Wednesday, May 18, 2022

पत्रकार किशोर ह्यूमन की गिरफ्तारी के खिलाफ संगठनों और शख्सियतों ने लिखा सीएम धामी को पत्र

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देहरादून। स्वतंत्र पत्रकार किशोर ह्यूमन की गिरफ्तारी उत्तराखंड में बड़ा मुद्दा बन गयी है। न केवल पत्रकारिता जगत के लोग बल्कि समाज और राजनीति का संवेदनशील तबका भी अब आगे आकर इसका विरोध करने लगा है। इसी कड़ी में कुछ गणमान्य व्यक्तियों और संगठनों ने सीएम पुष्कर धामी को पत्र लिखकर उनको तत्काल रिहा करने और संबंधित अधिकारियों को दंडित करने की मांग की है।  

आपको बता दें कि पिथौरागढ़ के युवा पत्रकार किशोर ह्यूमन को 24 फरवरी, 2022 को कथित तौर पर कुछ मनगढ़ंत किस्म के आरोप लगाने के बाद पुलिस द्वारा गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया था। इतने दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक उन्हें छोड़ा नहीं गया है। इसको लेकर उत्तराखंड में कई प्रदर्शन भी हो चुके हैं। बावजूद इसके सरकार उनकी रिहाई की दिशा में अब तक कोई पहल नहीं की है।

मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा गया है कि “यह बेहद अफसोसजनक कि किशोर ह्यूमन की गिरफ्तारी को एक हफ्ता होने को है, लेकिन आप की तरफ से इस घटना पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है। राज्य के मुखिया होने के साथ ही गृह विभाग भी आपके पास होने के चलते, आपको स्पष्ट करना चाहिए कि इस अन्यायपूर्ण गिरफ्तारी में क्या आपकी सहमति भी शामिल है? महोदय, यदि आपकी सहमति शामिल नहीं है तो मनमाने तरीके से किशोर ह्यूमन को जेल भेजने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही क्यूँ नहीं हो रही है?” 

पत्र में आगे कहा गया है कि “किशोर ह्यूमन की गिरफ्तारी के पीछे पिथौरागढ़ पुलिस का तर्क है कि किशोर ने सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की। अनुसूचित जाति के व्यक्ति की हत्या होने और अनुसूचित जाति के पिता द्वारा अपनी पुत्री से बलात्कार के आरोप लगाने की रिपोर्टिंग करना यदि जातियों के बीच सौहार्द बिगाड़ने की श्रेणी में रख कर गिरफ्तारी होगी तो ऐसे में तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को ही सिर के बल खड़ा कर दिया जाएगा”।

पत्र में पिथौरागढ़ की पुलिस की भूमिका को संदिग्ध बताया गया है। इस मामले में एक एसपी का नाम सामने आ रहा है। संगठनों ने कहा है कि “पिथौरागढ़ पुलिस ने सोशल मीडिया पर की गयी पोस्ट में लिखा है कि पुलिस ने पिथौरागढ़ के पुलिस अधीक्षक लोकेश्वर सिंह के निर्देश पर किशोर ह्यूमन को गिरफ्तार करने की कार्यवाही की है। इसलिए यह स्पष्ट है कि किशोर ह्यूमन के उत्पीड़न के पीछे पिथौरागढ़ के एसपी लोकेश्वर सिंह हैं”।

पत्र में आगे अनुसूचित जाति के उत्पीड़न से जुड़ी धाराओं और उसमें सजा के प्रावधान का विस्तार से वर्णन किया गया है। पत्र के मुताबिक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 2 (ii) कहती है कि कोई भी व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है- “मिथ्या साक्ष्य देगा और गढ़ेगा जिससे उसका आशय अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को ऐसे अपराध के लिए जो मृत्यु दंड से दंडनीय नहीं है किंतु सात वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है, दोषसिद्ध कराना है या वह जानता है कि उससे उसका दोषसिद्ध होना संभाव्य है, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी, किंतु जो सात वर्ष या उससे अधिक की हो सकेगी और जुर्माने से, दंडनीय होगा ; ”

साथ ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 2(vi) में प्रावधान है कि “यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि इस अध्याय के अधीन कोई अपराध किया गया है, वह अपराध किए जाने के किसी साक्ष्य को, अपराधी को विधिक दंड से बचाने के आशय से गायब करेगा या उस आशय से अपराध के बारे में जानकारी देगा जो वह जानता है या विश्वास करता है कि वह मिथ्या है, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा ;या ”

संगठनों का कहना है कि चूंकि किशोर ह्यूमन पर जिन मामलों की रिपोर्टिंग के कारण सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का झूठा मुकदमा दर्ज किया गया है, वे अनुसूचित जाति के व्यक्तियों से संबंधित हैं, स्वयं किशोर ह्यूमन भी अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं और यह स्पष्ट है कि पिथौरागढ़ के एसपी लोकेश्वर सिंह ने यह जानते हुए भी किशोर ह्यूमन को झूठे मुकदमें मे फंसाया, जो कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की उपरोक्त वर्णित धाराओं के तहत गंभीर अपराध है।

मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में संगठनों ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 2(vii) में यह प्रावधान है कि “लोक सेवक होते हुए इस धारा के अधीन कोई अपराध करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष से कम नहीं होगी किंतु जो उस अपराध के लिए उपबंधित दंड तक हो सकेगी, दंडनीय होगा।”

इतना ही नहीं पत्र में मामले से जुड़े एसपी लोकेश्वर सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गयी है। इसमें कहा गया है कि “चूंकि पिथौरागढ़ के एसपी श्री लोकेश्वर सिंह ने किशोर ह्यूमन को झूठे मुकदमें में फंसा कर उक्त अधिनियम के तहत अपराध किया है, इसलिए उनके विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए”।

इस सिलसिले में भी दलित उत्पीड़न संबंधी धाराओं का उल्लेख किया गया है। जिसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4(1) में प्रावधान है कि “ कोई भी लोकसेवक, जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उसके द्वारा पालन किए जाने के अपेक्षित अपने कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी, किंतु जो एक वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा।”

अंत में कहा गया है कि यह स्पष्ट है कि पिथौरागढ़ के एसपी लोकेश्वर सिंह और पिथौरागढ़ पुलिस ने अनुसूचित जाति के व्यक्तियों के विरुद्ध हुए अपराधों में कार्रवाई के बजाय उक्त मामलों की रिपोर्टिंग करने वाले अनुसूचित जाति के पत्रकार किशोर ह्यूमन के विरुद्ध झूठा मुकदमा दर्ज कर जेल भेज कर, उत्पीड़ित किया। अतः पिथौरागढ़ के एसपी श्री लोकेश्वर सिंह एवं अन्य जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की ऊपर वर्णित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर वैधानिक कार्यवाही अमल में लायी जाये।

हस्ताक्षर करने वालों में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पूर्व रजिस्ट्रार जनरल और सेवा निवृत्त जिला जज कांता प्रसाद, महिला सामाख्या की पूर्व निदेशक गीता गैरौला, भाकपा मामले के गढ़वाल सचिव इन्द्रेश मैखुरी, राष्ट्रीय सेवा दल के राष्ट्रीय सचिव जबर सिंह वर्मा, चेतना आंदोलन के शंकर गोपालकृष्णन, गढ़वाल विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष अंकित उछोली और एसएफआई के प्रदेश अध्यक्ष नितिन मलेठा शामिल हैं।

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