Sun. Apr 5th, 2020

‘जनचौक’ ने किया था खुलासा: विरोध के बाद रद्द हुई पंचायती जमीन की पहली बोली

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पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार के खिलाफ राहुल गांधी को लिखे पत्र की प्रति दिखाते 'साडी पंचायत साडी जमीन' आंदोलन के संयोजक सिमरजीत सिंह बैंस:   

चंडीगढ़। ‘जनचौक’ ने पंचायतों की जमीन को कौड़ियों के भाव उद्योगपतियों को बेचने की तैयारी में पंजाब की सरकार की कोशिश पर दो खोज रिपोर्ट्स में विस्तृत खुलासा किया था कि किस तरह राज्य की मौजूदा कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार गांव-पंचायतों शामलात (सांझी) जमीनों को बेहद सस्ते दाम पर बेचने की तैयारी कर रही है। अब इस पर बाकायदा अमल शुरू हो गया है और पुरजोर तीखा विरोध भी। ‘जनचौक’ ने अपनी उक्त रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह पुराने नियम-कायदे और कानून बदल कर पंचायती जमीनों को पहले से अमीर उद्योगपतियों को सौंपने की नीति बना रही है। सरकार पर काबिज असरदार लोगों और पूंजीशाहों के इस ‘जमीन हड़पो’ नापाक गठजोड़ के खिलाफ ‘साडी पंचायत साडी जमीन’ आंदोलन की नींव भी रखी गई थी। हमारी उस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में उसका भी विशेष जिक्र था।                  

पंचायती जमीन की पहली बोली 12 मार्च को जिला लुधियाना के माछीवाड़ा ब्लॉक के गांव खानपुर मंड में रखी गई थी। लेकिन ‘साडी पंचायत साडी जमीन’ आंदोलन के संयोजक विधायक (लोक इंसाफ पार्टी) सिमरजीत सिंह बैंस की अगुवाई में ग्रामीणों के भारी विरोध की वजह से यह रद्द हो गई। खानपुर मंड की इस 20 एकड़ पंचायती जमीन पर पराली से तैयार होने वाले बायोगैस प्लांट लगाने का प्रस्ताव है। यह प्लांट निजी क्षेत्र को अलॉट किया गया है। इसलिए जमीन की बोली लगाने के लिए कई बड़े उद्योगपति भी आए हुए थे। स्थानीय ग्रामीणों के भारी विरोध के बाद सरकारी अमले और उद्योगपतियों को बैरंग लौटना पड़ा।       

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गांव खानपुर मंड में पंचायती जमीन की बोली करवाने भारी पुलिस बल के साथ लुधियाना के डीडीपीओ पीयूष चंद्र आए थे। डीडीपीओ की विधायक बैंस के साथ जमकर बहस हुई। बैंस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर बोली रद्द करने को कहा। लेकिन डीडीपीओ पीयूष बोली पर अड़े रहे। इस पर बैंस ने कहा कि अधिकारी सरकार की कठपुतली न बनें, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और लोकतंत्र से ऊपर कोई नहीं है।                                             

सूत्रों के मुताबिक सोची-समझी रणनीति के तहत गांव खानपुर मंड की पंचायत से 20 एकड़ जमीन उद्योग के लिए लीज पर देने का प्रस्ताव पारित करवाया गया था लेकिन अब नया प्रस्ताव पारित करके पंचायत ने जमीन देने से दो टूक इनकार कर दिया है। सरपंच हरमेश लाल के मुताबिक गांव वासियों के तीखे विरोध के मद्देनजर पंचायती जमीन उद्योगपतियों को नहीं दी जाएगी और पंचायत गांव वालों के साथ चलेगी।                                      

‘साडी पंचायत साडी जमीन’ आंदोलन की यह पहली कामयाबी है जिसने पंचायती जमीन की राज्य में पहली बोली को इस मानिंद निरस्त कर दिया। आंदोलन के कारकून समूचे पंजाब में फैलकर सरपंचों, पंचों और ग्रामीणों को सरकारी कवायद के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं। हालांकि इस मुहिम में हिंसक तकरार की भी आशंका है। इसलिए कि सूबे के बेशुमार गांवों की पंचायत राजनीति पर सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल शिरोमणि अकाली दल का कब्जा है। कांग्रेस ‘जमीन हड़पो’ अभियान की अगुवाई कर रही है तो शिरोमणि अकाली दल इस पर खामोशी अख्तियार किए हुए है।                         

‘साडी पंचायत साडी जमीन’ आंदोलन की अगुवाई करने वाले लोक इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष विधायक सिमरजीत सिंह बैंस कहते हैं, “पंजाब सरकार 1.53 लाख एकड़ पंचायती जमीन माफिया को सौंप कर राज्य के किसानों को बेरोजगार करना चाहती है। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पंचायती जमीनें औद्योगिक घरानों को बेचने की आड़ में खुद भी चंडीगढ़ के पास सैकड़ों एकड़ जमीन हड़पने की फिराक में हैं। कैप्टन व बादल दोनों मिले हुए हैं और जमीन की खरीद का खुला खेल खेल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि पंचायती जमीनें सिर्फ जनहित के कार्यों के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं लेकिन सरकार इन निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है।”      

इस बीच 14 मार्च को सिमरजीत सिंह बैंस ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को पत्र लिखकर कहा है कि वह पंजाब की पंचायती जमीनों की लूट रोकने के लिए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को निर्देश दें। अपने पत्र में बैंस ने राहुल गांधी से कहा है कि, “पंजाब सरकार पंचायती जमीनें कौड़ियों के दाम बेचने की तैयारी में है जबकि 2013 में कांग्रेस ने ही पंचायती जमीनें बचाने के लिए एलएआरआर कानून बनाया था। कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणापत्र में भी इस कानून की अहमियत को रेखांकित किया है, पर अब दूसरी तरफ उनकी पार्टी के ही मुख्यमंत्री ने पंजाब में लैंड बैंक एक्ट तैयार किया है, जिसके तहत पंचायती जमीनें सस्ते दाम पर बड़े उद्योगपतियों को बेची जानी है। गांव खानपुर से इसकी शुरुआत की गई लेकिन ग्रामीणों ने ऐसा होने नहीं दिया।”

(अमरीक सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)    

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