Sat. Apr 4th, 2020

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एएमयू कांड की जांच पूरी नहीं की, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिसिया कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में नहीं दाखिल की है।

नतीजतन हाईकोर्ट ने सोमवार को सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिसिया कार्रवाई पर सुनवाई के लिए एक सप्ताह तक के लिए स्थगित कर दिया। मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वकील को अपना जवाब पूरा करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है।

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याचिकाकर्ता के वकील का कहना है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अनावश्यक जांच कर रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वकील को अपना निर्देश पूरा करने के लिए समय दिया गया है। वे सुनवाई की अगली तिथि तक निर्देश ले सकते हैं। पिछले महीने हाईकोर्ट ने एनएचआरसी को निर्देश दिया था कि वह पुलिस के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की जांच करे और पांच सप्ताह के भीतर इस जांच को पूरा करे।

इस मामले के बारे में पीआईएल मोहम्मद अमान खान ने दायर की है। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्र 13 दिसंबर 2019 से नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। हालांकि, 15 दिसंबर 2019 को अर्ध सैनिक बल और राज्य पुलिस ने बिना किसी उचित कारण के एएमयू के छात्रों पर लाठियां बरसाईं। रबर बुलेट और पैलेट फ़ायरिंग के अलावा भारी मात्रा में आंसू गैस के गोले छोड़े।

हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर याचिका उस समय दायर की गई जब उच्चतम न्यायालय ने 17 दिसंबर 2019 को विश्वविद्यालय छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ जांच करने के आवेदन पर ग़ौर करने से इनकार कर दिया था। चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने याचिकाकर्ता से कहा था कि वह इस मामले में हाईकोर्ट में जाएं।

इसके पहले चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस विवेक वर्मा की खंडपीठ ने मोहम्मद अमन खान द्वारा 15 दिसंबर, 2019 को एएमयू में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आयोग को पांच सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिए थे। इस मामले को फरवरी 17 के लिए सूचीबद्ध किया था। याचिका में कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के खिलाफ 13 दिसंबर से शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे।

15 दिसंबर को ये छात्र मौलाना आजाद पुस्तकालय के आसपास जमा हुए और विश्वविद्यालय गेट की ओर मार्च किया। आरोप है कि विश्वविद्यालय गेट पर पहुंचने पर वहां तैनात पुलिस ने छात्रों को उकसाना शुरू कर दिया, लेकिन छात्रों ने प्रतिक्रिया नहीं दी। कुछ समय बाद पुलिस ने इन छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़ने शुरू कर दिए और उन पर लाठियां बरसाईं, जिसमें करीब 100 छात्र घायल हो गए। याचिका में गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने, उन पर मुकदमा उठाने, घायल छात्रों का इलाज कराने, मुआवजा दिए जाने, दोषी पुलिसकर्मियों को दंडित करने सहित तमाम मांगें की गई हैं।

राज्य सरकार की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल किया गया है और पुलिस कार्रवाई का बचाव किया गया है। राज्य ने दलील दी कि विश्वविद्यालय का गेट छात्रों द्वारा तोड़ दिया गया था और विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुरोध पर पुलिस ने हिंसा में लिप्त विद्यार्थियों को काबू में करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश किया और इस कार्रवाई के दौरान कोई अतिरिक्त बल प्रयोग नहीं किया गया।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बीती 15 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून और नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहा था, जो हिंसक हो उठा था। छात्र और पुलिसकर्मियों की झड़प में में 100 लोग जख्मी हो गए थे। इनमें कुछ पुलिसकर्मी भी शामिल थे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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