Thu. Feb 20th, 2020

ग्राउंड रिपोर्टः संविधान और मुल्क बचाने की कसम खाकर धरने पर बैठी हैं सीलमपुर की महिलाएं

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पिछली गलती से सबक लेते हुए सीलमपुर जाफरबाद की महिलाओं ने अनिश्चितकालीन धरने की शुरुआत की है। शनिवार को धरने का चौथा दिन था। धरने में हजारों महिलाएं दिन-रात बैठी हैं। पुरुष और बच्चे भी उनके समर्थन में डटे हुए हैं। महिलाओं के हाथों में गांधी, अंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अबुल कलाम आजाद, एपीजे अब्दुल कलाम, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख की तस्वीरें हैं। छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में तिरंगा पूरे शान से लहरा रहा है।

धरने के बैनर पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है, ‘NRC-CAA के खिलाफ़ औरतों का इंक़लाब’। इसमें दोनों ओर फातिमा शेख़ और सावित्री बाई फुले की बड़ी-बड़ी तस्वीर छपी हैं। महिलाओं द्वारा अपने आंदोलन के प्रतीक के रूप में फातिमा शेख़ और सावित्री बाई फुले जैसी शिक्षा के क्षेत्र की नायिकाओं को चुनना अभूतपूर्व कदम है। अपने आंदोलन का प्रतीक चुनने में सीलमपुर की महिलाओं की ये सजगता दिखाती है कि वो इस मुल्क़ को कहां देखना चाहती हैं।

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12वीं कक्षा की छात्रा निशात कहती हैं, “इस साल हमारा बोर्ड का इम्तहान है, लेकिन परीक्षा की तैयारी करने के बजाये हमें यहां विरोध प्रदर्शन में बैठने के लिए बाध्य होना पड़ा है। हमारे साथ इस आंदोलन में दसवीं और बारहवीं की सैकड़ों छात्राएं हिस्सा ले रही हैं। हमारे लिए पढ़ाई और परीक्षा से ज़्यादा ज़रूरी ये मुल्क़ और इसकी अवाम की ज़िंदग़ी के अधिकार हैं। हम बोर्ड का इम्तेहान देकर डिग्री हासिल भी कर लें तो क्या वो डिग्री डिटेंशन कैंप में दिखाएंगे। हम अपनी कम्युनिटी, अपने संविधान अपने मुल्क़ को बचाने के लिए यहां हैं।”

नरगिस कहती हैं, हम 15 दिन से लगातार प्रोटेस्ट कर रहे थे। कैंडल मार्च निकाल रहे थे, लेकिन 15 जनवरी से बाकायद अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। ये कानून संविधान के खिलाफ़ है। ये हमारे मौलिक अधिकार ‘समानता के अधिकार’ पर हमला करता है। हम अपने संविधान को बचाने के लिए बैठे हैं।”

शादाब कहती हैं, “हम तीन-चार लड़कियों को फिक्र थी की हमारे मुहल्ले के लोग विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं। हम कैंडल मार्च निकालते तो मार्केट के लोग कोऑपरेट नहीं करते थे। फिर हमें लगा कि हमें कुछ करना चाहिए अपने मुल्क़ के लिए। फिर हमने ऐसी जगह चुना जहां लोगों को तकलीफ न हो। हम तीन-चार लड़कियों ने ये शुरू किया। फिर धीरे-धीर बाकी महिलाएं भी अपने घरों से निकलने लगीं। आज आप देख ही रही हैं 10 हजार से भी ज़्यादा महिलाएं हैं यहां।”

उन्होंने कहा कि हमने घर-घर जाकर लोगों को जागरूक किया कि अगर वो ऐसे ही खामोश बैठे रहेंगे तो ये मुल्क़ और इसका आईन वो लोग खत्म कर देंगे। हमें अपने घरों से निकलने के लिए मजबूर किया गया। आज हम निकले हैं तो ये सरकार डरी हुई है। हमने बारिश और ठंड से बचने के लिए टेंट मंगवाया तो टेंट की गाड़ी को वो लोग उठाकर ले गए। ये ज़्यादती है। वो जुल्म कर रहे हैं और चाहते हैं कि हम प्रतिरोध भी न करें। चुपचाप हर जुल्म सह लें। बाबरी मस्जिद और कश्मीर की बर्बादी के फैसले की तरह, लेकिन ये मुल्क़ हमारा है और इसे बचाने के लिए हम आखिरी सांस तक संघर्ष करेंगे।

जज़्बा कहती हैं, “मैं देश को बचाने के लिए लड़ रही हू। ये सरकार ही संविधान के खिलाफ़ जाकर कानून बना रही है। हमारे पुरखों ने मिलकर इस मुल्क़ और इसके संविधान को बनाया है। इसके विरोध में देश भर में महिलाएं निकल रही हैं। हम महिलाओं का इस कानून के खिलाफ़ बाहर आना ये बड़ी घटना है।

बुजुर्ग ख्वातून सबा कहती हैं, “हमारा बहुत दिल दुखाया है इस सरकार ने। ये मुसलमानों की बर्बादी का रास्ता बना रहे हैं। ये सही नहीं है। क्या आजादी में हमने इसी दिन के लिए क़ुर्बानी दी थी? हमारा देश एक खुशनुमा मुल्क़ है। इसे मोदी, शाह और योगी मिलकर बर्बाद कर रहे हैं। ये पीड़ितों के खिलाफ़ ही कार्रवाई कर रही हैं। सरकार से हमारी अपील है कि वो मुल्क़ की खुशहाली के लिए सीएए को रद्द करें। हम अपने मुल्क़ की खुशनुमाई के लिए लड़ रहे हैं।”


CAA-NRC-NPR पर केजरीवाल के स्टैंड से गुस्साए लोगों ने आप विधायकों को वापस भगाया
हसीन अहमद कहते हैं, “लोकतंत्र तो नाम का रह गया है। दिल्ली पुलिस आज सहयोग कर रही है। कल रात थोड़ी देर के लिए इलाके की लाइट शटडाउन हुई थी। ये आवाम का प्रोटेस्ट है। हम लोगों को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से नाराज़गी है, क्योंकि वो एनआरसी पर खुलकर नहीं बोल रहे हैं। एनआरसी केवल एक मजहब का मामला नहीं है। उन्हें खुलकर बोलना होगा कि एनआरसी सीएए को लेकर उनका स्टैंड क्या है? हम उनके ढुलमुल रवैए को नहीं स्वीकार करेंगे।”

उन्होंने बतायाा कि धरने के पहली रात में करीब साढ़े बारह बजे ओखला क्षेत्र के विधायक अमानतउल्लाह हमारे बीच आए थे, लेकिन हमने उन्हें वापस कर दिया। इसी तरह सीलमपुर के स्थानीय विधायक और आम आदमी पार्टी के कैंडीडेट रहमान खां भी आए थे। हमने उन्हें भी वापस कर दिया कि पहले आप लोग अपने मुख्यमंत्री और पार्टी का एनआरसी-सीएए पर रुख स्पष्ट करो।

उन्होंने कहा कि दिल्ली के लोग नोटिस कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री केजरीवाल इस मसले पर बोलने से बचते रहे हैं। दिल्ली का निवासी होने के नाते हमारी दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से मांग है कि वो रुख स्पष्ट करें और दिल्ली के लोगों को बताएं कि वो सीएए-एनआरसी के समर्थन में हैं या विरोध में।

बाहरी और अराजक लोगों से सतर्क हैं सीलमपुर के प्रदर्शनकारी
मोहम्मद सलीम कहते हैं, “धरने की पहली रात में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को भगाने की कोशिश की थी। सुबह चार बजे के करीब लोगो की संख्या कम थी। पुलिस उस समय बल प्रयोग करके हटाने आई, लेकिन भनक लगते ही बड़ी मात्रा में स्थानीय लोगों के जुटने के चलते उन्हें अपने पांव पीछे खींचने के लिए विवश होना पड़ा।”

मोहम्मद सलीम बताते हैं कि हम लोगों ने सुनिश्चित किया है कि धरना बिल्कुल शांतिपूर्ण और सुरक्षित हो। पिछली बार बाहरी लोगों के प्रदर्शन में घुसकर पत्थरबाजी की बड़ी कीमत हमने चुकाई थी, इसलिए अब की बार हमने उससे सबक लेते हुए धरनास्थल को रस्सी लगाकर सुरक्षित कर दिया है। स्थानीय लोग ही वोलंटियर बनाए गए हैं जो बाहरी लोगों की शिनाख्त कर सकें। हम लोगों ने ये भी कोशिश की है कि सड़क यातायात बाधित न हो और हमारे धरने से आमजन को कोई असुविधा न हो।”

एनआरसी-सीएए समाज में बिगाड़ पैदा कर रही है
अब्दुल माजिद कहते हैं, “एनआरसी सीएए समाज में बिगाड़ पैदा कर रही है। हम एनआरसी-सीएए बिल्कुल नहीं चाहते। हम सभी भाई हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हजारों साल से साथ-साथ रहते आए हैं। हम आपस में इस तरह गुंथे हुए हैं कि एक को निकाल दोगे तो दूसरे का वजूद भी खत्म हो जाएगा। इस देश का ताना-बाना हिंदू-मुस्लिम एकता है। ये हिटलर बनकर समाज के ताने-बाने को उधेड़ रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि ये हमसे हमारी पहचान का सबूत मांग रहे हैं। जो इनके मोहन भागवत कह रहे हैं वही ये कर रहे हैं। कानून को ही ये उलट दे रहे हैं। जज की वैल्यू खत्म कर दे रहे हैं। हजारों साल से हम एक साथ रहते, खाते-पीते, कारोबार करते आए हैं। हमने तीन मामले बर्दाश्त कर लिए पर हम संविधान और देश पर हमला नहीं बर्दाश्त करेंगे।

अब्दुल मजीद आगे कहते हैं, “लोगों को रोटी नहीं मिल रही है और मोदी लाखों रुपये के कैप्सूल खा रहे हैं। हमारे बिना गाड़ी चलनी नहीं है इनकी। ये देश को पीछे धकेल रहे हैं। कोई इनसे पूछे कि सरकारी कंपनियों को क्यों बंद कर रहे हैं। नोटबंदी करके उन्होंने मुल्क की अर्थव्यवस्था का, उसकी तरक्की का सत्यानाश कर दिया। ये नोटबंदी करके पूंजीपतियों के काले नोट सफेद करते हैं और आवाम को लाइन में लगाकर मारते हैं। ये बताएं कि देश की अवाम को लाइन में लगाने वाली अभी कितनी योजनाएं हैं इनके पास।”

(सुशील मानव पत्रकार और लेखक हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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