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झारखंडः वन विभाग के कारनामों से ग्रामीण परेशान, हो सकता है हिंसक संघर्ष

वन विभाग की मनमानी और कारनामों की ख़बरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। कानून को ठेंगा दिखाना और जंगल को बचाने के बजाये जंगल को बर्बाद करने वालों से सांठगांठ रखना इनकी आदतों में शुमार है। झारखंड में तो वे सारी हदें पार कर जाते हैं। ऐसा ही मामला सामने आया है रांची जिले के बुड़मू प्रखंड के चाया (पुरनाडीह) में। वन विभाग ने वनाधिकार कानून का उल्लंघन कर ग्राम सभा की सहमति के बगैर ही वहां की वनभूमि पर जेसीबी मशीन से ट्रेंच कटवा दिया है।

पेड़ लगाने के लिए कुछ गड्ढे भी खुदवा दिए गए हैं, जबकि वनाधिकार कानून के आलोक में इस गांव की ग्राम सभा को 326.49 एकड़ का समुदायिक पट्टा 26 मार्च 2016 को ही मिल चुका है। वनाधिकार कानून, 2006 की धारा 3.1 (झ) और धारा 5 को कार्यान्वित करने के लिए ग्राम सभा सदस्यों को लेकर नियमावली की धारा 4.1 (ड.) के तहत सामुदायिक वन पालन समिति का गठन भी गांव में हो चुका है। ग्रामसभा और सामुदायिक वन पालन समिति के द्वारा अपने परंपरागत सीमा में स्थित वन संसाधनों, जंगल जैव विविधता एवं पर्यावरण के संरक्षण, संवर्द्धन और प्रबंधन का काम जारी है।

गांव के आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वनाश्रितों की आजीविका के लिए वन संसाधनों का समुचित उपयोग भी हो रहा है। लोग सदियों से कब्रगाह, ब्रह्मस्थान में पूजा और कर्बला का प्रयोग इसी जमीन पर करते आ रहे हैं। कहीं खेल के मैदान हैं तो कहीं सामूहिक बाजार लगाने की तैयारी है। तालाब, चैकडैम के निर्माण के लिए भी ग्रामसभा प्रयासरत है। समुदायिक वन पालन समिति वृक्षारोपण की तैयारी में है और दूसरी ओर वन विभाग प्रावधानों और कानूनों की धज्जियां उड़ाने पर तुला हुआ है।

लगभग 200 एकड़ में वन विभाग ने ट्रंच लगवा डाला है। उसे इस बात की परवाह नहीं है कि वनाधिकार कानून, 2006 ग्रामीणों को अपनी गांव की सीमा में स्थित जंगलों के प्रबंधन, नियंत्रण, वन संसाधनों के उपयोग, जंगल जैविविधता एवं पर्यावरण के संरक्षण के साथ ही संवर्द्धन और प्रबंधन का अधिकार देता है।

वन विभाग के पदाधिकारियों की मनमानी पूर्ण कार्रवाई से ग्रामीणों में आक्रोश है और गांव में तानातनी भी है। समुदायिक वन पालन समिति ने वन विभाग की इस मनमानी पर रोक लगाते हुए दोषियों पर कार्रवाई की मांग अनुमंडल पदाधिकारी, रांची से की है। चूंकि अनुमंडल पदाधिकारी, अनुमंडलीय वनाधिकार समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं, इसलिए भी उनसे हस्तक्षेप की मांग करना स्वाभाविक था।

मामले की जानकारी देते हुए समुदायिक वन पालन समिति के अध्यक्ष रामचन्द्र उरांव और अन्य पदाधिकारी बताते हैं कि वन विभाग द्वारा पूर्व में की गई मनमानी से गांव वाले पहले भी त्रस्त रहे हैं। झूठे मुकदमों में फंसाना और लकड़ी माफियाओं से सांठगांठ इनकी पुरानी आदत है। आज जब कानूनन जंगलों पर नियंत्रण, प्रबंधन और संवर्द्धन का अधिकार समुदाय को मिल गया है, तो यह उन्हें रास नहीं आ रहा। वे आज भी पुराने ढर्रे पर काम करना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि डराने-धमकाने के साथ ही जंगल की लकड़ियों को कटवा कर बेचवाने में लगे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने एक फर्जी वन प्रबंधन समिति का गठन भी करवा लिया है। इस समिति का स्वयं भू अध्यक्ष इसी गांव के दबंग हनीफ अंसारी को बनाया है। ग्रामीणों को आज तक यह नहीं पता चला है कि ग्राम सभा, वनाधिकार समिति और समुदायिक वन पालन समिति के अलावा एक और समिति का गठन कब और कैसे हो गया? गांव वालों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। बता दें कि हनीफ अंसारी का अपराधिक इतिहास भी रहा है।

वन पालन समिति के अध्यक्ष मनोज उरांव, कोषाध्यक्ष एतवा उरांव, वनाधिकार  समिति के अध्यक्ष सोमरा उरांव, सचिव गंदुरा उरांव बताते हैं कि ‘गांव के वनाश्रित 2007 से वनाधिकार कानून के आलोक में हक-अधिकार लेने को प्रयासरत हैं। अभी भी पूरी सफलता नहीं मिली है। समुदायिक पट्टा जरूर मिला है, लेकिन व्यक्तिगत पट्टे में हमें सफलता नहीं मिली है। गांव के अधिकांश लोग वनभूमि और गैर मजरूआ जमीन पर खेती-बाड़ी कर के जिंदगी चला रहे हैं। उनके पास जीवकोपार्जन का और कोई दूसरा साधन नहीं है।

आदिवासी या दूसरे वनों पर परम्परागत रूप से निर्भर मुस्लिम, पिछड़ी जाति से आनेवाले लोग सभी का सहारा वनभूमि और गैर मजरूआ जमीन ही है। इसलिए हम लागों ने गांव से 43 व्यक्तिगत पट्टे के लिए दावे भरे थे। इसमें सिर्फ चार लोगों में रामचन्द्र उरांव को 0.40 एकड़ एतवा उरांव को 0.13 एकड़, गंदूरा उरांव को 0.52 एकड़ और शनिचरिया उरांव को 0.13 एकड़ का पट्टा मिला है। जबकि इन लोगों ने न्यूनतम तीन एकड़ तक का दावा पत्र भर कर जमा किया था। 43 व्यक्तियों में से दो घासी समुदाय से और 3 मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दावा पत्र भर कर जमा किया था।

गोवर्धन घासी, समनाथ घासी, सबराती अंसारी, सफरूद्दीन अंसारी के साथ ही जाकिर अंसारी व्यक्तिगत पट्टे को लेकर काफी आशान्वित थे, लेकिन सबके दावे खारिज हो गए। जानकारी के अभाव में बहुत सारे लोगों ने दावा पत्र भरा ही नहीं। चूंकि यह बात फैल गई थी कि गैर आदिवासियों को पट्टा नहीं मिलेगा लेकिन सच यह है कि गांव में रहने वाले अधिकांश लोग वनाश्रित हैं। उनका जीने का साधन वन भूमि ही है, चाहे वे किसी भी जाति—धर्म के हैं। हम ग्रामीणों ने झारखंडी स्वभाव के अनुसार फिर प्रयास नहीं किया।

उन्होंने कहा कि समुदायिक पट्टा मिलने से ही संतुष्ट हो गए लेकिन वन विभाग तो उसकी मान्यता ही नहीं दे रहा है। मनमानी तरीके से ट्रेंच कटवा दिया है, न ग्राम सभा की सहमति और न ही कोई राय कि पेड़ का कौन से किस्म लगाए जाएंगे। धौंस और धमकी के लिए हनीफ वन विभाग का सबसे पंसदीदा शख्स है।

गंदुरा उरांव बताते हैं कि पेड़ के ये खूंट जो दिख रहे हैं न, साल के हैं! वे हनीफ के और वन विभाग के गठजोड़ की कहानियां कह रहे हैं। कोई विरोध करे तो झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी जाती है। गांव वालों को जलावन की लकड़ी और पत्ता के लाले पड़े हुए हैं, लेकिन वन विभाग के चहेते हनीफ के लिए आरा मिल चलाने की पूरी छूट है।

वे बताते हैं कि ‘ट्रेंच कटवाने के समय ही जब हम लोगों ने विरोध किया तो गांव के चार आदमी मुस्लिम अंसारी, इस्लाम अंसारी, रामचन्द्र उरांव, गंदरू उरांव और एतवा उरांव पर लेवी मांगने का झूठा आरोप लगाया गया। जांच-पड़ताल में आरोप झूठे साबित हुए, लेकिन झूठा आरोप लगाने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। गांव की वार्ड सदस्य की प्रतिनिधि सिघनी देवी पर भी आरोप है कि वह धमकी देकर लोगों को किसी भी कागजात पर हस्ताक्षर करने को विवश कर देती हैं।

बता दें कि ग्रामीणों के मन में गुस्सा पल रहा है और आक्रोश बढ़ रहा है। वे वन विभाग के द्वारा वनाधिकार कानून के उल्लंघन और ग्राम सभा को नजरअंदाज कर अपने पूजा स्थल, कब्रगाह, चारागाह और वन संसाधनों की हरतरफ से घेराबंदी से गुस्से में हैं। ग्रामीणों ने अनुमंडल पदाधिकारी सदर, वन क्षेत्र पदाधिकारी और थाना प्रभारी बुड़मू को वन विभाग की कार्रवाई से अवगत कराते हुए दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

अपने ज्ञापन में उन्होंने सवाल उठाया है कि केन्द्र सरकार के द्वारा आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए बनाए गए वनाधिकार कानून, 2006 का कोई महत्व है या नहीं? उपायुक्त, अनुमंडल पदाधिकारी, राजस्व पदाधिकारी व वन विभाग के अधिकारियों की सहमति और संयुक्त पहल से 326 एकड़ का मिला समुदायिक पट्टे का कोई महत्व है या नहीं? क्या यह पट्टा और केन्द्र सरकार का कानून, कागज का टुकड़ा भर है?

वन विभाग के इन छोटे कर्मचारियों-अधिकारियों और गांव के दबंग हनीफ के लिए? क्या कानून का कोई महत्व नहीं रह गया है? आवेदन में कहा गया है कि वन भूमि पर हमारे खेत, पूजा स्थल, कब्रगाह, कर्बला या घर हैं। वृक्षारोपण हो जाने से हम वहां जोत-कोड़ एवं खेती-बाड़ी कैसे कर पाएंगे? ट्रेंच से अगर रास्ते बंद कर देंगे तो हम वहां कैसे जाएंगे? जंगल में जाना-आना कैसे होगा?

गांव के लोग, खासकर महिलाएं दातुन-पत्ता या अन्य वनोपज संग्रहण के लिए जंगल कैसे जाएंगी? खेती और बरसात के मौसम में हमारे गाय-बैल, बकरी जंगल में चरने के लिए कैसे जाएंगे? अगर ट्रेंच गड्ढे में गाय-बैल, बकरी या बच्चे गिर गये और जान-माल का नुकसान हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा और इसकी क्षतिपूर्ति कौन देगा? आवेदन में समय रहते मामलें पर ध्यान देकर कार्रवाई करने की मांग की गई है।

ग्रामीणों के अनुसार वे संघर्ष के लिए तैयार हैं, यदि अनुमंडल पदाधिकारी कोई कार्रवाई नहीं करते हैं तो वे आगे कोई भी कदम बढ़ाने से नहीं हिचकेंगे। ग्रामीण कहते हैं कि हम जंगल के बिना नहीं रह सकते और अब जब कानूनन हमें जंगल पर अधिकार दिया गया है तो फिर दूसरा इसमें टांग अड़ाने क्यों अड़ा रहा है?

वनाधिकार कानून, 2006 के आलोक में मिला समुदायिक पट्टा इन्हें कानूनी बल दे रहा है और मुरूपिरी पंचायत के अधीन इस गांव की एकता और गंगा-यमुनी तहजीब साहस, जिसके बल पर वे किसी हद तक जाने को तैयार दिख रहे हैं। जो आने वाले समय में हिंसक संघर्ष की संभावना की ओर इशारा कर रहा है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 31, 2020 6:08 pm

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