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खतरे में है झारखंड की पंचायती राज व्यवस्था

कुमार संजय

झारखंड सरकार राज्य में विकेंद्रीकृत शासन प्रणाली को सुनियोजित तरीके से समाप्त करने पर तुली हुई है। मुख्यमंत्री के आदेश पर राज्य के मंत्रीमंडल ने यह निर्णय लिया है कि राज्य के सभी 32,000 गांवों में ग्राम विकास समिति तथा आदिवासी विकास समिति का गठन कर ग्रामीण विकास का कार्य किया जायेगा। छोटे-छोटे विकास कार्यों की जिम्मेदारी इन्हीं विकास समितियों के जिम्मे होगी। ये समितियां पांच लाख रुपए तक के काम कराएंगी। ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज) के इस प्रस्ताव को 13 मार्च 2018 को कैबिनेट ने मंजूरी भी दे दी है। लेकिन इन समितियों का निर्माण और इनके माध्यम से ग्रामीण विकास का कार्य कराया जाना संविधान के 73वें संशोधन के खिलाफ तो है ही साथ ही यह झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में लागू 5वीं अनुसूची का भी खुला उल्लंघन है।

झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद से राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों को विशेष गति देने के लिये ग्राम पंचायतों को ग्राम विकास से सम्बंधित आयोजन-नियोजन और क्रियान्वयन का अधिकार और जिम्मा दिया गया है और इस पंचायती राज व्यवस्था को कानूनी मान्यता भी प्राप्त है, साथ ही राज्य के विभिन्न विभागों ने अधिसूचना जारी कर तमाम तरीके की सम्बंधित गतिविधियां भी पंचायतों को सौंपी है। लेकिन ठीक इसके उलटे राज्य सरकार पंचायती राज संस्थानों को मजबूत करने के बदले में ग्राम विकास समिति तथा आदिवासी विकास समिति के माध्यम से मनमाने तरीके से नियम एवं कानूनों को ताक पर रख कर ग्राम पंचायत के अस्तित्व और इसकी उपयोगिता पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

राज्य सरकार के द्वारा झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 की धारा 71के अनुसार ‘ग्राम पंचायतों’ की स्थायी समितियों का गठन कर उनकों कार्य भी सौंपे गये हैं और इसके लिये पंचायती राज विभाग के द्वारा 16 मई 2011 को अधिसूचना भी जारी भी की गई थी। लेकिन इन सबके विपरीत पुनः इसी विभाग के द्वारा गैर-कानूनी से तरीके से ग्राम विकास समितियों को स्थापित किया जा रहा है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राज्य सरकार के इस निर्णय से राज्य में एक बिचैलियों का एक बड़ा वर्ग खड़ा हो जायेगा क्योंकि इन समितियों के बनते समय स्थानीय समुदाय, संवैधानिक संस्था ‘ग्राम सभा’और पंचायतों की कोई भूमिका नहीं है साथ ही इनकी कार्यप्रणाली में ऐसे कई दोष हैं जिससे कि ‘लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण’ की दिशा और कमजोर होंगी। मसलन प्रखंड स्तरीय अधिकारियों को ही सारा प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार दिया गया है।

झारखंड 5वीं अनुसूची का इलाका है और आदिवासी क्षेत्रों में ‘ग्राम सभा’की भूमिका को सर्वोपरि माना गया है और इसके लिये 1996 में केंद्रीय कानून ‘पेसा’के तहत गांवों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये ‘ग्राम सभा’को विशेष शक्तियां सौंपी गयी हैं, साथ ही झारखंड पंचायत राज अधिनियम की धारा 10 में भी ग्राम सभाओं को अधिकार एवं कार्य दिये गये हैं। पेसा कानून के तहत आदिवासी क्षेत्रों की विशेष जरूरतों का ध्यान रखते हुए ग्रामसभा को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देने से ही स्थायी तौर पर क्षेत्र के लोगों का उत्थान हो सकता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार के द्वारा पेसा को लागू करने के लिये उचित व न्यायसंगत नियम ना बनाकर ‘आदिवासी विकास समिति’ के माध्यम से पेसा कानून की मूल भावना को ही खत्म किया जा रहा है।

ज्ञात हो कि क्षेत्र के 100 से ज्यादा घर वाले गावों में 11 और 100 से कम घर वाले गावों में 9 सदस्यीय आदिवासी विकास समिति बनेगी। आदिवासी विकास समिति में एक अध्यक्ष, एक सचिव और एक कोषाध्यक्ष होंगे। अनुसूचित क्षेत्रों और 50 फीसदी से अधिक एसटी आबादी वाले गावों में आदिवासी विकास समिति और शेष गांवों में ग्राम विकास समितियों का गठन किया जाएगा।

समितियों के गठन के लिए पंचायत सेवक गांव के वयस्क सदस्यों की आमसभा बुलाई जाएगी। कार्यकारी अध्यक्ष आमसभा के माध्यम से समिति के पदाधिकारियों व सदस्यों का चुनाव आम सहमति से कराएंगे। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि झारखंड में ‘आम-सभा’ की कोई धारणा ही नहीं है। आम सभा के नाम पर सरकारी अधिकारियों के द्वारा विभिन्न योजनाओं का निर्णय एवं संचालन किया जा रहा है जिसमें स्थानीय निकायों की कोई भूमिका नहीं है। इस प्रक्रिया के द्वारा सरकार अपने ही द्वारा बनायी गई ‘ग्राम सभा काम-काज नियमावली 2003’ का विरोध कर रही है।एक और महत्वपूर्ण बात है कि योजना के लिए 80 प्रतिशत राशि सरकार देगी और 20 प्रतिशत राशि ग्रामीण श्रमदान के रूप में देंगे, लेकिन ग्रामीण निर्धन परिवार किस प्रकार इस योगदान में शामिल हो पायेंगे इसमें भी संदेह है।

सबसे अलोकतांत्रिक कार्य सरकार यह करने जा रही है कि इन समितियों को प्रभावी बनाने के लिये सरकार ‘14वें वित्त आयोग’की राशि जो पंचायतों को सीधे केंद्र के द्वारा हस्तांतरित की जाती है उसमें भी सरकार संशोधन करने का मन बना चुकी है और इस संदर्भ में 9 मई 2018 को ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव के द्वारा चिट्ठी भी सम्बंधित विभागों को भेज चुकी है। वर्तमान सरकार चाहती है कि 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुसार मिलने वाली राशि का मालिकाना हक भी इन समितियों के पास हो जो कि केंद्र के निर्देशों का भी उल्लंघन है। मनरेगा कानून के अनुसार मनरेगा योजनाओं की कम-से-कम 50 प्रतिशत राशि ग्राम पंचायतों के माध्यम से खर्च होनी चाहिए परंतु सरकार की मंशा है कि इस राशि का खर्च भी ग्राम विकास समितियां करें जो कि एक असंवैधानिक कदम है।

सरकार की इन समितियों का सभी वर्ग के लोग विरोध कर रहे हैं तथा गांवों में भी समितियों को बनाने के क्रम में भी काफी विरोधाभास नजर आ रहा है लेकिन सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। झारखंड के 4400 ग्राम पंचायतों में से 3000 से भी ज्यादा मुखिया सरकार के इस कदम से काफी नाराज चल रहे हैं और जगह-जगह प्रदर्शन भी हो रहे हैं लेकिन नतीजा कुछ भी निकल नहीं पा रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी, जो कि किसी भी सरकार के लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये घातक है।

( कुमार संजय गवर्नेंस प्रोग्राम, प्रदान, झारखंड के राज्य संयोजक हैं।)

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This post was last modified on November 30, 2018 3:41 pm

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