Wednesday, October 20, 2021

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झारखंड: ढोलकट्टा गांव में सीआरपीएफ ने अंत्येष्टि में आए ग्रामीणों को पीटा

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झारखंड में सरकार बदल गई है, लेकिन अर्द्धसैनिक बलों (सीआरपीएफ) की गुंडागर्दी जारी है। सीआरपीएफ जब भाकपा (माओवादी) के खिलाफ अभियान चलाने के लिए जंगलों में जाती है, तो वहां ग्रामीणों को भी बेवजह पीटने और गाली-गलौच करने से बाज नहीं आती। 5 दिसंबर, 2020 को गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थानान्तर्गत पारसनाथ पहाड़ की तलहटी में बसे गांव ढोलकट्टा के 20 ग्रामीणों ने गिरिडीह के झामुमो विधायक सुदिव्य कुमार के साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलकर सैकड़ों ग्रामीणों के हस्ताक्षर युक्त आवेदन सौंपा है।

आवेदन में लिखा है, ‘दक्षिणी पारसनाथ अन्तर्गत गांव-ढोलकट्टा, थाना-मधुबन, प्रखंड-पीरटांड़, जिला-गिरिडीह (झारखंड) के निवासी छुटू किस्कु की मृत्यु 23 नवंबर को अपने घर में मिरगी की बिमारी से हुई थी। इसी दिन 60-70 की संख्या में पुलिस और अर्द्धसैनिक बल गांव में आ धमके और मृत्य जन की अंत्येष्टि करने के लिए जुटे ग्रामीण जनता के साथ मारपीट करने लगे, वह भी बिना कुछ जायजा लिए या पूछताछ किए। इस तरह से हम ग्रामीणों पर जुल्म किया गया। गांव के किसुन बास्के को गाली-गलौच करते हुए थप्पड़ मारा गया।’

आवेदन में आगे लिखा है, ‘12 अक्तूबर, 2020 को भी पुलिस ने गांव में आकर लोगों के साथ बदतमीजी की थी। 21 मई, 2003 को निर्दोष ग्रामीण जनता छोटे लाल किस्कू को नक्सली बताकर मुंह में गोली मारी गई थी और छोटू किस्कू, सुरेश सोरेन समेत लगभग 70 वर्षीय मंगला किस्कू को मारा-पीटा गया था। इतना ही नहीं 2015 में भी रोला लकड़ी काटने के लिए जंगल गए आठ व्यक्तियों को पकड़कर गंभीर रूप से मारा-पीटा गया था।

उनके नाम निम्न हैं- मांजो मरांडी, बीरू हांसदा, चरण हांसदा, चारो हेम्ब्रम, जीतन हांसदा, चिनू मरांडी, एतवारी मुर्मू व छोटेलाल हांसदा। इसी तरह 9 जून, 2017 को पुलिस ने नक्सली बताकर मोती लाल बास्के (डोली मजदूर) के सीने पर 11 गोली उतार दी थी।’

मुख्यमंत्री को दिए गए आवेदन में ग्रामीणों ने लिखा है, ‘2003 से लेकर अभी तक ढोलकट्टा के ग्रामीण जनता पर पुलिसिया जुल्म होता चला आ रहा है। अब ढोलकट्टा में पुलिस कैंप स्थापित करने की कोशिश जारी है, वह भी ग्रामीण जनता की खतियानी और रैयती जमीन पर।’ ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से मांग की है किढोलकट्टा गांव में पुलिस कैंप स्थापित न किया जाए और गरीब आदिवासी जनता को पुलिस के दमन-अत्याचार से बचाया जाए।

मुख्यमंत्री से मिलकर आवेदन देने वालों में शामिल ग्रामीण भगवान दास किस्कू ने बताया कि मुख्यमंत्री ने हमें आश्वासन दिया है कि वहां पुलिस कैंप नहीं लगेगा और जनता पर पुलिस का दमन-अत्याचार नहीं होगा। 9 जून, 2017 को सीआरपीएफ कोबरा की गोली से नक्सली बताकर मारे गए आदिवासी डोली मजदूर मोतीलाल बास्के भी ढोलकट्टा गांव के ही रहने वाले थे, इस मामले में नयी सरकार फिर से जांच भी करवा रही है। मुख्यमंत्री से आज मिलने वालों में मोतीलाल बास्के की पत्नी पार्वती मुर्मू भी शामिल थीं। उन्हें भी मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि उन्हें जरूर न्याय मिलेगा।

मुख्यमंत्री के आश्वासन से इतर जाकर देखें तो झारखंड के पश्चिम सिंहभूम, खूंटी, गिरिडीह आदि जिले में अर्द्ध सैनिक बलों की जनता पर ज्यादती की घटनाएं लगातार देखने को मिल रही हैं, लेकिन इन पर कभी मुकदमा दर्ज नहीं होता है। सवाल उठता है कि क्या ग्रामीण आदिवासियों के साथ मारपीट करने वाले अर्द्धसैनिक बलों पर मुकदमा भी दर्ज होगा या सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहेगा?

(झारखंड से स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट।)

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