Friday, January 27, 2023

ग्राउंड रिपोर्ट: लालमाटी गांव, जहां आज भी लोग कंद-मूल खाने को हैं मजबूर

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लालमाटी (झारखंड)। “अगर यह जंगल नहीं रहता तो हम कब के मर जाते।” अगर कोई ऐसा कहता है तो सरकार की ढपोरशंखी योजनाओं से उपजी उसकी पीड़ा को समझना आसान हो जाता है।

जी हां, यह पीड़ा गुमला जिला अंतर्गत रायडीह प्रखंड के ऊपर खटंगा पंचायत के लालमाटी गांव के ग्रामीणों में देखने को इसलिए मिलती है क्योंकि सरकार व प्रशासन ने कभी भी इस गांव की दुर्दशा पर न तो ध्यान दिया और न ही इस गांव की छवि बदलने का प्रयास किया। इसके साथ ही इस गांव के विकास के लिए कभी कोई योजना नहीं बनायी गयी।

वहीं रायडीह प्रखंड के ही पहाड़ पर बसे दो गांव, बहेरापाट और पहाड़ टुडुरमा की स्थिति देखकर आभास ही नहीं होता कि ये आजाद भारत के गांव हैं।

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आपको बता दें कि आज भी लालमाटी गांव में रहने वाले कोरवा आदिम जनजाति और मुण्डा जनजाति के 30 परिवारों की जिंदगी गांवों तक ही सिमटी हुई है। जिसमें 15 परिवार कोरवा जनजाति के हैं, जो विलुप्ति के कगार पर हैं और 15 मुंडा जनजाति के परिवार हैं जो लगभग 200 वर्षों से इस जंगल में रहते आ रहे हैं।

वहीं पहाड़ पर बसे दो गांव बहेरापाट और पहाड़ टुडुरमा, जहां निवास करते हैं रौतिया, खेरवार व मुंडा जनजाति (आदिवासी) के 35 परिवार। इस गांव का दुर्भाग्य यह है कि गुमला जिला का यह पहला ऐसा गांव है, जहां आज तक सांसद, विधायक, डीसी, बीडीओ, सीओ तो दूर यहां पंचायत सेवक तक नहीं गये हैं। कई पीढ़ियां खत्म हो गयीं, लेकिन उनको आज भी यह नहीं पता कि उनके क्षेत्र का सांसद, विधायक, डीसी, बीडीओ, सीओ व पंचायत सेवक कौन है?

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कहना ना होगा कि आजादी के 75 साल और झारखंड अलग राज्य के 21 साल बाद भी इन जनजातीय (आदिवासी) परिवारों के हालात जस का तस बने हुए हैं, जबकि झारखंड अलग राज्य की अवधारणा ही आदिवासियों के विकास को लेकर बनी थी। ऐसे में अगर ग्रामीण यह कहते हैं कि “यह जंगल नहीं रहता तो हम कब के मर जाते।” अलग राज्य की अवधारणा के साथ-साथ सरकार व प्रशासन की मंशा पर कई सवाल खड़े हो जाते हैं।

इन गांवों की प्रमुख समस्या पर जब हम नजर दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि गांव तक जाने के लिए सड़क नहीं है। ग्रामीण राशन लाने पांच किमी दूर जाते हैं। जनजाति समुदाय के लिए सरकारी योजना का बिरसा आवास आज तक किसी को नहीं मिला है। स्वच्छ भारत योजना के तहत किसी के घर में शौचालय नहीं बना है। गांव में स्वास्थ्य की कोई भी व्यवस्था नहीं है। शिक्षा का आलम यह है कि पांचवीं कक्षा के बाद गांव के बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।

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कहने को लालमाटी गांव की मुंडा बस्ती में जलमीनार है, लेकिन वह जब से बना है तभी से खराब है। घोर घने जंगल व पहाड़ पर बसा लालमाटी गांव, अपने दुर्गम क्षेत्र के कारण आज भी नक्सल इलाके के नाम से जाना जाता है।

वहीं बहेरापाट और पहाड़ टुडुरमा गांव के ग्रामीणों से सरकारी योजनाओं के लाभ और पेयजल पर बात करने पर ग्रामीण बताते हैं कि गांव में एक सोलर जलमीनार लगा था, परंतु वह जब से लगा तभी से खराब पड़ा है।

ग्रामीण कहते हैं हमारे गांव में कहीं पानी का स्रोत नहीं है।

गांव से दो किमी दूर पहाड़ की तलहटी पर एक चुआं (खेतों के सबसे निचले भाग या नदी व पहाड़ की तलहटी में कुआं के आकार का एक गड्ढा) है। जहां पहाड़ी पानी जमा होता है, उसी चुआं की श्रमदान के जरिये घेरेबंदी कर दी गई है। अब आप इसे दूषित पानी कहिए या साफ, हम लोग इसी पानी को पीते हैं। पानी लाने के लिए जंगली रास्तों से होकर पैदल गुजरना पड़ता है। लिहाजा जंगली जानवरों के हमले का डर बना रहता है।

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जिले के इन गांवों में रोजगार का कोई साधन नहीं है। सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी वजह लोग बरसात पर ही निर्भर हैं। सिंचाई के साधन के अभाव के कारण लोग बरसात में ही होने वाली फसल धान, गोंदली, मड़ुवा, जटंगी की खेती कर पाते हैं। जिससे उन्हें कुछ महीने तक की खाने की व्यवस्था हो पाती है। अतः ग्रामीणों का आहार के रूप में जंगली कंदा स्थायी भोजन आज भी है।

गांव के लगभग सारे लोग जंगल से सूखी लकड़ी व दोना पत्तल बाजारों में बेचकर अपनी जीविका चलाते हैं। बहेरापाट व पहाड़ टुडुरमा गांव घने जंगल व पहाड़ के ऊपर बसा है। इस गांव तक जाने के लिए सड़क नहीं है। जंगली व पथरीले रास्तों से होकर लोग सफर करते हैं। इस गांव के लोगों को सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिला है और न आज मिल रहा है। मनरेगा के तहत एक कुआं बना था लेकिन वह चू-चू का मुरब्बा साबित हुआ, मतलब एक बूंद भी पानी नसीब नहीं हुआ।

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लालमाटी गांव में रास्ते के अभाव में लोगों को लुरू गांव से होकर पैदल पहाड़ के ऊपर तीन किमी चढ़ना पड़ता है। बाइक से अगर गांव जाना है तो चैनपुर प्रखंड के सोकराहातू गांव से होकर जाना पड़ता है। वैसे यह सड़क भी खतरनाक है, परंतु सावधानी से सफर करने से गांव तक पहुंचा जा सकता है। गांव के लोग सोकराहातू के रास्ते से साइकिल से सफर करते हैं।

सड़क नहीं होने के कारण कोई भी वाहन गांव तक नहीं जाता है। वहीं मोबाइल नेटवर्क नहीं होने के चलते बाहर के लोगों से संपर्क नहीं हो पाता है। अगर कोई बीमार है, किसी गर्भवती महिला को अचानक प्रसव की स्थिति बन जाती है, तो उसे खटिया में लादकर पहाड़ से पैदल उतारा जाता है। चार-पांच किमी पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क पहुंचकर किसी अन्य साधन से मरीज को या गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाया जाता है। ग्रामीण कहते हैं, पहाड़ से उतरने के क्रम में कई लोगों की मौत हो चुकी है।

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लालमाटी गांव से लुरू गांव की दूरी करीब छह किमी है। हर चुनाव में लुरू गांव में ही बूथ बनता है। लालमाटी गांव के लोग छह किमी पैदल चलकर हर चुनाव में वोट देते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि बूथ पर उम्मीदवार की जगह गांव का ही कोई एजेंट रहता है, जो सभी वोटरों के लिए बुंट (चना), गुड़ या चूड़ा की व्यवस्था करता है। वोट देने के बाद यही खाने के लिए मिलता है।

लालमाटी गांव के विमल कोरवा स्थानीय भाषा में ही बताते हैं कि “हमरे मन कर जीवन जंगल तक सिमट कर रह जाहे। सरकार और प्रशासन से अनुरोध आहे, हमारे मन कर गांव कर सड़क के बनवा देवा। हमरे मन के काफी दु:ख तकलीफ आहे, मुश्किल में जिया थी”। (हमलोगों का जीवन जंगल तक सिमट कर रह गया है। सरकार व प्रशासन से अनुरोध है कि हमारे गांव की सड़क बनवा दें। हम लोगों को काफी परेशानी है, हमलोग मुश्किल में जी रहे हैं।)

महेंद्र कोरवा कहते हैं कि प्रशासन द्वारा डाकिया योजना के तहत दिया जाने वाला राशन गांव में पहुंचाकर नहीं दिया जाता है। जबकि यह राशन बोरा बंद लाभुक के घर पहुंचना है। अतः हमें राशन लाने के लिए ऊपर खटंगा जाना पड़ता है। रास्ता नहीं है, पहाड़ी व जंगली रास्ता से करीब छह किमी पैदल चलना पड़ता है, जो काफी मुश्किल है।

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छटनी कोरवाइन स्थानीय भाषा में ही बताती हैं कि “गांव कर बूढ़ा-बूढ़ी मन के वृद्धावस्था पेंशन नी मिला थे। हमरे मन कई बार फार्म भी भइर आही। परंतु प्रशासन व नेता मन हमरे मन के कोयो मदद नी करेना। बाबू मन हमरे मन के मदद करी।” (गांव के बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलता है, हम लोगों ने कई बार आवेदन भी दिया है, लेकिन प्रशासन व नेता हम लोगों की कोई मदद नहीं करते हैं। आप लोग हम लोगों की मदद करिए।)

सनियारो कोरवाइन कहती हैं “गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है। जंगल से सूखी लकड़ी व दोना-पत्तल बाजार ले जाकर कर बेचते हैं। उसी से जीविका चलती है। गांव से गुमला की दूरी 25 किमी है। पथरीली सड़कों से होकर गुमला जाते हैं।”

शिक्षक नारायण सिंह कहते हैं “गांव में एक से पांच क्लास तक पढ़ाई होती है। पांचवीं कक्षा तक पढ़ने के बाद कई बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं। क्योंकि गांव चारों तरफ जंगल व पहाड़ से घिरा है। रास्ता नहीं रहने के कारण बच्चे स्कूल जाना नहीं चाहते।”

दिलमति कुमारी बताती हैं कि “मुंडा बस्ती में एक जलमीनार दो साल पहले बना था। वह खराब है। हम लोग चुआं का पानी पीते हैं। पांचवीं कक्षा के बाद हम लोग पढ़ाई छोड़ देते हैं। क्योंकि रायडीह व सोकराहातू स्कूल जाने के लिए सड़क नहीं है।”

बहेरापाट व पहाड़ टुडुरमा गांव के जगन सिंह उम्र 70 वर्ष बताते हैं कि कई बार वृद्धा पेंशन के लिए आवेदन दिया। परंतु स्वीकृत नहीं हुई। इस बुढ़ापे में जंगल की लकड़ी काटकर बेचते हैं। तब घर का चूल्हा जल रहा है।

कलावती देवी कहती हैं कि गांव का जलमीनार खराब है। एक कुआं खोदा गया है। परंतु उसमें एक बूंद पानी नहीं है। गांव से दो किमी दूर पहाड़ की तलहटी पर चुआं है। जिसका दूषित पानी हम लोग पीते हैं।

युवक संदीप सिंह बताते हैं कि गांव में शिक्षा का स्तर काफी कम है। स्कूल नहीं है। गरीबी के कारण पूरे गांव में मात्र तीन लोग इंटर पास किये हैं। गांव के अधिकांश युवक युवती पांचवीं व छठी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।

मंगरू सिंह की मानें तो पंचायत चुनाव है, अभी गांव में चुनाव को लेकर कोई हलचल नहीं है। मतदान से एक दिन पहले उम्मीदवार वोट मांगने गांव आते हैं। पहाड़ी सफर तय कर 20 किमी दूर लुरू बूथ जाकर वोट डालते हैं।

अलीता देवी बताती हैं हमारा गांव रायडीह प्रखंड में है, परंतु प्रखंड कार्यालय तक आने-जाने के लिए सड़क नहीं है। हम लोग चैनपुर प्रखंड के सोकराहातू के रास्ते से होकर गुमला जाते हैं। इसके बाद रायडीह प्रखंड कार्यालय पहुंचते हैं।

यह पूछे जाने पर कि आपकी सरकार से क्या मांग है? पोंडरी देवी कहती हैं गांव की सड़क बन जाये। पानी की सुविधा हो। हर घर में शौचालय बन जाये। प्रशासन से यही मांग है। आज तक हमारे गांव में कभी विधायक, सांसद, बीडीओ, सीओ व पंचायत सेवक नहीं आये हैं।

गांव के लोग कहते हैं- हम क्या करें, हमारी हालत ऐसी है कि जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा और जाना कहां?

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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