निरीह किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज के बाद झूठ से गलती छिपाने की फितरत

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उन्नाव में निरीह किसानों पर पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज ने अंग्रेज सरकार की पुलिस को भी पीछे छोड़ दिया है। मुआवजे की मांग कर रहे किसानों को पुलिस ने बेरहमी से दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। महिला, बुजुर्गों और विकलागों को भी पुलिस ने नहीं बख्शा। यही नहीं योगी सरकार की पुलिस ने लोगों को पीटकर पुलिस की जय बोलने को भी मजबूर किया। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (UPSIDC) की ट्रांस गंगा सिटी परियोजना के तहत शंकरपुर में किसानों की जमीन अधिग्रहीत की गई थी। किसान उसी जमीन के मुआवजे की मांग कर रहे हैं।

सरकार ने 2045 किसानों की भूमि ली थी। प्रशासन का कहना है कि 1925 किसानों को मुआवजा दिया जा चुका है। 134 किसानों का मुआवजा अभी भी बचा है। इन जमीनों को मुआवजा अब तक इसलिए नहीं मिल पाया है क्योंकि इनकी जमीनों के मालिकाना हक को लेकर विवाद था। 2001 में किसानों को इस जमीन के एवज में 1.5 लाख रुपये के हिसाब से मुआवजा दिया गया था। फिर 2007 में लगभग पांच लाख रुपये बढ़ा हुआ मुआवजा दिया गया। 2012 में एक्सग्रेसिया के तौर पर किसानों को तकरीबन सात लाख रुपये प्रति बीघा मुआवजा मिला। शर्तों के तहत किसानों को जमीन के एवज में छह फीसदी जमीन विकसित इलाके में दी जानी थी।

इस मामले में किसान महासभा ने मौके पर जाकर जांच की है। महासभा ने लखनऊ में जांच रिपोर्ट जारी की है। जांच दल ने पाया है कि उन्नाव में जमीन अधिग्रहण कानून का पालन सही तरीके से नहीं किया गया है। किसानों को उचित मुआवजा भी नहीं दिया गया। किसानों की भूमि का चार गुना मुआवजा देने की मांग कानूनन जायज है।

अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष राजीव कुशवाहा के नेतृतव में किसानों से मिलने जांच दल गया था। उन्होंने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की इस पूरी प्रक्रिया में किसानों से सहमति नहीं ली गई। किसानों के परिवार को नौकरी देने और विकसित जमीन पर 16 प्रतिशत जमीन देने के वादे से अब सरकार मुकर रही है। उन्होंने सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को 12.51 लाख प्रति बीघा मुआवजा देने की बात कह रही है, जबकि किसानों का कहना है कि सरकार सिर्फ 5.51 लाख रुपये बीघा मुआवजा दे रही है। खास बात यह है कि वहां जमीन का बाजार मूल्य 50 लाख रुपये बीघा चल रहा है। 

उन्होंने बताया कि किसानों को योजना में 16 प्रतिशत विकसित जमीन देने का वादा किया गया था, लेकिन अब उन्हें 10 फीसदी भूमि नहीं दी जा रही है और इसके बदले सात लाख रुपये अतिरिक्त किसानों को दिए गए हैं। अब बाकी बची छह प्रतिशत भूमि भी नहीं दी जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार विकसित जमीन के बदले दी गई इस सात लाख रुपये की राशि को भी मुआवजा बता कर झूठा प्रचार कर रही है।

किसान महासभा के जांच दल ने कहा कि किसान शंकर सराय में पिछले ढाई साल से धरने पर बैठे हैं। मगर योगी सरकार के पास किसानों से बात करने की फुरसत नहीं है।

किसान नेताओं ने बताया कि घटना के समय एक प्रोफेसर डॉ. वीएम पाल को पीट-पीट कर पुलिस की जय बोलने को मजबूर किया गया। 60 साल के विकलांग किसान सुशील त्रिवेदी को बेरहमी से पीटा गया। किसानों की 100 से अधिक मोटर साइकिलों को जेसीबी से रौंद दिया गया। बुलिस की बर्बर कार्रवाई में 40 से ज्यादा किसान घायल हैं। 15 से ज्यादा किसान गिरफ्तार किए गए हैं।

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि पुलिस बर्बता का शिकार किसानों पर ही दो-दो एफआईआर भी दर्ज की गई हैं। पहला मामला यूपीएसआईडीसी की तरफ से दर्ज कराया गया है, जिसमें किसानों के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने उन पर हमला किया और एक जेसीबी तोड़ दी। इसमें दो लोगों के घायल होने की बात कही गई है। दूसरा मामला पुलिस की तरफ से दर्ज कराया गया है। इसमें किसानों पर मारपीट का आरोप है। पुलिस ज्यादती का शिकार किसानों की तरफ से फिलहाल कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है।

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