Sunday, May 22, 2022

सरहुल : पर्यावरण संरक्षण का महापर्व अर्थात आदिवासियों द्वारा जंगल बचाने का एक वैज्ञानिक उत्सव

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अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के तत्वावधान में झारखंड के गढ़वा जिले के अंतर्गत बड़गढ़ प्रखंड के अंतर्गत आने वाले कला खजुरी गांव में प्रकृति पर्व सरहुल को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर वहां पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए सुनील मिंज ने कहा कि जलते हुए जंगल को बचाने का संदेश है सरहुल पर्व। उन्होंने जंगल और प्राणी जगत के बीच के अन्योन्याश्रय संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि जंगल और जीवन दोनों एक−दूसरे पर निर्भर हैं। वनों से हमें ऑक्सीजन मिलता है और मनुष्य सहित अन्य किसी भी प्राणी का जीवन ऑक्सीजन के बिना नहीं चल सकता। पेड़ पौधे और जंगल भू−जल को भी संरक्षित करते हैं। जैव−विविधता की रक्षा भी जंगलों की रक्षा से ही संभव है। विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए बहुमूल्य औषधियां हमें जंगलों से ही मिलती हैं। अतः सरहुल के बहाने लगातार घटते जंगल को बचाना आज का हमारा संदेश होना चाहिए।

आफिर संगठन के कार्यकर्ता फिलिप कुजूर ने बढ़ते वैश्विक तापमान पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, “यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान में दुनिया के अरबों लोगों को आक्सीजन प्रदान करने वाले जंगल खुद अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।” उन्होंने कहा “यदि जल्द ही इन्हें बचाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं वृहद आकार ले लेंगी।” उन्होंने कहा कि आज भारत में 23 प्रतिशत ही जंगल बचे हैं, जबकि इसे 33 प्रतिशत होना चाहिए। अतएव जिस वैज्ञानिक आधार को हमारे पूर्वज जानते थे। उसी के सांकेतिक रूप में हम सरहुल पर्व को मनाते हैं।

विषय प्रवर्तन के तौर पर अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के प्रखंड अध्यक्ष अर्जुन मिंज ने सरहुल के बारे में बताया कि “हमारे पुरखा काल से आदिवासी समुदाय सरहुल परब मनाता चला आ रहा है। गांव का पाहन नदी आहर में जाकर केकड़ा और मछली मारता है। वह मछली से अभिषेक किए हुए पानी को घर में छिड़काव करता है। केकड़े को अरवा धागा में बांधकर पूजा घर में टांग देता है। दूसरे दिन सरई फूल को पाहन छत पर रखता है। तीसरे दिन सरई फूल के गुच्छे की सरना में पूजा होती है। वहां मुर्गे की बलि दी जाती है। मुर्गे के मांस और चावल को मिलाकर खिचड़ी बनाई जाती है। उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इसी बीच पाहन नए घड़े में पानी रखता है। दूसरे दिन देखता है कि पानी कम तो नहीं हो गया। कम होने पर अकाल की भविष्यवाणी करता है। पानी सामान्य रहने पर अच्छी बारिश की बात बताता है। चौथे दिन सरई फूल को विसर्जित कर दिया जाता है। उसी दिन से उरांव आदिवासी लोगों का नव वर्ष शुरू होता है। खेत की जुताई शुरू करते हैं। गेहूं काटते हैं, और उसी दिन से जदूर लोक नृत्य शुरू होता है।”

वैसे तो सरहुल अर्थात खद्दी, उरांव आदिवासियों का सबसे बड़ा पर्व है। यह बसंत ऋतु में चैत के शुक्ल पक्ष के तृतीय को मनाया जाता है, और चैत पूर्णिमा तक चलता है। इसी त्योहार के बाद उरावों का नव वर्ष शुरू हो जाता है। लेकिन आज तमाम आदिवासी समुदाय यह प्रकृति पर्व मना रहे हैं। राज्य की 32 जनजातीय यानी आदिवासी समुदायों के सभी लोग इस पर्व को अपने-अपने तरीके से मनाते हैं। पूरे झारखंड में यह त्योहार मनाया जाता है। वैसे तो इस त्यौहार को जंगल के भीतर या उसके आसपास मनाने की परंपरा है। लेकिन कुछ आदिवासी जिन्होंने खुद को शहरी प्रभाव के दायरे में समेट लिया है वे राज्य के लगभग शहरी क्षेत्रों में अपने-अपने तरीके से इसे मनाते हैं। उरांव आदिवासियों की परंपरा के अनुसार यह प्रकृति पर्व 4 दिनों तक चलता है। पहले दिन मछली के अभिषेक किए हुए पानी को घर में छिड़का जाता है। दूसरे दिन उपवास रखा जाता है और पाहन के द्वारा सरई फूल को छत के ऊपर रखा जाता है। तीसरे दिन पाहन के द्वारा उपवास रखा जाता है और गांव के सरना स्थल पर सरई फूल के गुच्छों की पूजा की जाती है। मुर्गे की बलि दी जाती है। मुर्गे का मांस और चावल को मिलाकर तहड़ी (एक प्रकार की खिचड़ी) बनाई जाती है। जिसे गांव में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। चौथे दिन सरहुल के फूलों का विसर्जन किया जाता है।

उस दिन महिलाएं सफेद लाल पाड़ वाली साड़ी पहनती हैं। सफेद रंग सूर्य देवता तथा लाल रंग पहाड़ी देवता का प्रतीक माना जाता है। सरना झंडा भी सफेद और लाल रंग का होता है। और इसी पर्व से जदूर की शुरुआत हो जाती है। लोग खुशी से गा उठते हैं – “महुआ बिछे घरी कबड़ कुबूड़, दारू पिए घरी मोके बुलाबे!”

सरहुल पूजा कार्यक्रम की शुरूआत गांव के पाहन द्वारा पारंपरिक आधार पर पूजा-पाठ से हुई और कार्यक्रम के अंत में उपस्थित ग्रामीणों ने जदूर लोक नृत्य का आनंद लिया।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से दया किशोर, धरमू मिंज, महावीर किंडो, विश्वनाथ बाखला, राजेंद्र कच्छप, मिलियानस केरकेट्टा, संजय कुजूर,  जॉन बाड़ा, संदीप मिंज, बुधलाल केरकेट्टा, आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन अर्जुन मिंज ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन कला खजुरी ग्राम सभा के प्रधान विश्राम बाखला ने किया।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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