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ग्राउंड रिपोर्टः प्रधानमंत्री आवास योजना और आयुष्मान भारत में दलित कहां!

प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना का नारा ‘बनते घर, पूरे होते सपने’ और  आयुष्मान भारत योजना का नारा  ‘बीमार न होगा लाचार, बीमारी का होगा मुफ्त उपचार’ की कलई खुलती उस वक्त खुलती नजर आई जब मैं झारखंड के बोकारो जिले के बाधाडीह-निचितपुर पंचायत का डोम टोला गया। बता दें कि बोकारो जिला मुख्यालय से महज पांच किमी दूर और चास प्रखंड मुख्यालय से सिर्फ चार किमी दूर बोकारो-धनबाद 4 लेन एनएच-23 के तेलगरिया से कोयलांचल झरिया की ओर जाने वाली सड़क किनारे बसा है बाधाडीह-निचितपुर पंचायत। इस पंचायत का एक टोला है डोम टोला। टोकरी बनाकर और दैनिक मजदूरी करके अपना जीवन बसर करने अति दलित समझी जाने वाली डोम जाति के लगभग 16 घर के लोग यहां बसते हैं।

पिछले आठ नवंबर को स्थानीय अखबारों में खबर आई कि जर्जर दीवार गिरने से दस साल की दलित बच्ची की मौत हो गई। मैं बाधाडीह गांव पहुंच गया। सड़क किनारे ही पंचायत कोटा से निर्मित एक पानी की टंकी है। इसका निर्माण शायद कमीशन खोरी के कारण हुआ हो, क्योंकि इस टोले में विकास की तस्वीर का यही एक जीता-जागता प्रमाण दिखा था।

मृतक बच्ची की मां का नाम चंद्रमुखी देवी है। पति मनोज कालिंदी की सात साल पहले मौत हो चुकी है। कालिंदी डोम जाति में आते हैं। चंद्रमुखी ने पति के बारे में बताया कि वह काफी दिनों तक बीमार थे। इलाज के अभाव में उनकी मौत हो गई। पति की मौत के बाद सहारा के नाम पर दो बेटियां रूपा कुमारी दस साल और पूजा कुमारी बारह वर्ष थीं। रूपा की मौत दीवार गिरने से हो गई। इस घटना में पड़ोस की आठ वर्षीय रेशमा का हाथ टूट गया और चार वर्षीय प्रेम की गर्दन में गंभीर चोट आई। वे बच्चे दीवार की बगल में खेल रहे थे। चंद्रमुखी ने बताया कि दो-ढाई साल पहले वह और उसकी बेटियों ने इधर-उधर से ईंट मांग कर मिट्टी-गारा से जुड़ाई करके किसी तरह दीवार खड़ी की थी। पहले मिट्टी की दीवार थी जो बरसात के पानी से टूट—टूट कर गिर रही थी। छत के नाम पर प्लास्टिक की चादर फैली हुई थी। जो सरकार की जन आकांक्षी योजनाओं की पोल खोलती साफ नजर आ रही थी। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना का ढपोरशंखी नारा और घोषणाओं की कलई खुलती यहां साफ दिख रही थी। एक करोड़ घरों के निर्माण में शायद ऐसे दलितों का हिस्सा नहीं है।

चास प्रखंड के बीडीओ संजय शांडिल्य ने बताया कि 2011 के सामाजिक आर्थिक एवं जातीय जनगणना में इनका नाम शामिल नहीं है। इसी कारण इन्हें आवास का लाभ नहीं मिल पाया।

प्रधानमंत्री आवास योजना का नाम सितंबर 2016 में इंदिरा आवास योजना से बदलकर प्रधानमंत्री आवास योजना कर दिया गया। बीपीएल परिवारों को मिलने वाली आर्थिक मदद को 45,000 रुपये से बढ़ाकर 70,000 रुपये कर दिया गया। यह भारत में एक केंद्र प्रायोजित आवास निर्माण योजना है। योजना का वित्तपोषण केंद्र और राज्यों के बीच 75:25 के अनुपात में किया जाता है। उत्तर-पूर्व के राज्यों के लिए केंद्र-राज्य वित्त अनुपात 90:10 है। संघ शासित प्रदेशों के लिए योजना 100% केंद्र प्रायोजित है। 1985-86 से प्रारंभ इंदिरा आवास योजना का पुनर्गठन 1999-2000 में किया गया था। इसके अंतर्गत गांवों में गरीबों के लिए मुफ़्त में मकानों का निर्माण किया जाता था। योजना केवल गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले (बीपीएल) परिवारों के लिए थी। धनराशि घर की किसी महिला के नाम पर ही निर्गत की जाती थी। भारत निर्माण के अंतर्गत चल रही इंदिरा आवास योजना पर 2010-11 में दस हजार करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित कराई गई थी।

अब केंद्र सरकार ने इस योजना को 3 फेज में विभाजित किया है। इसके तहत पहला फेज अप्रैल 2015 को शुरू किया गया था और जिसे मार्च 2017 में समाप्त कर दिया गया। इसके अंतर्गत 100 से भी अधिक शहरों में घरों का निर्माण हुआ है।

प्रधान मंत्री आवास योजना के लिए कौन पात्र है? 

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)- तीन लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले परिवार। निम्न आय वर्ग (LIG)- तीन लाख से छह लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले परिवार। मध्यम आय वर्ग एक (MIGI)– छह लाख से 12 लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले परिवार। मध्यम आय वर्ग दो (MIG II)– छह लाख रुपये से 12 लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले परिवार। महिलाएं जो EWS और LIG कैटेगरी से संबंधित हैं। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)।

उपरोक्त के अतिरिक्त, लाभार्थी निम्नलिखित कुछ पात्रता मानदंडों को पूरा करके इस स्कीम का लाभ उठा सकते हैं, जैसे-प्रधान मंत्री आवास योजना की पात्रता को पूरा करने के लिए उसके पास अपना घर नहीं होना चाहिए। व्यक्ति ने राज्य या केंद्र सरकार की किसी अन्य हाउसिंग स्कीम का लाभ न लिया हो।

इंदिरा गांधी आवास या प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ यहां किसी को नहीं मिला है। लोगों ने अपनी अर्जी मुखिया को दी थी, लेकिन उसका कुछ नहीं हुआ। इस इलाके में कई पीढ़ी से यह लोग रह रहे हैं। एक युवक ने एक कंदरा नुमा ढांचा की ओर इशारा किया जिसमें तीन कंदरे थे, जिसके एक कंदरे में किसी ने बिना दरवाजे का घर बना लिया था। वह अंग्रेजों का किया निर्माण था।

मृतक बच्ची की मां चंद्रमुखी के पास राशन कार्ड तक नहीं है। उसे विधवा पेंशन भी नहीं मिलती है। अलबत्ता उनके पास आधार कार्ड और वोटर कार्ड हैं। आप लोग वोट देते हो? इस सवाल पर वहां खड़े समूह ने एक स्वर में हां कहा। ‘आयुष्मान भारत का कार्ड है?’ इस सवाल पर सभी ने न में जवाब दिया। आयुष्मान भारत योजना या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, भारत सरकार की एक स्वास्थ्य योजना है। इसे एक अप्रैल, 2018 को पूरे भारत में लागू किया गया था। योजना का मकसद आर्थिक तौर से कमजोर लोगों (बीपीएल धारक) को स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराना है। इसके अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक परिवार को पांच लाख रुपये तक का कैश रहित स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराया जाता है।

एक युवक राजू ने बताया कि गांव में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं है। इसकी वजह यह है कि गांव या आसपास कोई स्कूल ही नहीं है। गांव में कोई भी सरकारी नौकरी में नहीं है। इनके रोजगार का जरिया टोकरी बनाना है। उसे बेचकर ही जिंदगी की गाड़ी किसी तरह से सरकती है। यह काम यहां पुश्तों से हो रहा है। इन्हें कोई भी सरकारी मदद नहीं मिलती है। गांव में किसी के पास भी राशन कार्ड नहीं है। किसी को वृद्धा अवस्था पेंशन भी नहीं मिलती है।

बोकारो इस्पात नगरी से मात्र छह-सात किलोमीटर दूर बसे इस गांव के लोग किस युग में जी रहे हैं! जबकि इस गांव से मात्र तीन—चार किलोमीटर दूरी पर वेदांता लिमिटेड का 45 लाख टन उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लांट भी है। जब मैंने बीडीओ से राशन कार्ड पर सवाल किया तो उनका जवाब था, ‘इस बारे में आपूर्ति पदाधिकारी ही कुछ कह सकते हैं।’ आपूर्ति पदाधिकारी से बात इसलिए नहीं हो पाई कि उनका मोबाइल लगातार बंद था।

वहां की दशा देखने के बाद जेहन में आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री की यह पंक्ति ताजा हो आईं…

ऊपर-ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले हैं,

कहते ऐसे ही जीते हैं, जो जीने वाले हैं!

विशद कुमार

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और बोकारो में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 14, 2019 2:07 pm

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