झारखंड: पलामू टाइगर रिजर्व से खत्म होते बाघ, बना तस्करों का अड्डा

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झारखंड के लातेहार जिले का पलामू टाइगर रिजर्व, भारत में 9 मूल टाइगर रिजर्व में से एक है और इस राज्य का एकमात्र टाइगर रिजर्व है। यह बेतला राष्ट्रीय उद्यान और पलामू वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा है। इसका क्षेत्रफल 1129.93 किमी. है, यह नवंबर 1973 में स्थापित हुआ था।

इस टाइगर रिजर्व क्षेत्र को 1974 में भारतीय वन अधिनियम के तहत संरक्षित क्षेत्र के रूप में अलग रखा गया था। रिज़र्व के गठन से पहले, इस क्षेत्र का उपयोग मवेशियों के चरने और डेरा डालने के लिए किया जाता था। 

पलामू टाइगर रिजर्व की स्थापना के समय बाघों की संख्या 50 थी। आजादी के बाद पहली बार देश में नौ टाइगर रिजर्व का गठन किया गया था, जिसमें झारखंड का एकमात्र पलामू टाइगर रिजर्व भी था। देश में वर्तमान में 54 टाइगर रिजर्व स्थापित हो गये हैं। देश के कई टाइगर रिजर्व में बाघों की अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई, लेकिन यह निराशाजनक विषय यह रहा है कि पलामू टाइगर रिजर्व में इनकी संख्या घटती गयी है। स्थापना के समय बाघों की संख्या घटकर 2018 में शून्य तक पहुंच गयी थी। हालांकि 2019, 2020, 2022 में बाघ के प्रमाण मिले। इस वर्ष भी हाल ही में प्रत्यक्ष रूप से एक बाघ देखा गया है।

पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की घटती संख्या देखें तो  साल 1974 में बाघों की संख्या 50 थी जो 1990 में घटकर 45 रह गई। 2005 तक यह संख्या घटकर 38 हो गई। 2006 में महज 17 बाघ ही रह गए। फिर 2007 और 2010 में मात्र 6 बाघ बचे थे। वहीं 2014 तक 3 बाघ बचे और 2018 में यह संख्या शून्य हो गई।

वहीं दूसरी तरफ झारखंड का यह एकमात्र टाइगर रिजर्व इन दिनों प्राकृतिक आपदा सहित शिकारियों और वन माफियाओं की मार झेल ही रहा है। जहां पर्याप्त बारिश नहीं होने से जंगल के जलाशय सूखे पड़े हैं, जिसकी वजह से पानी और चारे की कमी हो गयी है। दूसरी ओर शिकारियों और वन माफियाओं की सक्रियता भी काफी बढ़ गयी है। इतना ही नहीं, इन वन अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए विभागीय पदाधिकारियों एवं कर्मियों की कमी भी समस्या बनी हुई है।

पानी की कमी के कारण जंगल के जानवर रिहायशी इलाकों में पानी की खोज में भटकते हुए पहुंच रहे हैं, जहां पहले से मौजूद शिकारियों द्वारा उन्हें शिकार करने की प्रबल संभावना बनी हुई है। दूसरी अचानक से वन तस्कर भी सक्रिय हो गये हैं। जंगल को काटने वालों का गिरोह भी इन दिनों काफी सक्रिय हो गया है। हालांकि, विभागीय पदाधिकारियों का दावा है कि शिकारियों की धर-पकड़ और तस्करों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है। बावजूद इसके चकमा देकर अपने मंसूबे में कामयाब हो रहे हैं।

जानकारी के अनुसार जंगल के कीमती पेड़ों को काटने के लिए परंपरागत हथियार टांगी के अलावा चेनसॉ मशीन का भी प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। मोटर लगे इस मशीन के साथ तस्कर इन दिनों जंगल में घुस रहे हैं और मिनटों में पेड़ काटकर बाइक या साइकिल के जरिये लकड़ी लेकर माफियाओं तक पहुंचा दे रहे हैं। 

पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के अलग-अलग वन प्रक्षेत्र में रेंजर, फॉरेस्टर, फॉरेस्ट गार्ड एवं ट्रैकर गार्डों की संख्या पर्याप्त नहीं है। मैनपावर कम होने के कारण ट्रैकर गार्डों को जंगली जानवर बचाने की बजाय उन्हें अन्य कामों में लगाया जाता है। अकेले बेतला में ही 72 से अधिक ट्रैकर गार्ड कार्यरत हैं। उनमें से आधा ट्रैकर गार्ड को बेतला नेशनल पार्क के कैंपस सहित अन्य कार्यों में लगाया गया है। इस कारण जंगल की सुरक्षा कुछ ट्रैकर गार्ड के ऊपर निर्भर है। उनमें भी कई बुजुर्ग हैं जो जंगल में पूरी ड्यूटी नहीं कर पाते हैं। इतना ही नहीं, ट्रैकर गार्ड को समय पर मजदूरी भुगतान नहीं होने से उनमें काम करने का उत्साह भी कम देखा जाता है। 

इस बाबत में पीटीआर के क्षेत्र निदेशक कुमार आशुतोष ने बताया कि जंगली जानवरों के चारा पानी की व्यवस्था में कोई कमी नहीं है। कई जगहों पर सोलर सिस्टम से पानी को तालाब तक पहुंचाया जा रहा है। जो संसाधन उपलब्ध है उसके मुताबिक जंगली जानवरों की सुरक्षा में विभाग पूरी तरह से सतर्क है। वन अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए लगातार छापेमारी अभियान चलायी जा रही है। 

पिछले दिनों पलामू टाइगर रिजर्व के बेतला नेशनल पार्क सहित छिपादोहर पूर्वी क्षेत्र में सक्रिय वन तस्करों और शिकारियों की धरपकड़ के लिए वन विभाग के द्वारा विशेष अभियान चलाया गया। वन अपराधियों की सक्रियता बढ़ने की सूचना के बाद पीटीआर के नॉर्थ डिवीजन के डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जेना के निर्देश पर रेंजर शंकर पासवान के नेतृत्व में विशेष छापामारी अभियान चलाया गया। इस क्रम में अब तक कई वन तस्करों को गिरफ्तार किया गया है। भारी मात्रा में लकड़ी भी जब्त की गयी। पिछले एक सप्ताह के दौरान की गयी छापामारी में चार वन तस्करों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार किये गये वन तस्करों में केड़ के पांडू सिंह लेस्लीगंज थाना क्षेत्र के चपरना गांव के सुजीत भुइंया, मनिका थाना क्षेत्र के रांकी कला के ब्रह्मदेव मिस्त्री और सतबरवा थाना क्षेत्र के पोंची गांव के रंजीत भुइयां के नाम शामिल हैं। रबदी के जमुना यादव फरार है।

जानकारी देते हुए बेतला प्रक्षेत्र के वनपाल उमेश दुबे ने बताया कि विभाग के वरीय पदाधिकारियों के निर्देश पर जंगल की अवैध कटाई पर रोकथाम लगाने हेतु पिछले दो महीने से लगातार अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में पिछले सात मई को पांडू सिंह व सुजीत भुइंया को साइकिल ले जा रहे लकड़ी के साथ पकड़ा गया था। दूसरे दिन लगातार छापामारी अभियान में ब्रह्मदेव मिस्त्री के घर से भारी मात्रा में सागवान का बोटा, चौपहल आदि बरामद किया गया। चिलबिल, आसन, सनन के चिरान व आरा को भी जब्त किया गया है। अनुमान है कि करीब एक लाख रुपये की लकड़ी जब्त हुई है। यह अभियान आगे भी जारी रहेगा। जंगल जाने वाले लोगों पर वन विभाग की नजर है। वनपाल उमेश दुबे के अनुसार जंगल में लकड़ी काटने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। अब जलावन की लकड़ी लेने जाने वाले लोगों पर भी विभाग की कड़ी नजर है।

रेंजर शंकर पासवान ने कहा कि वन विभाग की टीम तस्करों के खिलाफ लगातार छापामारी अभियान चला रही है। अब तक एक दर्जन से अधिक लोगों को जेल भेजा जा चुका है। कई लोगों के खिलाफ वन अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। दिन-रात 24 घंटे वन विभाग की टीम के द्वारा गश्ती की जा रही है। उन्होंने आम नागरिकों से अपील की है कि जंगल अथवा जानवर को नुकसान पहुंचाने की सूचना मिलती है तो विभाग को अविलंब सूचित करें, तुरंत कार्रवाई होगी।

( विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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