Sat. Aug 24th, 2019

रघुवर सरकार के 1000 दिन पर शोर व फर्जी मुठभेड़ पर सरकारी चुप्पी

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झारखंड में भाजपा के रघुवर दास सरकार के 1000 दिन 22 सितम्बर 2017 को पूरे हुए। यह सरकार झारखंड की अब तक की सबसे लम्बी सरकार है। सरकार के 1000 दिन टिक जाने का प्रचार झारखंड सरकार ने लगातार कई दिनों तक अखबारों में विज्ञापन के जरिए करवाया, विज्ञापन में मुख्यमंत्री के बारे में बताया गया है, ‘‘24 घंटे, 365 दिन, दिल में एक चेहरा, जुबां पर सिर्फ एक नाम-झारखंड’’। 22 सितम्बर से पहले से ही पूरे राज्य में सरकारी खर्चे पर सरकार के 1000 दिन पूरे होने के उपलक्ष्य में बड़े-बड़े जलसे किए गये, जिसमें 17 सितम्बर को रांची में आयोजित जलसे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी भाग लिया। 1000 दिन के अवसर पर आयोजित हो रहे जलसे का समापन 22 सितम्बर को दुमका में हुआ, जिसमें गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भाग लिया।

इन जलसों में सरकारी खजाने से अरबों रूपये फूंक दिये गये, सिर्फ यह शोर मचाने के लिए कि रघुवर सरकार के 1000 दिन पूरे हुए। वहीं दूसरी तरफ गिरिडीह जिला के पारसनाथ पर्वत पर एक डोली मजदूर मोतीलाल बास्के की सीआरपीएफ कोबरा द्वारा दुर्दांत माओवादी बताकर 9 जून 2017को गोली मारकर हत्या कर दी जाती है, जिसके खिलाफ 11 जून से ही बड़े-बड़े आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन 24 घंटे काम करने वाली रघुवर सरकार का ध्यान अभी तक इस तरफ नहीं गया, आखिर क्यों ? जबकि अभी तक इस सवाल पर गिरिडीह बंद से लेकर विधानसभा मार्च तक का आयोजन किया जा चुका है (आंदोलन का तिथिवार ब्योरा आवेदन में है)। आखिर इस फर्जी मुठभेड़ पर सरकारी चुप्पी का क्या अर्थ लगाया जाए ? सरकारी चुप्पी के खिलाफ न्याय के लिए मोतीलाल बास्के की पत्नी भी कमर कस चुकी हैं और अब बहरों को सुनाने के लिए रांची का रूख कर रही हैं, जहां वे 9 अक्टूबर से राजभवन के सामने अनिश्चितकानील धरने पर अपने तीन बच्चों के साथ बैठेंगी और उनकी इस मुहिम में साथ देगा दमन विरोधी मोर्चा।

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एक तरफ वे अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वो अपने पति के माओवादी न होने के सबूत के साथ एक आवेदन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग समेत कई उच्च अधिकारियों को भी भेजकर अपने पति की हत्या की न्यायिक जांच कराने व उनके हत्यारे पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज कर कठोर से कठोर सजा दिलवाने की मांग करने वाली हैं। मोतीलाल बास्के की पत्नी पार्वती देवी, उनके तीनों बच्चों व दमन विरोधी मोर्चा के नेताओं का कहना है कि जब तक मोतीलाल बास्के के हत्यारों को सजा नहीं हो जाती, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।

(नीचे पार्वती देवी द्वारा भेजे गया आवेदन है।)

 सेवा में,

      अध्यक्ष महोदय

      राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली

विषय – मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच कराने व उनके हत्यारे पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज कर कठोर से कठोर सजा दिलवाने के संबंध में,

महाशय,

      सविनय कहना है कि मैं पार्वती मुर्मू, ग्राम-ढोलकट्टा, प्रखंड-पीरटांड़, जिला-गिरिडीह, राज्य-झारखंड की रहने वाली हूं, जहां मेरा मायका है, वैसे मेरी ससुराल झारखंड राज्य के ही धनबाद जिले के तोपचांची प्रखंड अंतर्गत चिरूवाबेड़ा में है, लेकिन कुछ साल से मैं सपरिवार मायके में ही रहती हूं। मेरे पति का नाम मोतीलाल बास्के था, जो 2003 से ही जैन धर्मावलम्बियों के प्रसिद्ध तीर्थस्थल व संथाल आदिवासियों के मरांग बुरु, जहां ‘जुग जहर’ स्थित है, पारसनाथ पर्वत पर स्थित चंद्र प्रभु टोंक के पास दाल-भात व सत्तू की छोटी सी दुकान चलाते थे और जैन तीर्थावलम्बियों को पारसनाथ पर्वत की परिक्रमा कराने के लिए डोली मजदूर का भी काम करते थे। साथ ही साथ वहां पर कार्यरत डोली मजदूरों के एकमात्र पंजीकृत संगठन ‘मजदूर संगठन समिति’ के सदस्य (डोली कार्ड  संख्या-2065) भी थे व एक आदिवासी होने के नाते आदिवासी संगठन ‘मरांग बुरू सांवता सुसार बैसी’ के भी सदस्य थे। वे प्रतिदिन की तरह 9 जून 2017 को भी सुबह 8 बजे अपनी दुकान पर जाने के लिये लुंगी-गंजी पहनकर व हाथ में कुल्हाड़ी लेकर जंगल के रास्ते से निकले, उनके जाने के लगभग 4 घंटे बाद जंगल में गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका गूंज उठा, लेकिन उस समय मुझे जरा भी संदेह नहीं हुआ कि ये गोलियां मेरे पति के ऊपर ही बरसायी जा रही हैं। लेकिन जब वे रात में लौटकर नहीं आए, तो मेरी चिंता बढ़ गयी। 10 जून की सुबह में मुझे मेरे ही एक ग्रामीण से सूचना मिली कि मेरे पति की हत्या सीआरपीएफ कोबरा के जवानों ने कर दी है और अखबार में छपा है कि मेरे पति एक दुर्दांत माओवादी थे। अखबार में ही यह भी छपा था कि मेरे पति की हत्या करने वाली टोली का नेतृत्व डुमरी एसडीपीओ अरविन्द सिन्हा कर रहे थे।

महाशय से कहना है कि अगर मेरे पति दुर्दांत माओवादी थे, तो जब मेरे पति 2003 से ही पारसनाथ पर्वत पर दुकान चला रहे थे व डोली मजदूरी का काम भी करते थे, जहां पर हमेशा सैकड़ों सीआरपीएफ के जवान मौजूद रहते हैं, तो फिर उसने मेरे पति को क्यों नहीं पकड़ा ? अगर मेरे पति दुर्दांत माओवादी थे, तो फिर मेरे पति को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास बनाने के लिए सरकार से पैसे कैसे मिले ? (मेरे पति मेरे गांव की प्रधानमंत्री आवास योजना के पहले लाभुक थे, उनके बैंक खाते में इसकी पहली किस्त भी आयी हुई है और आवास का निर्माण भी शुरू हो चुका था, लेकिन उनकी हत्या के बाद अभी तक वह अधूरा ही है।) अगर मेरे पति दुर्दांत माओवादी थे, तो 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित ‘मरांग बुरू बाहा पोरोब’ में उन्हें विधि व्यवस्था का दायित्व कैसे दिया गया, जबकि इसमें बतौर मुख्य अतिथि झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू शामिल हुई थीं ?

महाशय से कहना है कि झूठी वाहवाही लेने के लिए सीआरपीएफ कोबरा वालों ने मेरे पति को पकड़कर उनकी सामने से गोली मारकर हत्या की है। इस बात का प्रमाण भी है कि जब 9 जून को ही बगल के गांव के टीकूराम मुर्मू और श्यामलाल टुडू को पकड़कर जबरन मेरे पति की लाश को ट्रैक्टर पर रखवाया गया और दोनों को मधुबन थाना लाकर रात भर मेरे पति के बारे में पूछा गया और उन दोनों ने जब सब कुछ सच-सच मेरे पति के बारे में पुलिस अधिकारियों को बता दिया, तब क्यों पुलिसवालों ने मेरे पति को 10 जून के अखबारों में अज्ञात दुर्दांत माओवादी बताया? 1-2 गोलियां ही किसी भी इंसान की जान लेने के लिए काफी होता है, लेकिन आखिरकार क्यों हत्यारे सीआरपीएफ कोबरा वालों ने मेरे पति को सामने से 11 गोलियां मारी, यह इसी बात की ओर इशारा करता है कि मेरे पति को हत्यारों ने पकड़कर गोली मारी है।

महाशय से पूछना है कि क्या हमारे संविधान ने पुलिसकर्मिर्यों को यह अधिकार दिया है कि वे सरकारी खजाने से एक आदिवासी मजदूर के हत्यारों को पार्टी करने (दारू-मुर्गा) के लिए एक लाख रूपये दें, क्योंकि 10 जून को झारखंड के डीजीपी डी. के. पांडेय ने गिरिडीह एसपी अखिलेश बी. वारियार को हत्यारों की टोली को पार्टी देने के लिए एक लाख रूपये नगद दिया और 15 लाख रूपये बाद में देने की घोषणा भी की ?

महाशय को बताना है कि ऐसा भी नहीं है कि मेरे पति की हत्या के बाद आम जनता खामोश रही या सिर्फ मैं ही अपने पति की हत्या का आरोप सीआरपीएफ कोबरा वालों पर लगा रही हूं, बल्कि मेरे इलाके की लाखों जनता की बात मैं अपने मुंह से कह रही हूं। मालूम हो कि जैसे ही मेरे पति की हत्या की खबर उनके संगठन ‘मजदूर संगठन समिति’ व ‘सांवता सुसार बैसी’ के नेताओं को मिली, उन्होंने 11 जून को ही मधुबन के हटिया मैदान में बैठक कर मेरे पति को अपने संगठन का सदस्य बताया व सीआरपीएफ कोबरा पर नक्सल मुठभेड़ बताकर मेरे पति की हत्या का आरोप लगाया और इस घटना की न्यायिक जांच व हत्यारे पर मुकदमा दर्ज कराकर हत्यारे सीआरपीएफ कोबरा के जवानों व अधिकारियों को सजा दिलाने के लिए 14जून को महापंचायत का एलान किया, इस बैठक में कई जनप्रतिनिधि जैसे-प्रखंड प्रमुख, जिला परिशद सदस्य, कई पंचायत के मुखिया भी षामिल हुए थे। 12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन के जिला सचिव मनोज भक्त के नेतृत्व में एक टीम ने मुझसे मुलाकात की व मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच की मांग के साथ-साथ 15 जून को पूरे गिरिडीह जिला में प्रतिवाद दिवस मनाने की भी घोषणा की। 13 जून को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेता व पिछले विधानसभा चुनाव में झामुमो के प्रत्याषी सुदिव्य कुमार सोनू के नेतृत्व में एक टीम ने मुझसे मुलाकात की व झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन से मेरी बात भी कराई, इन्होंने भी मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच की मांग की। 14 जून के महापंचायत में मजदूर संगठन समिति व सांवता सुसार बैसी के साथ-साथ भाकपा (माले) लिबरेशन, झामुमो, झाविमो, विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के नेताओं के अलावा भी कई जनप्रतिनिधि व इलाके से दसियों हजार जनता शामिल हुई और सभी ने एक स्वर में मेरे पति को एक डोली मजदूर व दूकानदार बताया और सीआरपीएफ कोबरा को मेरे पति का हत्यारा। महापंचायत में ही मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच व हत्यारों को सजा दिलाने की मांग को लेकर आंदोलन करने के लिए ‘‘दमन विरोधी मोर्चा’’ का भी गठन किया गया, साथ ही मैंने इसी दिन मधुबन थाना में हत्यारे सीआरपीएफ कोबरा पर मुकदमा दर्ज करने के लिए एक आवेदन भी दिया। महापंचायत से गठित ‘दमन विरोधी मोर्चा’ ने 17 जून को मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में डीसी कार्यालय के समक्ष धरना, 2 जुलाई को पूरे गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस व 3 जुलाई को पूरा गिरिडीह जिला बंद की घोषणा की, कालांतर में ये सारे कार्यक्रम तय तिथि पर ही शानदार ढंग से संपन्न हुए। हां, इसमें एक बदलाव जरूर हुआ कि 21 जून को डीसी कार्यालय के समक्ष प्रस्तावित धरने को प्रषासन द्वारा परमिशन नहीं देने के कारण गिरिडीह में ही अंबेडकर चैक पर करना पड़ा, लेकिन मांगपत्र जरूर डीसी को ही सौंपा गया और उन्हीं के माध्यम से राज्यपाल व मुख्यमंत्री को भी मांगपत्र भेजा गया, इस धरना में भी हजारों लोग शामिल हुए, जबकि पुलिस ने मधुबन में जबरन हजारों लोगों को गिरिडीह जाने से रोक दिया था। 15 जून को ही मैंने अपने तीनों बच्चे के साथ रांची जाकर झारखंड विधानसभा के विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन से मुलाकात की, उन्होंने मेरे व मेरे बच्चों के साथ संवाददाता सम्मेलन कर मेरी मांगों को पुनः दोहराया और न्याय मिलने तक साथ देने का वचन भी दिया। लगातार जनदबाव बढ़ता देख झारखंड पुलिस मुख्यालय ने 16 जून को सीआईडी जांच की घोशणा की यानी कि हत्यारों को ही हत्या की जांच करने का हुक्म दिया गया ताकि जनांदोलन ठंडा पड़ जाए, लेकिन ‘दमन विरोधी मोर्चा’ के साथ मैं भी अपनी मांगों पर अड़ी रही। 20 जून को मेरे गांव ढोलकट्टा में झारखंड के पूर्व मंत्री व झामुमो नेता मथुरा महतो आए और हमारी मांगों से सहमति जताए। 21 जून को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन मेरे गांव आए और मेरे पति की हत्या का मामला लोकसभा व राज्यसभा मे उठाने का वादा किये। 1 जुलाई को मानवाधिकार संगठन सीडीआरओ की जांच टीम मेरे गांव आई और पूरे प्रमाण के साथ झूठी मुठभेड़ में मेरे पति की हत्या को साबित की, इस टीम ने अपनी अंतरिम जांच रिपोर्ट 2 जुलाई को गिरिडीह में प्रेस के सामने प्रस्तुत की। 12 जुलाई को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी मेरे गांव आए, उन्होंने भी हमारी मांगों का समर्थन किया व मुख्यमंत्री को खत लिखकर मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच की मांग की।

महाशय को बताना है कि इतना बड़ा व लगातार जनांदोलन होने के बाद भी जब झारखंड सरकार व गिरिडीह प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगी, तो ‘दमन विरोधी मोर्चा‘ ने 10 अगस्त को विधानसभा मार्च का एलान किया और इसकी तैयारी के लिए गांव-गांव में सभा करने की घोषणा की, जिसकी शुरूआत मेरे गांव ढोलकट्टा से 21 जुलाई को हुई, बाद में 22 जुलाई को बदगावां, 23 जुलाई को दालान चलकरी, 24 जुलाई को महुआटांड़, 25 जुलाई को मसनोटांड़, 26 जुलाई को कारी पहाड़ी व 27 जुलाई को हरलाडीह गांव में सभा किया गया। इसी बीच 20 जुलाई को आजसू के जुगलसलाई विधायक रामचंद्र सहिस के नेतृत्व में एक टीम मेरे गांव में आई और इस टीम ने भी न्यायिक जांच की मांग सरकार से की, मालूम हो कि आजसू का झारखंड में भाजपा के साथ गठबंधन है और यही गठबंधन अभी सत्ता में है। 25 जुलाई को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में विधानसभा में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन मेरे गांव आए और सरकार की कुंभकर्णी नींद पर आक्रोश जाहिर किए। 27 जुलाई को राज्यसभा में झामुमो के राज्यसभा सांसद संजीव कुमार ने मेरे पति की हत्या का सवाल उठाया व न्यायिक जांच की मांग की। 10 अगस्त के विधानसभा मार्च में गिरिडीह जिला से जा रहे तमाम लोगों की गाड़ियों को पुलिस ने रोक दिया, फलस्वरूप मधुबन में ही लोगों को सभा करनी पड़ी, लेकिन फिर भी सैकड़ों लोगों ने पुलिस की घेरेबंदी को धता बताते हुए विधानसभा मार्च किया व मांगों से संबंधित ज्ञापन विधानसभाध्यक्ष को सौंपा। 13 सितम्बर को गिरिडीह जिला के पीरटांड़ स्थित सिद्धू-कान्हू मैदान में दसियों हजार लोगों की एक सभा ‘दमन विरोधी मोर्चा’ के द्वारा ‘मजदूर संगठन समिति’ के केन्द्रीय महासचिव बच्चा सिंह की अध्यक्षता में की गई, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, झामुमो सांसद विजय हांसदा, झामुमो विधायक स्टीफन मरांडी, जयप्रकाश पटेल, मार्क्सवादी समन्वय समिति के विधायक अरूप चटर्जी, माले नेता पूरन महतो, सांवता सुसार बैसी के नेता सह प्रमुख सिकंदर हेम्ब्रम, विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के नेता दामोदर तुरी, आजसू नेता रविलाल किस्कू ने संबोधित करते हुए मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच व हत्यारे को सजा देने तक लड़ाई जारी रखने का एलान किया।

महाशय को बताना है कि मेरे तीन छोटे बच्चे हैं और मेरे घर का कमाऊ एकमात्र सदस्य मेरा पति ही था, जिसे हत्यारे सीआरपीएफ कोबरा वालों ने मुझसे छीन लिया और मेरे पति की हत्या को सही साबित करने के लिए उन्हें दुर्दांत माओवादी घोषित कर दिया, साथ ही उनकी हत्या का जश्न मनाने के लिए सरकारी खजाने से ही रूपये दिये गये। मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच व हत्यारों को सजा दिलाने के लिए लगातार आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी सरकार का कोई अदना सा अधिकारी भी मुझसे मेरे पति की हत्या की बावत पूछने तक नहीं आया।

         अतः महाशय से उम्मीद व आशा है कि आप जरूर मेरे पति की हत्या का मामला संज्ञान में लेंगे व मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच व हत्यारों को कठोर से कठोर सजा दिलाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे।

धन्यवाद के साथ,

पार्वती मुर्मू

ग्राम-ढोलकट्टा

प्रखंड-पीरटांड़

जिला-गिरिडीह (झारखंड)

(रुपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल शोध के मकसद से झारखंड को अपना ठिकाना बनाए हुए हैं।)

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