिन कब तक दौड़ सकते थे, वे भी अब आखिरी सांसें गिन रहे हैं। 

खंडहरों में तब्दील हो गई औद्योगिक इकाइयां

इस क्षेत्र में आते-जाते बंद पड़े उद्योग-धंधों पर मेरी निगाह अक्सर पड़ जाती है। यहाँ पर अब बड़ी-बड़ी घास-फूस उग आई है जिसमें सांप-बिच्छू, कीड़े-मकोड़े रहने लगे हैं, बरसात के मौसम में ये बाहर निकल आते हैं। कुछ फैक्ट्रियां ऐसी हैं जो पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। उनकी नेमप्लेट भी समय के साथ बदरंग हो गई है। अब ना तो उनका कोई नामोनिशान ही बचा ना ही कोई देखरेख करने वाला गार्ड या संरक्षक ही बचा है। 

इन फैक्ट्रियों में करोड़ों रूपये की लागत से लगाई गई मशीनरी यूंही जंग खा रही है। क्षेत्र के लोग बताते हैं कि, गजरौला में साबुन फैक्ट्री के नाम से विख्यात शिवालिक सेल्यूलोज लिमिटेड को 1970 के दशक में शुरू किया गया था।

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दशकों से बंद पड़ी साबुन बनाने वाली फैक्ट्री शिवालिक सेल्यूलोज लिमिटेड

इसमें लाइफबॉय और ओके नामक साबुन का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता था। सैकड़ों बीघे में फैली इस फैक्ट्री से हजारों घरों का चूल्हा जलता था, लेकिन मुनाफे में कमी आती गई जिसके कारण 1990 के दशक में हिन्दुस्तान लीवर को इसे लीज पर सौंप दिया गया। परंतु संकट इसके बाद भी न टल सका। बांसली गांव निवासी हरिओम, सुभाष, रामकुमार, राजीव उस दौरान साबुन फैक्ट्री में काम किया करते थे। हरिओम शर्मा बताते “हम ठेकेदारी में काम करते थे। काम ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन जैसे-जैसे लाइफबॉय की डिमांड कम होती गई, वैसे-वैसे साबुन फैक्ट्री के कर्मचारियों की छंटनी होती गई। इसलिए फैक्ट्री प्रबंधन के साथ वर्कर्स के संबंध भी तल्ख होते चले गए। एक समय तो वो भी आया कि दंगे-फसाद तक होने लगे।”

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रेड़ी लगाकर शिवालिक फैक्ट्री गेट के सामने बैठे लोग

उस दौरान फैक्ट्री में काम करने वाले विनोद शर्मा बताते हैं, “जब हम इस फैक्ट्री में काम करते थे तो उस दौरान जम्मू-कश्मीर के अश्वनी शर्मा फैक्ट्री मैनेजर हुआ करते थे और विनीत खुराना प्रोडक्शन मैनेजर। एक बार नाइट ड्यूटी के दौरान एक वर्कर को नींद आ गई। इसके लिए फैक्ट्री प्रबंधन ने वर्कर के साथ बदतमीजी की। बस इसी बात पर अश्वनी शर्मा और वर्कर्स में झगड़ा हो गया। यह झगड़ा कई महीनों तक चलता रहा, रोज ना रोज हड़तालें होने लगी। फैक्ट्री प्रबंधन के हाथ-पांव फूलने लगे, प्रबंधन ने माफी भी मांगी, लेकिन कोई असर नहीं दिखा जिसके कारण साल 2001 में फैक्ट्री बंद हो गई।”

शिवालिक प्लांट गजरौला रेलवे स्टेशन से सटा हुआ है। मैं इस फैक्ट्री के पीछे वाले हिस्से में गया, तो वहां कुछ लोग टीन डालकर रह रहे थे। उनमें से एक का नाम अमित कुमार था। उनकी बोली से मालूम पड़ रहा था कि ये लोग लोकल नहीं हैं। रेलवे लाइन पर टीन और छप्पर डालकर रहने की वजह पूछने पर अमित ने बताया, “हम पांच जने आएं हैं, और पांचों ही रामनगर उत्तराखंड के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया, हम यहां स्टेशन पर स्लीपर बिछा रहे हैं” 

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रेलवे लाइन पर स्लीपर बिछाने के लिए रामनगर से आए हुए अमित कुमार और कृष्णपाल 

अमित कुमार के साथ एक नाबालिग कृष्णपाल भी है जिसकी उम्र तकरीबन 13-14 होगी। कृष्णपाल पढ़ाई-लिखाई छोड़ चुका है, घर-बार का बोझ हल्का करने के लिए यहां स्लीपर बिछाने में हाथ बंटाता है।

वहीं रेलवे स्टेशन से बाहर नजदीक से गुजर रहे राष्ट्रीय राजमार्ग के विस्तार ने सड़क के दोनों ओर बसे दर्जनों ढाबों और छोटी-मोटी दुकानों के सहारे अपनी रोजी-रोटी कमाने वालों की आजीविका के साधन छीन लिए हैं।

दशकों में कोई एक-आध फैक्ट्री खड़ी करने की सोची जाती है, इतने में कोई दूसरी इकाई दम तोड़ चुकी होती है। शिवालिक की तरह ही बैस्ट बोर्ड लि., चड्ढा रर्बस, एस.एस. ड्रग्स, सिद्धार्थ स्पिन फैब, श्री एसिड्स एंड केमिकल्स लि.,  मूंगफली मिल सहित छोटी-मोटी दर्जनों इकाइयां दम तोड़ चुकी हैं। एक और विडम्बना देखिए, किसानों की कई सौ एकड़ भूमि यू.पी.एस.आई.डी.सी. के द्वारा अधिग्रहित किये दशकों हो चुके हैं, लेकिन कोई नई इकाई नहीं लग पाई है।

राष्ट्रीय राजमार्ग दिल्ली के किनारे अनेकों औद्योगिक इकाइयां स्थापित की गई थीं, लेकिन आज एएसपी, मिल्क डेयरी, जुबीलेंट और कचरी फैक्ट्री को छोड़कर बाकी की हालत खस्ताहाल है। साल 2002 में मिल्क डेयरी के सामने उद्योग कारोबारी तरूण चौहान ने ‘सत्या हाई स्पीड’ नामक औद्योगिक इकाई की स्थापना की थी। इसी फैक्ट्री के गेट पर मुझे प्रमोद कुमार टहलते दिखाई दिये, वो मुझे जानते हैं इस नाते अन्दर ले गए‌। प्रमोद पश्चिमी चम्पारण (बिहार) के रहने वाले हैं क़रीब 20 साल पहले एक मजदूर के तौर पर परिवार सहित गजरौला आए थे। दो लड़कियां हैं जिनकी शादी कर दी। प्रमोद के साथ समय‌ ने न्याय नहीं किया, जबसे गजरौला आएं हैं जीवन में उथल-पुथल मची हुई है, जवान लड़के की गुमशुदगी के कारण प्रमोद को बुढ़ापे में सहारा देना वाला कोई नहीं है।

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रोजगार के लिए बिहार के चम्पारण से आकर गजरौला में बस गए प्रमोद

प्रमोद बताते हैं, इस फैक्ट्री में मैकेनिकल पुर्जे बनाए जाते थे‌, लेकिन ये काम-धंधा चल नहीं पाया जिसके कारण फिर मैली से बनने वाले कोयले का काम शुरू किया गया। यह कोयला फैक्ट्री में जलने वाली भट्टी में काम आता था। 

धीरे-धीरे यह भी मामला ठप पड़ गया तो उसके बाद बकरी पालन भी शुरू किया, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। मैली खाने के कारण बकरियां बीमार होने लगीं, रोज 4-5 बकरी मरने लगी तो बकरियों को आलुओं के भाव बेचना पड़ा, 30-40 बकरियों को 22,000 रूपये बेच दिया, तो कुछ आस-पास के होटल वाले ले गए।

इधर जितनी भी औद्योगिक इकाइयां बंद हो चुकी हैं उनकी फैक्ट्रियों में लगा लोहा अब गलने लगा है। उनमें इक्का-दुक्का गार्ड तैनात हैं। सत्या हाई स्पीड फैक्ट्री की आधी जमीन बिक चुकी है। उसमें अभी एक प्लांट लगाने का काम चल रहा है। जनचौक ने जब सत्या हाई स्पीड के मालिक सिसोदिया चौहान से सम्पर्क करके फैक्ट्री की जमीन बेचने के बारे में पूछा तो उनका कहना था, “हमने यहां निवेश के लिए हर तरह के प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। अब यहां पर पैसा लगाने का कोई मतलब नहीं है।” फैक्ट्री से बाहर निकला ही था कि एक फैक्ट्री के चीथड़े उड़े हुए दिखायी दिए। बाहर एक बुजुर्ग गार्ड बैठे हुए थे उनसे पूछा, ददा काहे की फैक्ट्री है? बोले, “ये फैक्ट्री नहीं है पुराना कबाड़खाना था जो अब बन्द हो चुका है।”

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कबाड़खाने में तब्दील हो गई कबाड़ रिसाइकलिंग फैक्ट्री

मैंने जब उनसे पूछा, ददा क्या काम होता था यहां? तो उन्होंने सीधा फैक्ट्री मालिक को फोन मिला दिया। उधर से आवाज़ आई हैलो, हां हैलो नमस्कार साहब! इतना बोलकर फोन मेरे हाथ में पकड़ा दिया। यही सवाल पूछने पर फैक्ट्री मालिक ने बताया “हम यहां कचरा रिसाइकलिंग का काम किया करते थे, लेकिन ताल-मेल नहीं बैठा। उपर से कमर्शियल बिजली का इतना बिल.. “

औद्योगिक नगरी गजरौला की उपजाऊ जमीन किसानों से अधिगृहीत कर उद्योगपतियों को दे दी गई, लेकिन मलाल इस बात का है जहां आलू-प्याज,खीरे,दलहन, तिलहन और गन्ने की खेती होती थी वो जमीन आज बंजर हो चुकी है। गजरौला में औद्योगिक विकास पिछले ढाई-तीन दशक में जितना आगे बढ़ा उतना ही पीछे लौटा। औद्योगिक इकाइयां टिक नहीं पा रही हैं। केवल प्राइवेट लिमिटेड फैक्ट्री या कम्पनियों का ही यह हाल नहीं है बल्कि सरकारी गोदाम के नाम पर अधिग्रहित भूमि पर भी पशु घास चर रहे हैं।

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सरकारी गोदाम की जर्जर हालत में पड़ी अधिकृत भूमि   

यहां सुनसान जगह पर कोई पूछताछ करनेवाला नहीं है, लेकिन करीब 30-35 बीघे में जर्जर हालत में बना यह कमरा सरकारी नुमाइंदों की कारस्तानियां बयां कर रहा है।

लक्ष्मी नगर निवासी सतपाल सिंह कुछ समय पहले एएसपी फैक्ट्री में काम करते थे। सतपाल बताते हैं कि, “फैक्ट्री का पेमेंट करने का रवैया इतना बुरा था कि एक महीना पूरा हो जाने के बाद अगले महीने की 26 तारीख़ को जाकर पैसे जेब में आते थे। खर्चे-पानी के लिए उधार लेना पड़ता था। कम्पनी पैसे देने का नाम ही नहीं लेती थी। इसलिए मैंने तो वह काम ही छोड़ दिया”। सतपाल अब परचून का खोखा चलाते हैं। 

गजरौला में जितनी औद्योगिक इकाइयां चल रही हैं, उनमें स्थानीय लोगों को तरजीह नहीं दी जाती। जितने भी बाबू-मालिक टाइप लोग हैं वो ज्यादातर बाहर के हैं। इस सम्बंध में जनचौक ने जब निर्मल फाइबर के एचआर शोभित शर्मा से बात की तो उनका कहना था, “लोकल लोगों का विश्वास नहीं किया जा सकता। आज यहां हैं तो कल कहीं और नौकरी करने पहुंच जाते हैं।”

(स्वतंत्र पत्रकार प्रत्यक्ष मिश्रा की रिपोर्ट।)

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