Sun. Dec 8th, 2019

रजनीश राय को तुलसीराम प्रजापति से पूछताछ की इजाजत नहीं देने वाले पीपी पांडे को सीएम रूपानी ने किया सम्मानित

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आज 30 नवंबर है। आज गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने इशरत जहां एनकाउंटर केस में आरोपी रहे पूर्व डीजीपी पीपी पांडे को प्रतिष्ठित सेवा के लिए सम्मानित किया है। कमाल की बात है कि ठीक आज ही के दिन 30 नवंबर को पांच साल पहले सीबीआई के एक जज नागपुर की यात्रा पर थे, जो सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे। सीबीआई ने इसमें अमित शाह को अभियुक्त बनाया था जो उस समय गुजरात में मंत्री थे। जज की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। जज का नाम था बृजगोपाल हरकिशन लोया।

साल 2002 और 2006 के चार सालों में गुजरात पुलिस पर 31 ‘ग़ैर क़ानूनी’ हत्याएं करने के आरोप लगे थे। इन में से आधे लोगों का एनकाउंटर कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों के एक खास समूह ने किया है, जो ये कहते आए हैं कि मारे गए लोग ‘आतंकवादी’ थे।

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पीपी पांडेय जो गुजरात पुलिस में डीजीपी के पद पर रहे, वह भी इशरत जहां के एनकाउंटर केस में आरोपी थे। उन्हें भी लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। पिछले साल उन्हें इस आरोप से बरी कर दिया गया।

रजनीश राय ने केंद्रीय प्रशासनिक ट्राइब्यूनल के समक्ष बकायदा एक हलफ़नामा दायर कर गुजरात के पूर्व गृहराज्य मंत्री अमित शाह और डीजीपी पीपी पांडेय पर सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ के गवाह समझे जाने वाले तुलसी प्रजापति के मुठभेड़ की आपराधिक साज़िश रचने और बाद में सुबूत मिटाने का आरोप लगाया था।

आप पूछेंगे कि ये रजनीश राय कौन हैं? रजनीश राय गुजरात कैडर-1992 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं, जिन्होंने 2005 में सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की जांच की थी। उस केस में गुजरात के ही दूसरे आईपीएस अधिकारी डीजी बंजारा और दूसरे पुलिसकर्मियों को ऑन ड्यूटी गिरफ्तार किया था।

कुछ दिनों पहले तंग आकर रजनीश रॉय ने भी आखिरकार इस्तीफा दे दिया।

रजनीश राय ने अपने हलफ़नामे में कहा है कि तत्कालीन अतिरिक्त डीजीपी ओपी माथुर, सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले की जांच रिपोर्ट को राजस्थान के भाजपा नेताओं से बांटना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इसका लिखित विरोध किया था। उनका आरोप है कि इसके बाद राज्य सरकार ने फ़ौरन ही उनका तबादला कर दिया था। उनकी जगह गीता जौहरी को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की जांच की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई थी।

रजनीश राय का कहना है कि इसके बाद से ही राज्य सरकार ख़ास तौर पर तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह और तत्कालीन डीजीपी पीपी पांडेय से उनके रिश्ते ख़राब हो गए थे। डीआईजी राय का कहना है कि उन्हें शक होने लगा था कि तुलसी प्रजापति, सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के गवाह हैं और इसके लिए वो तुलसी प्रजापति का बयान दर्ज करना चाहते थे। तुलसी प्रजापति उस समय राजस्थान की एक जेल में बंद थे।

राय का कहना है कि तुलसी प्रजापति की पूछताछ के लिए इजाज़त मांगी थी, लेकिन डीजीपी पांडे और अमित शाह ने उन्हें इजाज़त नहीं दी।

कुछ ही दिन बाद, दिसंबर, 2006 को गुजरात पुलिस ने एक दूसरे मामले में तुलसी प्रजापति को रिमांड पर लिया और उन्हें राजस्थान से गुजरात लाया गया। लौटते समय एक कथित मुठभेड़ में प्रजापति मारे गए। सोहराबुद्दीन की पत्नी क़ौसर बी की भी हत्या कर दी गई थी। इन हत्याओं के आरोप गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह पर लगे। इन्हीं मामलों में बाद में उनकी गिरफ़्तारी भी हुई।

फिर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में जांच चलती रही। अदालत के आदेश पर अमित शाह को तड़ी पार कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर करने, सुनवाई के दौरान जज का तबादला न करने जैसे कई निर्देश दिए। सीबीआई के विशेष जज जेटी उत्पत ने अमित शाह को मई 2014 में समन किया। शाह ने सुनवाई में हाज़िर होने से छूट मांगी, लेकिन जज उत्पत ने इसकी इजाजत नहीं दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 26 जून 2014 को उनका तबादला कर दिया गया।

इसके बाद ये मामला जज लोया को सौंप दिया गया। मामले में अमित शाह जज लोया की अदालत में भी पेश नहीं हुए। एक दिसंबर 2014 को लोया की मौत नागपुर में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

कल एक दिसंबर है….

(गिरीश मालवीय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)

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