Sun. Apr 5th, 2020

अकाली दल का भाजपा को समर्थन, मौकापरस्ती और मजबूरियों का सौदा

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शिरोमणि अकाली दल का दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा का समर्थन दरअसल ‘मजबूरियों का सौदा’ और निहायत मौकापरस्त कदम है। इसे लेकर पंजाब में अकाली कार्यकर्ताओं में शिरोमणि अकाली दल की शिखर लीडरशिप, खासतौर से अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की अंदरखाने खूब फजीहत हो रही है। राज्य के आम अकाली कार्यकर्ता और समर्थक इसे पचा नहीं पा रहे हैं।

वहीं पंजाब भाजपा के नेताओं का मानना है कि पार्टी ने बाकायदा रणनीति के तहत अकालियों को झुकाकर उन्हें अपने साथ लिया है। दिल्ली में दावे बेशक जो हों, असल में अकाली-भाजपा गठबंधन की जड़ें हिल चुकी हैं।

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बगावत करके प्रतिद्वंदी टकसाली अकाली दल के साथ जाने वाले राज्यसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींडसा की भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद समीकरण बदले। इस मुलाकात ने शिरोमणि अकाली दल में खलबली मचा दी और सुखबीर सिंह बादल ने आनन-फानन दिल्ली जाकर डेरा जमा लिया। उन्होंने गृहमंत्री अमित शाह से मिलने का समय मांगा, लेकिन सीएए पर शिरोमणि अकाली दल के बदले रुख से खफा शाह ने मिलने का समय नहीं दिया और दो दिन के बेचैन इंतजार के बाद सुखबीर नड्डा से मिले।

सूत्रों के मुताबिक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उन्हें नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नाराजगी की बाबत बताया तथा ‘खबरदार’ किया। यह भी कहा कि पंजाब भाजपा इकाई चाहती है कि गठबंधन तोड़ दिया जाए और सुखदेव सिंह ढींडसा के दल से हाथ मिला लिया जाए।

ढींडसा से भाजपा का समझौता सुखबीर को फिलहाल किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं। इसलिए भी कि यह समझौता सुखदेव सिंह ढींडसा के केंद्रीय मंत्री बनने की राह पुख्ता करता और हरसिमरत कौर बादल को मोदी मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ता। ढींडसा की बढ़ती ताकत का सीधा मतलब पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का और ज्यादा कमजोर हो जाना है।

दिल्ली के सिख मतदाताओं में अच्छा प्रभाव रखने वाले दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष और ‘जागो’ पार्टी के प्रमुख मनजीत सिंह जीके खुलकर ढींडसा की रहनुमाई वाले टकसाली अकाली दल के साथ हैं। बुधवार को पहले उन्होंने भाजपा का समर्थन करने की घोषणा की। इससे शिरोमणि अकाली दल में हलचल तेज हो गई। जीके  भी पुराने बागी हैं और दिल्ली में बादलपरस्त अकाली दल को कड़ी चुनौती दे रहे हैं। सुखदेव सिंह ढींडसा का साथ उन्हें हासिल है।

इसके साफ संकेत मिलने के बाद कि भाजपा ने ‘विकल्प’ तैयार कर लिया है, सुखबीर सिंह बादल ने अनमने होकर दिल्ली में भाजपा को समर्थन देने की घोषणा की। सीएए पर भी वह गोलमोल बोले। उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता राज्यसभा सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने कहा है कि नागरिकता संशोधन विधेयक पर अकाली दल अपने स्टैंड पर कायम है कि इसमें मुसलमानों को भी शुमार किया जाए। हालांकि खुद सुखबीर ने इतना जरूर कहा कि इस मसले पर भाजपा से विस्तृत बैठक आठ अप्रैल यानी दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद की जाएगी।

जैसे ही बुधवार को दिल्ली में सुखबीर सिंह बादल ने भाजपा के समर्थन की घोषणा की, पंजाब में अकाली कार्यकर्ताओं में रोष पाया गया। खुलकर कोई कुछ नहीं कह रहा, लेकिन नाम न छापने की शर्त पर कई अकाली नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं ने इस संवाददाता से दो टूक कहा कि पार्टी को थूक कर चाटना नहीं चाहिए था! शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के वरिष्ठ सदस्य ने यहां तक कहा कि सुखबीर ने शिरोमणि अकाली दल की थू-थू करवा दी है। उनके इस कदम से पार्टी में तो बगावत की नई जमीन तैयार हो ही गई है, एसजीपीसी में भी फूट पड़ना एकदम तय है। एसजीपीसी के अनेक सदस्य और पदाधिकारी सुखदेव सिंह ढींडसा के सीधे संपर्क में हैं।

प्रकाश सिंह बादल के करीबी रहे एक खांटी अकाली नेता ने इस संवाददाता से कहा, “सुखबीर सिंह बादल कुछ दिनों से सीएए पर अपना बदला हुआ स्टैंड सार्वजनिक मंचों से लगातार दोहरा रहे थे। बादल परिवार के सबसे नजदीकी वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य बलविंदर सिंह भूंदड ने तो सीएए को तो सिरे से ही खारिज कर दिया था और उसे अल्पसंख्यक विरोधी बताया था। अब शिखर अकाली लीडरशिप किस मुंह से पंजाब में लोगों के बीच जाएगी?” वहीं एक अन्य अकाली नेता कहते हैं, “पहले दिल्ली विधानसभा में भाजपा से सीएए के विरोध में एकदम किनारा करने की घोषणा और फिर अचानक इस निर्णय से पलटना राजनीतिक खुदकुशी है।”

बेशुमार आम और सक्रिय शिरोमणि अकाली दल कार्यकर्ताओं का मानना है कि पार्टी की विश्वसनीयता और छवि धूमिल हुई है तथा इसका बेहद नागवार खामियाजा भुगतना पड़ेगा। शिरोमणि अकाली दल से बगावत करके विधानसभा में विधायक दल का नेता पद छोड़ने वाले पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा ने इस संवाददाता से कहा, “सुखबीर ने हम से डर कर दिल्ली में भाजपा को समर्थन देने की घोषणा की है। यह उनकी मौकापरस्ती का सबसे बड़ा उदाहरण है। पंजाब में उन्हें जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।”

परमिंदर यह संकेत भी देते हैं कि भाजपा आलाकमान उनके संपर्क में भी है। मनजीत सिंह जीके का समर्थन देना और भाजपा का शिद्दत के साथ इसका स्वागत करना इसका एक सबूत है। वहीं वीरवार को सुखदेव सिंह ढींडसा ने साफ कहा कि सुखबीर सिंह बादल कुछ भी कर लें, भाजपा ने उनका विकल्प तलाश लिया है। पंथक राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार पंजाबी दैनिक ‘नवां जमाना’ के संपादक जतिंदर पन्नू के मुताबिक आठ अप्रैल के बाद सारा परिदृश्य बदल जाएगा। 

दिल्ली में शिरोमणि अकाली दल के समर्थन के बाद पंजाब भाजपा इकाई में भी हलचल है। आठ साल प्रदेशाध्यक्ष और दो बार मंत्री रहे वरिष्ठ भाजपा नेता मदन मोहन मित्तल इस बात पर कायम हैं कि पंजाब में गठबंधन तभी बचेगा जब भाजपा को बराबर की सीटें मिलेंगीं। एक अन्य भाजपा नेता और पूर्व मंत्री के मुताबिक सुखबीर ने ढींडसा को कमजोर करने, भाजपा से उनकी नजदीकियां खत्म करने तथा हरसिमरत कौर बादल का मंत्री पद बचाने की गरज से दिल्ली में समर्थन की घोषणा की है।

दिल्ली में भाजपा के समर्थन की घोषणा के बाद शिरोमणि अकाली दल और सुखबीर सिंह बादल नए सिरे से विरोधी दलों के निशाने पर आ गए हैं। कांग्रेस उन्हें मौकापरस्त बता रही है तो आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने दो टूक कहा, “अकालियों ने थूक कर चाटा है।” पूर्व मंत्री और टकसाली अकाली दल के वरिष्ठ नेता सेवा सिंह सेखवां कहते हैं, “हरसिमरत कौर बादल का मंत्री पद बचाने और केंद्र की ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसियों के खौफ ने सुखबीर को पलटने के लिए मजबूर किया है, लेकिन यह गठबंधन दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद नहीं बचेगा।”

उधर, इतना कुछ होने के बाद भी शिरोमणि अकाली दल सरपरस्त प्रकाश सिंह बादल पहले की तरह पूरे प्रकरण पर खामोश हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और जालंधर में रहते हैं।)

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