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झारखंडः 26 बरस गुजार दिए विश्व आदिवासी दिवस की बधाइयों में, मूल निवासी नहीं जानते विरासत और परंपरा

विश्व आदिवासी दिवस मनाने की शुरुआत 1994 से यानी 26 वर्ष पहले शुरू हुई थी। इसके बावजूद झारखंड के रांची में तमाम आदिवासी इससे अनभिज्ञ हैं। उन्हें नहीं पता कि यह दिवस भी मनाया जाता या क्यों मनाया जाता है।

जाहिर सी बात है कि यह न जानना इन आदिवासियों की कमी नहीं है, दरअसल इसे राजनीतिक और सामाजिक असफलता कहा जाए तो गलत नहीं होगा। झारखंड में अगले साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर अवकाश रहेगा। इसका एलान जरूर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने किया है।

ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड, के महासचिव विश्वनाथ सिंह बताते हैं, ”अगस्त क्रांति और विश्व आदिवासी दिवस मनाने के लिए हम 9 अगस्त को गिरिडीह जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर खटौरी पंचायत के कारीमाटी गांव गए थे। कार्यक्रम ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के मौके पर स्थानीय संथाल आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं ने साफ कहा कि उन्हें विश्व आदिवासी दिवस के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है।”

उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस 1994 से लेकर आज तक यह बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच केवल शुभकामना देने तक सीमित रहा है। लोगों ने आदिवासियों को जागरूक करने के लिए कुछ नहीं किया। ऐसे में हमें यह एहसास हुआ कि विश्व आदिवासी दिवस की मौलिकता और प्रासंगिकता को लेकर हमें पूरी तैयारी के साथ सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाना होगा।

इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि जबकि यह सच है कि विभिन्न आदिवासी विद्रोहों के परिणाम स्वरूप अंग्रेजों की सत्ता के नीति निर्धारक और अंग्रेजी सत्ता को हमने इतना बाध्य किया कि उन्हें मजबूर होकर आदिवासियों के हक और हित में कानून बनना पड़ा। बावजूद यह दुखद है कि वनाधिकार कानून 2006, छोटा नागपुर टेंडेंसी एक्ट 1908,संथाल परगना टेनेंसी एक्ट, पांचवीं अनुसूची में वर्णित आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के महत्त्व को गांव के लोग नहीं जानते हैं।

वक्ताओं ने कहा कि इस विषय में झारखंड सरकार के मुखिया हेमंत सोरेन ने यह घोषणा करके कि इस बार से विश्व आदिवासी दिवस प्रखंड स्तर तक मनाए जाएंगे, स्वागत योग्य है। वहीं गांवों के आदिवासी समाज में अपने अधिकार के बारे न जानना केवल आदिवासी समाज के लिए ही नहीं पूरे झारखंड के लिए चिंता का विषय है।

वक्ताओं में खटौरी के मुखिया नवीन मुर्मू ने कहा कि अगले साल पारंपरिक कृषि वन उत्पादन के महत्व पर स्थानीय स्तर से जागरूकता पैदा करके लोगों को उत्साहित करेंगे और पारंपरिक खेलों का प्रक्षिशण देकर नई पीढ़ी को प्रोत्साहित किया जाएगा और उन्हें पुरस्कृत भी किया जाएगा।

कार्यक्रम में हेमंत सोरेन की घोषणा को संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य को सार्थक करने की दिशा में स्वागत योग्य कदम बताया गया, जो आदिवासी समाज को उत्साहित करेगा। इसी उत्साह को बरकरार रखने के लिए आयोजित कार्यक्रम में प्रकृति और पर्यावरण से आदिम समाज के योगदान, सहजीविता और श्रम-साध्य जीवन, वैज्ञानिक समझ, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क एवं ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड द्वारा मनरेगा मजदूर व आदिवासी संथाल के संदर्भ में दशा दिशा और भविष्य की कार्य योजना पर चर्चा की गई।

9 अगस्त की मौलिकता को स्थापित करने के लिए जानकारी बांटने, पारंपरिक शुद्ध पौष्टिक अनाज के उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ाने, खेल के क्षेत्र में प्रतिभाओं को उभारने, लोगों में खासकर महिलाओं में पुरातन अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने पर चर्चा के साथ-साथ योजना के सार्थक पहल और संकल्प के साथ कार्यक्रम की घोषणा की गई और कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के साथ एक नैतिक समझ की साझेदारी के साथ चलने और वर्तमान संदर्भ के सापेक्ष कदम उठाने के लिए भविष्य की कार्य योजना तैयार की गई।

दिवस कुमार, योगेन्द्र गुप्ता, अजय विश्कर्मा, किशोर मुर्मू, महेंद्र हजारा, दिलीप कुमार रजक, संताल सोमाज सुसार बायसी के सचिव सुलेमान मुर्मू तथा संयोजक लालो हांसदा सहित पंचायत के सभी गांव के ग्रामीण मौजूद रहे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 11, 2020 6:54 pm

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