Saturday, October 16, 2021

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पेसा कानून से अनजान अफसरों को मिली कानून लागू करने की जिम्मेदारी

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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर।छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के लंबे संघर्ष के बाद बने दबाव और चुनावी महौल के मद्देनजर 23 सालों में पहली बार राज्य सरकार पंचायत उपबन्ध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 पेसा कानून के तहत विशेष ग्राम सभा आयोजित करने जा रही है। बीते कई सालों से सरकार ने अनुसूचित क्षेत्रों के मूल निवासियों के लिए पारित पेसा कानून 1996 को नजरअंदाज कर कानून का मखौल उड़ाते हुए पंचायती राज अधिनियम 1994 को ग्राम सभा पर असंवैधानिक रूप से थोपते आई थी।

छत्तीसगढ़ शासन ने एक आदेश में कहा है कि अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत उपबंध का विस्तार अधिनियम 1996 के अंतर्गत पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में 10 एवं 11 जून को विशेष ग्राम सभा का आयोजन किया जाएगा जो प्रदेश के 27 जिलों में से 13 पर पूर्णतः एवं 6 जिले में आंशिक रूप् से अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम 1996 के अंतर्गत आते है। इनमें 5055 ग्राम पंचायतें आती हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने ग्राम सभा में 4 विभागों को समाहित किया है जिसमें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग,वन विभाग,आदिम जाति अथवा अनुसूचित जाति विकास विभाग शामिल है। जबकि अनुसूचित क्षेत्रों की सबसे विकराल समस्या अनुसूचित जन जाति की जमीनों पर अवैध कब्जा, धोखाधड़ी से बिक्री, सामुदायिक वन पट्टा, गौण खनिज लीज सर्वेक्षण खनन, भू-अर्जन पूर्व पेसा ग्रामसभा की निर्णय, अनुसूचित क्षेत्र में अवैध नगरीय निकाय गठन जैसे मुद्दों को गायब कर चुनाव में राज्य सरकार की जन लोक लुभावन योजनाओं की विज्ञापन मात्र है।

संसद में सिर्फ दो ही कानूनों को शत-प्रतिशत बहुमत से पारित किया गया था, पहला पंचायत उपबन्ध का अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम 1996 (पेसा कानून) दूसरा, वन अधिकार मान्यता कानून 2006 संशोधित 2012। लेकिन इन दो कानूनों को लागू करने में राज्य सरकार की प्रशासनिक मिशनरी विफल रही है। जबकि इन दो अधिनियम से ही अनुसूचित क्षेत्रों की मौलिक समस्याओं के निराकरण के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की प्रत्यक्ष भागीदारी हो सकती है।आदिवासियों के लिए कानून तो बनाए गए हैं लेकिन सरकारों ने इन कानूनों को धरातल पर लागू नहीं किया।

आज भी प्रदेश के कलेक्टरों को पेसा कानून (अनुसूचित क्षेत्रो में विस्तार 1996), वनाधिकार अधिनियम 2006, पेसा ग्रामसभा व सामान्य ग्रामसभा में क्या अंतर है, इसकी जानकारी नहीं है। प्रशासनिक व्यवस्था भी सामान्य क्षेत्र के कानून को अनुसूचित क्षेत्र में थोप कर ग्रामसभा करवाती है। पेसा कानून लाने का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करने, सार्वजनिक संसाधनों पर बेहतर नियंत्रण और लोकतंत्र में प्रत्यक्ष सहभागिता करना था। केरल बनाम भारत के मामले में सुप्रीम कोर्ट  ने फैसला सुनाया कि जिसकी जमीन उसका खनिज। इसका मूल उद्देश्य था कि ‘‘मावा नाटे, मावा राज।’’ सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में वेदांता मामले में फैसला दिया था कि लोकसभा और विधानसभा से ग्रामसभा ज्यादा महत्वपूर्ण है। अनुसूचित क्षेत्रों में राज्य सरकार एक व्यक्ति के समान है जो कि गैर आदिवासी है। इसलिए अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र व राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। कैलाश वर्सेज महाराष्ट्र में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दी कि 7ःआदिवासी ही इस देश की मूल बीज हैं बाकी इम्मीग्रन्स्ट की संतानें हैं। आदिवासियों की लम्बी लड़ाई के बाद 73 वें संविधान संशोधन में पेसा कानून को सम्मिलित किया गया।

पेसा ग्राम सभा को लेकर आदिवासी हो रहे हैं जागरूक

खबर है कि पेसा के तहत विशेष ग्राम सभा को आदिवासी समुदाय के वर्षो से लंबित ग्राम सभा में अनुसूचित क्षेत्र की संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्यवाही व संचालन के लिए एक प्रस्ताव राज्य सरकार को दी जा रही है। जिसके लिए अनुसूचित क्षेत्रो में आदिवासियों को जागरूक किया जा रहा है। लोग भारत का संविधान व पेसा अधिनियम, भू राजस्व संहिता 1959, वनाधिकार अधिनियम 2006 की किताबें लेकर घूमते दिखाई दे रहे हैं। सूत्रों की माने तो अजा, अपिव व आदिवासियों ने 15 से 20 बिंदु के तहत एजेंडा तैयार किया है।

ग्राम सभा को भी सरकार प्रचार का जरिया बना रही है। सर्व आदिवासी युवा समाज के अध्यक्ष विनोद नागवंशी कहते हैं कि सरकार एक तरफ तो 23 सालों बाद पेसा के तहत ग्राम सभा करा रही है उसे भी अपने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की जानकारी लेने के लिए। चुनावी वर्ष में सरकार ग्राम सभा को भी प्रचार का जरिया बना कर चल रही है। अनुसूचित क्षेत्र बस्तर में वनाधिकार पर काम कर रहे युवा सामाजिक कार्यकर्ता अनुभव शोरी कहते हैं-

‘‘पेसा कानून के अनुसार किसी भी ग्राम पंचायत में सरपंच, पंच व सचिव सर्वोच्च नहीं हैं ये सब पेसा ग्रामसभा के प्रति जवाबदेह व सभा की विश्वसनीयता तक ही कार्य कर सकते हैं, पारम्परिक ग्रामसभा सर्वोच्च होती है। सरपंच व सचिव पंच एक सरकारी एजेंट होते हैं पूरा अधिकार पारम्परिक ग्रामसभा के पास होता है। ग्रामसभा के निर्णय सर्वमान्य व सर्वोच्च हैं लेकिन इसके उलट व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्र की संवैधानिक प्रावधान से निरक्षर जिला प्रशासन द्वारा सरपंच व पंच को सर्वोच्च बता दिखाकर ग्रामसभा के प्रस्ताव निर्णय को अमान्य किया जा रहा है जो कि संविधान के मूल व्यवस्था के विपरीत है।’’

प्रदेश के कलेक्टर पढ़ेंगे पेसा कानून, जानेंगे आदिवासियों के अधिकार 

प्रदेश में विभिन्न मांगों को लेकर सर्व आदिवासी समाज के प्रांतीय पदाधिकारियों और छत्तीसगढ़  के मुख्य सचिव अजय सिंह के बीच हुई एक बैठक में समाज के मुखियाओं ने बात रखा कि प्रदेश के अफसर आदिवासी अधिकार के कानूनों को समझते नहीं हैं। इस बैठक के बाद मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ सरकार ने एजेंडा तय किया कि प्रशासन अकादमी ट्रेंनिग के दौरान अफसरों को पेसा कानून पढ़ाया जाएगा। इतने वर्षों तक अनुसूचित क्षेत्र में पदस्थ अफसर पेसा कानून को नहीं समझ पाए हैं, तो फिर आदिवासी हितों की बात करना एक सफेद हाथी के बराबर है।

‘‘अनुसूचित क्षेत्र में पदस्थ एक जिला कलेक्टर नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि प्रशासन आकादमी ट्रेंनिग के दौरान उन्हें पेसा कानून के बारे में नहीं बताया जाता है। पदस्थापना के बाद पता चलता है कि पेसा कानून के तहत अनुसूचित क्षेत्रांे में विस्तार के तहत ग्राम सभाए होती हैं। अभी तक ग्राम सभाएं पंचायती राज अधिनियम के तहत कराए जाते रहे हंै। सामान्य क्षेत्र और अनुसूचित क्षेत्र में कानून अधिकार भिन्न है।’’

जानिए क्या है पेसा अधिनियम-1996

पेसा कानून आदिवासी समुदाय की प्रथागत, धार्मिक एवं परंपरागत रीतियों के संरक्षण पर असाधारण जोर देता है। इसमें विवादों को प्रथागत ढंग से सुलझाना एवं सामुदायिक संसाधनों का प्रबंध करना भी सम्मिलित है। पेसा कानून एक सरल व व्यापक शक्तिशाली कानून है जो अनुसूचित क्षेत्रों की ग्रामसभाओं को क्षेत्र के संसाधनों और गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण प्रदान करता है।यह अधिनियम संविधान के भाग 9 जो कि पंचायतों से सम्बंधित है का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार करता है। पेसा कानून के माध्यम से पंचायत प्रणाली को अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार किया गया है। विकेंद्रीकृत स्वशासन का मुख्य उद्देश्य गांव के लोगों को स्वयं अपने ऊपर शासन करने का अधिकार देना है।

पेसा ग्रामसभा की शक्तियां और आदिवासियों के अधिकार 

  • अनुसूचित क्षेत्र की भूमि नियंत्रण, नियामन व निर्णय की शक्ति। पेसा की धारा 4(ड) यह व्यवस्था करती है कि अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि कब्जा तथा अजजा के व्यक्ति की गलत तरीके से कब्जा की गई भूमि को वापस दिलाने का अधिकार पेसा ग्रामसभा को है। इस प्रावधान के संदर्भ में भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 170ख में संशोधन कर नई उपधारा 2-क जोड़ी गई है।
  • पेसा की धारा 4 (ड)(प) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा ग्रामसभा उस गांव के भीतर मादक द्रव्यों के निर्माण, उसका कब्जा, परिवहन, मादक द्रव्यों की बिक्री, उपभोग की व्यवस्था हेतु नियम बनाकर नियंत्रण-प्रतिबंध लगाने की शक्ति है।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में साहूकारी अर्थात न तो धन उधार देगा और न ही लेगा पर पूर्ण प्रतिबंध करने की शक्ति पेसा ग्रामसभा को प्राप्त है। इस आदेश की उलंघन करने पर दो साल की कारावास या फिर 10 हजार तक कि जुर्माना या फिर दोनों दण्ड एक साथ का प्रावधान।
  • पेसा की धारा 4 (झ) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की भूमि अर्जन चाहे वह विकास परियोजना के लिए हो या किसी भी प्रकार की निर्माण भूमि प्रयोग के लिए हो भू अर्जन से पहले प्रभावित व्यक्ति गांव के पर्यावरण अध्ययन की रिपोर्ट, व्यवस्थापन एवं पुनर्वास की विस्तृत जानकारी पेसा ग्रामसभा को अवगत कराया जाना अनिवार्य है। उसके पश्चात ही पेसा ग्रामसभा का भू अर्जन का निर्णय अंतिम व सर्वमान्य का विशेष एकाधिकार शक्ति है।
  • गौण खनिज का नियंत्रण नियामन।पेसा एक्ट की धारा 4 (ट) (ठ) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के गांव की परंपरागत सीमा के अंदर गौण खनिज की नियंत्रण, खनन पट्टा, सर्वेक्षण, नीलामी या उपयोग करने की पूर्ण शक्ति पेसा ग्रामसभा को प्राप्त है।
  • लघु वनोपज की संग्रहन, मूल्य निर्धारण व विक्रय की शक्ति। पेसा अधिनियम की धारा 4 (ड)(पप) में यह प्रावधान है कि पेसा ग्रामसभा को गौण वनोपज (लकड़ी को छोड़कर सभी वनोउत्पाद) की संग्रहन,मूल्य निर्धारण व विक्रय(नीलामी) करने की शक्ति प्राप्त है।
  • वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 5 के तहत गांव की वनों को सुरक्षा संवर्धन नियंत्रण की सामुदायिक दावा की शक्ति।
  • गांव की बाजार नियंत्रण की शक्ति।
  • गांव की रूढिजन्य परम्परों की सुरक्षा सवर्धन की शक्ति।
  • पेसा एक्ट की धारा 4 (क) (ख) के अनुसार परम्परागत कानूनों सामाजिक, धार्मिक रूढ़ियों, प्रथाओं और सामुदायिक संसाधनों का परम्परागत प्रबंधन तकनीकों का आदिवासी जीवन में केंद्रीय भूमिका की पहचान करना और उन्हें अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन की मूलभूत सिद्धान्त बनाये रखना। रूढ़िगत प्रथाओं की संवर्धन संरक्षण में पेसा ग्रामसभा को एकाधिकार है।

पेसा ग्रामसभा अधिसूचना में ही पेसा एक्ट का उलंघन

छत्तीसगढ़ में वनाधिकार पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता विजेंद्र अजनबी कहते हैं कि सरकार का विशेष ग्राम सभा कराने का कलेक्ट्ररों को आदेश ही गैरकानूनी है! स्रकार को ग्राम सभा कराने के लिए जागरूकता लाने का काम करना चाहिए। सरकार यह अपने फायदे के लिए करा रही है। वहां मुद्दों की बात नहीं होगी। सरकारी अधिकारी ग्राम सभा के प्रमुख नही है, गांव के मुखिया अथवा अन्य ग्रामीण प्रमुख है।

पेसा कानून ड्राफ्टिंग के वक्त बीड़ी शर्मा के साथ काम किए सामाजिक कार्यकर्ता विजय भाई कहते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार अब तक गैर कानूनी काम करते आई है। आज तक सामुदायिक वन अधिकार पट्टे नहीं दिए गए हैं। यहां तक पेसा कानून में पहली दफा छत्तीसगढ़ में ग्राम सभा हो रही है। उस दौर में इस कानून को पारित कराने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई थी।

अनुसूचित क्षेत्रों के लिये पांचवी अनुसूची अनुच्छेद 244(1), पंचायत उपबंध का अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम 1996, वनाधिकार अधिनियम 2006 की  अधिसूचना कमशः देश के राष्ट्रपति व राज्यपाल के द्वारा जारी हुई हैं। परंतु इन कानूनों को कार्यपालिका के अधिकारी संविधान सम्मत सेवा करने की प्रतिज्ञा कर अज्ञानतावश उन्हीं हाथों से तोड़ रहे हैं। एक प्रकार से अनुसूचित क्षेत्र के नागरिकों के साथ यह संवैधानिक भेदभाव ही है। जिसके कारण ही इन क्षेत्रों में समन्वित विकास नहीं हो पा रही है तथा शांति कायम नहीं हो पा रही है। जबकि इन क्षेत्रों में आजादी से आज तक सर्वाधिक बजट आबंटित कर खर्च किया जा रहा है। यह खर्च कहां और कैसे हो रहा है इस पर भी गम्भीर सवाल खड़े होते हैं।

राज्य के अधिकारी आदिवासियों के संवैधानिक कानूनों के बारे में अनजान हैं। सर्व आदिवासी युवा प्रभाव के अध्यक्ष विनोद नागवंशी कहते हैं कि अभी हाल में पत्थलगड़ी का जो अभियान चला उसका ही परिणाम पेसा एक्ट में ग्राम सभा कराना है। सर्व आदिवासी समाज और सरकार के बीच हुई बातचीत में दो रिटार्यड आईएएस शामिल थे जिसमें हमने पहली बात तो यही रखी थी की पेसा कानून के अंतर्गत ग्राम सभा कराइए, दूसरा सारे प्रशासनिक अमले को पेसा कानून पढ़ाइए क्योकि वो इस कानून के बारे में जानते ही नहीं।’’

बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर कलेक्टर धनंजय देवांगन बात-चीत में कहते हैं कि, ’’पेसा एक्ट में ग्राम सभा होता है, लेकिन वह पंचायती राज अधिनियम 1994 को ही पेसा एक्ट के दायरे में लाते हैं, वे यह भी मानते हैं कि उनके प्रशासनिक ट्रेंनिग के दौरान उन्हें पेसा एक्ट के बारे में बताता गया था। लेकिन अभी भी सामान्य कानून के तहत होने वाले ग्राम सभा और पेसा एक्ट में अंतर समझ नहीं पाए हैं ।’’ वहीं अनुसुचित क्षेत्रो में रिपोर्टिंग कर रहे कई पत्रकारों को भी पेसा कानून के बारे में पता नहीं है। ज्यादातर पत्रकारों को पेसा एक्ट, वनाधिकार अधिनियम 2006, पांचवी अनुसूची 244(1) और आदिवादी कानूनों की जानकारी ही नहीं है।

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