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सीएए, एनआरसी, एनपीआर की नीयत, बुनियाद और तरीका गलतः तीस्ता

सीएए, एनआरसी, और एनपीआर की नीयत गलत है, बुनियाद गलत है, और तरीका भी गलत है। यह बात जानी मानी और साहसी मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने कहीं। 20 जनवरी को सामाजिक विकास केंद्र (रांची) में झारखंड नागरिक प्रयास द्वारा आयोजित एक सेमिनार को वह संबोधित कर रही थीं।

उन्होंने असम की एनआरसी प्रक्रिया के बारे में लोगों को बताया कि राज्य की 3.2 करोड़ आबादी में से 19 लाख लोग एनआरसी से छूट गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, असम में एनआरसी प्रक्रिया में 1220 करोड़ रुपये और 52,000 सरकारी कर्मियों का समय खर्च हुआ। इसके अतिरिक्त, लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए लगभग कुल 22,400 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े।

असम की एनआरसी प्रक्रिया में लोगों को अत्यंत आर्थिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी, जिससे करीब 100 लोगों की मौत आत्महत्या से, दिल का दौरा पड़ने के कारण, या नजरबंदी केन्द्रों में बंद होने की वजह से हुई।
तीस्ता ने कहा कि भारत आज़ाद होने के बाद देश के संविधान पर गहन विचार विमर्श हुआ था। इसमें धर्म-आधारित राष्ट्रवाद को नकारा गया था। पर सीएए में धर्म के आधार पर शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी। जहां सीएए स्पष्ट रूप से गैर-संवैधानिक है।  एनआरसी और एनपीआर देश के कुछ समुदायों को प्रताड़ित करने का एक तरीका है।

सेमिनार को संबोधित करते हुए रांची विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफ़ेसर ज्यां द्रेज़ ने समझाया कि एनआरसी एक नागरिकता परीक्षा के सामान है। परीक्षा का पहला पड़ाव है एनआरसी की प्रक्रिया, जो हर दस वर्ष में होने वाली जनगणना से बहुत अलग है। जनगणना का मुख्य उद्देश्य आंकड़े एकत्रित करने लिए की जाती है न कि लोगों की पहचान करने के लिए।

पर एनपीआर में लोगों की निजी जानकारी मांगी जा रही है, जैसे उनका आधार नंबर। इससे सरकार का लोगों पर नज़र रखना और आसान हो जाएगा। उन्होंने एनआरसी की तुलना पैलेट बंदूक से की, जिसका कश्मीर में पुलिस बल द्वारा बेरहमी से प्रयोग हो रहा है। पैलेट बंदूक का निशाना कोई एक समूह होता है, पर उससे अन्य लोगों को भी चोट लगती है। उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि जैसे आधार बनवाने में कितना समय और संसाधन खर्च हुआ था, उसी प्रकार अगर झारखंड में एनपीआर लागू होता है, तो पूरा सरकारी तंत्र उसी में लग जाएगा और अगले पांच वर्षों में विकास का कोई काम नहीं होगा।

शशिकांत सेंथिल ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर बढ़ते प्रहारों के विरुद्ध सितंबर 2019 में भारतीय प्रशासनिक सेवा को छोड़ा है। उन्होंने देश की इन विकट परिस्थितियों में खुद को एक सरकारी अफसर होना अनैतिक समझा। उनकी राय में सीएए-एनआरसी-एनपीआर भारत में बढ़ते फासीवाद की ओर बढ़ता एक कदम है। इन नीतियों द्वारा मुसलामानों को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें देश की सब समस्याओं की जड़ बताया जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान केंद्र सरकार मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान बांटने के लिए ऐसी नीतियां लागू कर रही है। सेंथिल ने प्रतिभागियों को एनपीआर प्रकिया के दौरान अपने दस्तावेज़ न दिखाने का आग्रह किया, जिससे वैसे लोगों के साथ एकजुटता बन पाए, जिनके पास आवश्यक दस्तावेज़ नहीं हैं।

सेमिनार का दूसरा सत्र मोदी सरकार की कश्मीर पर नीतियों से सम्बंधित था। ज्यां द्रेज़ ने, जो अनुच्छेद 370 के निराकरण के बाद कश्मीर का जायजा लेने वाले सबसे पहले कार्यकर्ताओं में से थे, मुद्दे पर अपनी टिप्पणी रखी।

सेमिनार के अंत में निम्न प्रस्ताव पारित हुए…
(1) सीएए को रद्द करना और एनआरसी और एनपीआर को लागू नहीं करना, चूंकि वे संविधान की अवधारणा के विरुद्ध हैं।
(2) झारखंड सरकार सीएए के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करे और राज्य में एनआरसी और एनपीआर लागू नहीं करने का निर्णय ले।
(3) एनपीआर-एनआरसी प्रक्रिया के दौरान नागरिकता साबित करने वाले कोई दस्तावेज़ नहीं दिखाएं।
(4) जम्मू और कश्मीर में संवैधानिक अधिकारों का हनन तुरंत बंद हो, संचार के सब साधन वापस चालू किए जाएं। सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए। जम्मू और कश्मीर को पुनः पूरे राज्य का दर्जा मिले और उसमें विधान सभा चुनाव हो।

सेमिनार को अलोका कुजूर, भारत भूषण चौधरी, प्रवीर पीटर, शंभू महतो और ज़ियाउद्दीन ने भी संबोधित किया।

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This post was last modified on January 21, 2020 5:02 pm

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