डिजिटल इंडिया के मुद्दे नहीं बनते भूखे, नंगे और खानाबदोश बच्चे

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सिराथू, प्रयागराज। 31 जनवरी को सिराथू विधानसभा की रिपोर्टिंग करके घर लौट रहा था। ठंड अपने चरम पर थी। लोग-बाग शॉल स्वेटर मफलर कसते हुये इलाहाबाद के सिविल लाइंस में ‘प्रयागराज में आपका स्वागत है’ बोर्ड के सामने सेल्फी ले रहे थे। पीपे आधा काटकर गाड़े गये पीपे शिवलिंग का रूपाकार ग्रहण करके हिंदुत्ववादी विकास का उद्घोष कर रहे थे। मैं ऑटो पकड़ने के लिये पैदल चला आ रहा था। दो बच्चे नंगे पांव सड़कों पर पतंग उड़ा रहे थे, लेकिन उनके सपनों की पतंग उड़ने के बजाय सड़क पर घिसट रही थी। मैंने कोशिश की कि उनसे बात करुं और हो सके तो उनके लिये दो जोड़ी जूते या चप्पल की व्यवस्था कर दूं, लेकिन वो बात करने को कतई राजी न हुये। दरअसल वो अपने सपनों की उड़ान में इतने ज़्यादा तल्लीन थे कि उन्हें मेरा बोलना व्यवधान लग रहा था। मैंने वीडियो बनाने की कोशिश की लेकिन उन बच्चों को ये गवारा नहीं हुआ।    

गोलू और गंगोत्री रसूलाबाद घाट पर कूड़ा बीनते हुए

18 फरवरी को ससुर जी के इंतकाल के बाद जब उनका क्रिया-कर्म करने के लिये रसूलाबाद घाट पहुंचा तो वहां 10-12 साल के दो बच्चों को पीठ पर बोरियां लादे प्लास्टिक कूड़ा बीनते देखा। उनके नाम गोलू और गंगोत्री हैं। मैंने कहा बात करोगे तो पैसे दूंगा चॉकलेट-चिप्स ख़रीद लेना। गोलू ठिठका लेकिन भागते हुये गंगोत्री ने घाट की सीढ़ियां चढ़ते हुये कहा – भाग गोलू। मैंने गोलू से कहा कि क्या तुम्हें किसी ने बात करने के लिये मना किया है। गोलू ने कहा नहीं। चलते चलते हुई 30 सेकंड की बातचीत में गोलू ने बताया कि उसकी मम्मी घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने का काम करती हैं और पिता रिक्शा चलाते हैं। गोलू के घायल बचपन पर मरहम तो नहीं लगा सकता था, हाँ 20 रुपये दिये चिप्स और चॉकलेट के लिये।

फूलपुर विधानसभा के पाली गांव में मुसहर टोले में रहने वाले मुसहरों के बच्चे ठंड में भी नंग-धड़ंग घूमते दिखे। कोरोना में स्कूल बंद होने से बच्चे मिड-डे मील तक से मरहूम हैं। गाय मरने के बाद से इन बच्चों को तीन साल से दूध तक नसीब नहीं हुआ।

इलाहाबाद में बैरहना चौराहे के पास सैकड़ों टेंटो में खानाबदोश लोग रहते हैं। इनके साथ सैकड़ों बच्चे भी हैं। यह बच्चे पिछले दो महीने से माघ मेले में घूम-घूमकर भीख मांगते रहे। लेकिन पुण्य कमाने आये लोग हाथों में दक्षिणा लिये पंडा-पुरोहित ढूँढते रहे, उन्हें हाथ फैलाये रिरियाते बच्चे नहीं दिखे। अब ये बच्चे चौराहों पर भीख मांगते हैं। इनके होठों पर अल्फाबेट, और नर्सरी की कवितायें नहीं बल्कि बाबू जी, मेम साहेब एक रुपिया दे दो भूख लगी है की रट है। इनकी आँखें अक्षर नहीं चेहरे पहचानती हैं कि कौन उन्हें पैसे देगा और कौन दुत्कार।

प्रतापगढ़ के गँजेडा में बांस की डलिया, दौरी, बेना बुनकर बेंचकर गुज़ारा करने वाले धइकार समुदाय के बच्चों को स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ। डलिया-दौरी बनाने के लिये बांस छीलते पिता के बग़ल में छोटे-छोटे बच्चे बालू चालने का खेल खेल रहे थे। वंचित मजलूम के बच्चों के खेल में भी श्रमकार्य निहित होता है। साल ही दो साल में इन बच्चों के हाथ बांस छीलने और डलिया बीनने का खेल भी खेलने लगेंगे। दूध तो बहुत दूर की बात है इन्हें पीने के लिये साफ पानी तक मयस्सर नहीं होता है। पिता और चाचा के खोदे बोर से निकल रहे गंदले पानी पीने के लिए ये बच्चे अभिशप्त हैं। इन बच्चों के पपड़ाये होठों पर अनगिनत भूखी रातों का स्वाद है।

कपारी गांव शंकरगढ़ के 6 महीने के उस कुपोषित बच्ची का चेहरा भुलाये नहीं भूलता, जो कुपोषित मां के दूध पर नहीं नून-भात पर पल रही है। कपारी के ही 7 वर्षीय आदिवासी बच्चे शिव की बेइलाज मौत हो गई। शिव के पेट में कई दिनों से दर्द था। वो कुछ खा-पी नहीं पा रहा था। उसके माता-पिता के पास न कोई काम था, न पैसा जो बेटे का इलाज करा पाते। उसे पेट दर्द की तमाम जड़ी-बूटी खुद से ही लाकर पिलाते रहे और एक दिन उसकी मौत हो गई, बेइलाज ही। ऐसे कई शिव हैं जिन्हें इलाज नहीं मिलता, क्योंकि उनकी पहली लड़ाई भूख के खिलाफ़ है बीमारी के ख़िलाफ़ नहीं।

लोहगरा में नंदिनी, करीना, सुनाती खच्चर चरा रही थीं। तीनों की उम्र 10-13 साल के आस पास है। ये बच्चियां स्कूल नहीं जातीं। खच्चरों को चराने से लेकर उनके लिये घास काटकर लाने की जिम्मेदारी इनके ही कंधों पर है। इनके पिता इन खच्चरों पर ईंट, बालू गिट्टी ढोते हैं।

बेमरा बस्ती के सपेरों के बच्चे दिन भर गट्ठर लादे यहां-वहां घूमते हैं। सांपों को पकड़कर खेल तमाशा दिखाते हैं और अपनी और अपने परिवार की रोटी कमाते हैं। पुलिस और नगर निगम कर्मियों के थप्पड़ इन मासूम गालों पर पढ़े जा सकते हैं। कोरोना लॉकडाउन के समय इनके घरों में खाने के लाले पड़े थे। वो लॉकडाउन दरअसल इन बच्चों के पेटों पर ही लगा था।

मंझनपुर में सड़क किनारे फुटपाथ पर घोड़ागाड़ी में सोते, खेलते, रोते तीन महीने से लेकर 7 साल तक के विश्वकर्मा बच्चे खानाबदोश ज़िंदग़ी जीने को अभिशप्त हैं। रोटी के लिये खानाबदोश की ज़िंदग़ी जीने वाले माता-पिता की वजह से इन बच्चों के जीवन में कोई घर, कोई ठिकाना कोई स्थायित्व नहीं है। ऐसे में इन बच्चों के लिये स्कूल और शिक्षा जैसी चीजें मुमकिन नहीं हैं। डिजिटल इंडिया में मैं इन बच्चों की निरक्षर ज़िंदग़ी की कल्पना करके ही सिहर उठता हूँ।  

बच्चे देश और समाज का भविष्य होते हैं। इन्ही के नन्हें कंधों पर वर्तमान के सपनों को रूपाकार देने का जिम्मा होता है। देश में 0-6 आयुवर्ग के बच्चों की जनसंख्या 16 करोड़ से ज्यादा है। वहीं यदि देश की 0-17 आयुवर्ग की जनसंख्या की बात करें तो ये करीब 45 करोड़ है। यानि देश की कुल आबादी का लगभग 37 प्रतिशत। लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में बच्चों और किशोरों के लिए कुछ नहीं है। ये कैसे नीति-नियंता हैं, जिनकी नीतियों में बच्चों की सुरक्षा व अधिकार की बात ही नहीं हैं। घुमंतू समुदायों के अलावा सबसे ग़रीब समुदाय के लोग भी अपना परिवार साथ लेकर चलते हैं।

रेलवे की पटरियों पर काम करनेवाले ऐसे हजारों परिवार हैं जिनके बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। क्या इन बच्चों के लिए सरकार किसी मोबाइल-स्कूल की व्यवस्था नहीं कर सकती? दरअसल घुमंतू समुदाय और घूम-घूमकर मजदूरी करने वाले लोग किसी के मतदाता नहीं हैं, इसलिए इनके और इनके बच्चों के हितों की बातें ही नहीं होती हैं। गंदी बस्तियों में रहने के चलते बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ती है। बच्चों को अपराध से रोकने के लिए, अच्छे आवास, उचित शिक्षा और उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए नीतियां बननी चाहिए पर इस ओर किसी पार्टी का ध्यान नहीं है। इससे पता चलता है सरकारें या राजनीतिक पार्टियां बच्चों के लेकर कितनी असंवेदनशील और गैर-जिम्मेदार हैं। ये दुखद है कि बच्चों के मुद्दे किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में नहीं हैं। 

बटाई पर खेत लेकर परिवार का गुज़ारा करनेवाली प्रतापगढ़ की चित्रा प्रजापति कहती हैं- गरीबी के चलते हम अपने बच्चों से मजदूरी करवाती हैं। एक तो मजदूरी बहुत कम मिलती है दूसरे काम भी लगातार नहीं मिलता है। फिर एक जन के कमाने से गुज़ारा नहीं हो सकता। अगर बच्चों की मजदूरी जितना पैसा स्कूल से छात्रवृत्ति के रूप में मिले तो हम बच्चों से मजदूरी कराने के बजाय स्कूल भेजें।

हर साल देश भर से लाखों बच्चे गायब हो जाते हैं, जिनमें 60 प्रतिशत तो फिर कभी नहीं मिलते। इनमें से अधिकांश की वेश्यावृत्ति, अंग तस्करी, नरबलि चढ़ाने आदि में इस्तेमाल किया जाता है। देश की 40 प्रतिशत आबादी बच्चों की है, लेकिन बच्चे एजेंडे से ही गायब हैं क्योंकि वो वोटबैंक नहीं हैं। घोषणापत्र और चुनावी वादे मतदाताओं को लुभाने का एक जरिया होते हैं, चूंकि 0-17 आयुवर्ग के बच्चे और किशोर मतदाता नहीं हैं अतः किसी भी दल के चुनावी घोषणापत्र में बच्चों को लेकर कुछ भी नहीं है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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