Saturday, February 4, 2023

पंजाब में ‘आप’ को नहीं चाहिए ईमानदार अफसर!

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पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार और अफसरशाही में एकबारगी फिर जबरदस्त ढंग से ठन गई है। इस बार भी वजह ‘दिल्ली वाले’ हैं। इस बार मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आला अफसरों के इसलिए आनन-फानन में तबादले कर दिए कि उन्होंने विभागीय राशि को ‘प्रचार’ के लिए इस्तेमाल करने से साफ इनकार कर दिया और सरकार को कतिपय ईमानदार अफसरों का यह रवैया पसंद नहीं आया।

दो दिन के भीतर हुए कुछ तबादले बेहद चर्चा में हैं। इनमें से तो एक रविवार यानी छुट्टी के दिन किया गया। अफसरशाही में जबरदस्त खलबली और सुगबुगाहट है कि मुख्यमंत्री ने ‘ऊपर’ के इशारे से मुख्य सचिव को मौखिक आदेश दिए, जो मुख्य सचिव की मेज पर पहुंचते ही लिखित में बदल गए।

पूरा घटनाक्रम बताता है कि अब राज्य सरकार को तर्क करने वाले और ईमानदारी के साथ फर्ज निभाने वाले आला अधिकारी रत्ती भर भी पसंद नहीं हैं। नीचे के अफसरों को भी रोज ताश के पत्तों की मानिंद फेंटा जा रहा है। सरकार के पक्षधर अधिकारी इसे अपरिहार्य सख्ती बताते हैं, जबकि ‘पीड़ित’ अफसरों के हमदर्द (सूबे में जो कुछ इन दिनों हो रहा है) इसे अपने किस्म का सरकारी भ्रष्टाचार बताते हैं।

चंद दिन पहले ही पीसीएस और आईएएस अफसरों तथा सरकार के बीच तनातनी बढ़ी थी और मुख्यमंत्री के संवैधानिक दबाव में आकर अफसर झुक गए थे। इसकी एक वजह और भी थी कि मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और उनके किचन कैबिनेट के सदस्य मीडिया तथा अन्य मंचों से प्रचार करने लगे थे कि सरकार से नाराज हुए अफसर दरअसल दागी अधिकारियों को बचाना चाहते हैं और खुद भी बचना चाहते हैं।

लेकिन इस बार मामला दूसरा है। जिला स्तरीय अधिकारियों में अपने एक साथी की विजिलेंस द्वारा की गई गिरफ्तारी को लेकर रोष था और वे पांच दिन की सामूहिक हड़ताल पर चले गए थे, लेकिन सरकार के दबाव का डंडा उन पर चला और वे काम पर लौट आए। मुख्यमंत्री ने खुद सामने आकर उन्हें नियमानुसार निलंबित करने की धमकी दी थी।

इस बार दो ऐसे अधिकारियों को अचानक से उनके पद पर से हटा दिया गया, जो पहले दिन से ही अपनी ईमानदार छवि के लिए मशहूर हैं। पहला मामला अजोय शर्मा का है। चंद घंटों पहले तक वह पंजाब के स्वास्थ्य सचिव और सरकार की एक अति महत्वाकांक्षी परियोजना के आधिकारिक मुखिया थे। दिल्ली की तर्ज पर पंजाब में तकरीबन 400 आम आदमी क्लीनिकों का उद्घाटन प्रत्येक जिले में होना था। इससे ठीक पांच दिन पहले इस परियोजना की कामयाबी के लिए रात दिन एक किए हुए स्वास्थ्य सचिव अजोय शर्मा को स्थानांतरित कर दिया गया।

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अजोय शर्मा

पूछने पर सरकारी नुमाइंदे तो यही बताएंगे कि यह एक रूटीन तबादला है लेकिन असल कहानी यह है कि स्वास्थ्य सचिव अजोय शर्मा ने आम आदमी क्लीनिक के प्रचार पर 30 करोड़ रुपए खर्च करने पर अपनी तार्किक आपत्ति जताई थी, जिस पर राज्य सरकार अब तक 10 करोड़ रुपए खर्च भी कर चुकी है। शेष 20 करोड़ रुपए पंजाब सहित दिल्ली तथा अन्य दूसरे राज्यों में इस सरकारी विकास योजना का ‘ढिंढोरा’ पीटने के लिए खर्च करने के लिए कहा गया था।

विभागीय सूत्रों के मुताबिक खुद मुख्य सचिव विजय कुमार जंजुआ ने स्वास्थ्य सचिव को इसके आदेश दिए और हवाला भी कि मुख्यमंत्री ऐसा चाहते हैं। लेकिन स्वास्थ्य सचिव ने इसे फिजूलखर्ची बताते हुए ऐसा करने से दो-टूक इनकार कर दिया। मामला मुख्यमंत्री दरबार में पहुंचा तो बात ‘आगे तक’ चली गई। नतीजतन निहायत ईमानदार छवि वाले स्वास्थ्य सचिव को ईमानदारी का ईनाम तत्काल तबादले के रूप में दिया गया।

(अब) पूर्व स्वास्थ्य सचिव अजोय शर्मा 1999 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और राज्य में आप सरकार के गठन के 3 महीने के भीतर 100 से ज्यादा आम आदमी क्लीनिक शुरू करने में उनकी अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके लिए मुख्यमंत्री भगवंत मान खुद उनकी पीठ कई बार थपथपा चुके हैं। शर्मा के पास वित्त आयुक्त, कराधान का अतिरिक्त प्रभार भी था।

मुख्यमंत्री को तकरीबन 400 आम आदमी क्लीनिकों का विधिवत उद्घाटन पांच दिन बाद करना था कि उन्हें आनन-फानन में तब्दील कर दिया गया और इन पंक्तियों को लिखने तक नई पोस्टिंग भी नहीं दी गई। दूसरे अर्थों में कहें तो ‘ईनाम’ की बजाए ‘सजा’ दी गई। ये क्लीनिक जितनी राशि में बनाए जा रहे हैं, उससे तीन गुना ज्यादा का खर्च सरकार इसके प्रचार-प्रसार पर करना चाहती थी। इससे अजोय शर्मा ने इंकार कर दिया।

बताते हैं कि मुख्य सचिव के साथ इस बाबत उनकी कई बैठकें भी हुईं, लेकिन उन्होंने इस आदेश को नहीं ही माना। उनका कहना था कि जिस राशि को जारी करने का दबाव उन पर बनाया जा रहा है, उससे सेहत सुविधाएं सुधारने के लिए बहुत बड़े कदम उठाए जा सकते हैं और राज्य को इनकी जरूरत है।

क्लीनिक बनने अथवा शुरू होने तथा सुधार होने से प्रचार-पसार अपने आप हो जाएगा, तो इसके लिए सूबे से ‘बाहर’ ऐसा खर्च क्यों किया जाए? अब पूर्व हो चुके स्वास्थ्य सचिव इस तर्क के साथ ही अचानक सरकार की आंखों की किरकिरी बन गए। बताने वाले यह भी बताते हैं कि उनका तबादला दिल्ली से आई उस टीम की हिदायत पर किया गया जो दरअसल धीरे-धीरे पंजाब की आला अफसरशाही पर अमरबेल की तरह छा रही है। वे लोग कौन हैं और क्यों उनको मुख्यमंत्री की तरफ से बंगले अलॉट किए गए, इस पर भूलकर भी कोई जुबान नहीं खोलना चाहता।

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वीरेंद्र कुमार शर्मा

रविवार से पहले वह शिक्षा विभाग में महानिदेशक और विशेष सचिव के महत्वपूर्ण पद पर थे। उन्हें अक्टूबर में ही ये दो अहम ओहदे दिए गए थे। विभिन्न जिलों के उपायुक्त रहे वीरेंद्र कुमार शर्मा की छवि भी बेहद उजली है। उन्हें एक जनप्रिय लोक-प्रशासक माना जाता है लेकिन उनके साथ बहुत बुरा सुलूक किया। यह हम नहीं बल्कि खुद आम आदमी पार्टी के कतिपय विधायक और आम लोग दबी जुबान में कह रहे हैं।

सोमवार, 23 जनवरी को जैसे ही यह खबर बाहर आई तो हर कोई हक्का-बक्का रह गया। उन्हें भी नई पोस्टिंग नहीं दी गई। अफसरशाही के बीच यह माना जाता है कि पद से इस तरह हटाने और उसी वक्त नई पोस्टिंग न देना दरअसल अधिकारी का अपमान करने जैसा है। वीरेंद्र कुमार शर्मा ने भी सरकारी पैसे को प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमााल करने का विरोध किया था।

भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक शनिवार को उनकी मुख्य सचिव विजय कुमार जंजुआ से बाकायदा बहस हुई और वीरेंद्र कुमार शर्मा ने बदस्तूर इनकार की भाषा दोहराई। रविवार दोपहर होते-होते उन्हें पदमुक्त कर दिया गया। यह भी एक असाधारण और कई मायनों में ऐतिहासिक फैसला है जो आने वाले दिनों में राज्य सरकार को बेतहाशा महंगा पड़ सकता है। 

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मुख्य सचिव विजय कुमार जंजुआ

दरअसल, कई सरकारी विभागों में परियोजनाओं के लिए धन संरक्षित है। सूत्रों के अनुसार सरकार चाहती है कि इन्हीं पैसों में से उसकी ‘बल्ले-बल्ले’ करवाई जाए और दूसरे राज्यों में पंजाब में हो रहे कथित विकास का प्रचार-प्रसार आम आदमी पार्टी की जनहितकारी छवि को चमकाने में किया जाए। लेकिन ईमानदार अधिकारी इस हक में नहीं हैं। वीरेंद्र कुमार शर्मा और अजोय शर्मा सरीखे अधिकारी इसी श्रेणी में आते हैं।

यह अपने आप में एक रहस्य है कि पंजाब सरकार अपने प्रचार-प्रसार के लिए लोक संपर्क विभाग को आवंटित करोड़ों रुपए की भारी-भरकम राशि क्यों खर्च करना नहीं चाहती? प्रचार-प्रसार के लिए अन्य विभागों पर क्यों दबाव बनाया जा रहा है है? वह भी इस तरह।  

अजोय शर्मा और वीरेंद्र कुमार शर्मा अकेले ऐसे आला अफसर नहीं हैं, जिन पर दबाव में न आने के चलते ऐसा अपमानजनक सुलूक किया गया, बल्कि यह फेहरिस्त लंबी है। खुलासे इसलिए नहीं हुए कि तबादला सरकार का विशेषाधिकार है।

गौरतलब है कि जानकारी के मुताबिक सबसे पहले मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी अनिरुद्ध तिवारी को बदला गया। फिर आईएएस अफसर गुरकीरत कृपाल सिंह को बदला गया। उनका तबादला काफी विवादास्पद रहा था। सूत्र बताते हैं कि खनन विभाग के प्रमुख कृष्ण कुमार (जिनकी ईमानदारी का आम लोग ही नहीं बल्कि सियासतदान भी उदाहरण देते हैं) पर दबाव बनाया गया कि वह कुछ चुनिंदा जगहों पर अवैध माइनिंग होने दें।

‘दिल्ली वालों’ का ‘आदेश’ मानने से साफ इनकार करने वाले कृषि विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव सरबजीत सिंह भी रातों-रात बदल दिए गए। बताते हैं कि सरकार के निशाने पर कई और अधिकारी भी हैं। ‘ऊपर’ से सारी स्क्रीनिंग हो रही है। कुछ आला अधिकारी नाम नहीं देना चाहते लेकिन स्पष्ट कहते हैं कि हुकूमत भगवंत मान नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी आलाकमान चला रहा है और वह भी तानाशाही तरीके से।

अलग से बताने की जरूरत नहीं है कि आप आलाकमान किसी एक व्यक्ति विशेष का ही नाम है। कार्यकारिणी या कार्यसमिति तो महज दिखावा भर है। तो क्या पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी ‘एक दिखावा या मुखौटा’ हैं? आम लोग तो अब यह बात सरेआम कहने लगे हैं और विपक्ष सड़क से लेकर विधानसभा तक बहुत समय से कह रहा है।

प्रसंगवश, सामान्य लोक प्रशासन में ही नहीं बल्कि पुलिस विभाग में भी ऐसा हो रहा है। आईपीएस अधिकारी को एक जिले में लंबे अरसे तक नहीं टिकने दिया जाता। अभी वह जिले का आपराधिक तामझाम समझने की प्रक्रिया में ही होता है कि चंडीगढ़ से तबादले का आदेश आ जाता है। फौरी हालत यह है कि सिविल अफसरों में ही नहीं बल्कि पुलिस अधिकारियों में भी मान सरकार की तबादला नीति को लेकर जबरदस्त नाराजगी है।

एक बड़े पुलिस अधिकारी का कहना है, “मुझे और अन्य जिलों में तैनात साथी पुलिस अधिकारियों को हमेशा बिस्तर बांधे रखना पड़ता है कि पता नहीं कब नया फरमान सुना दिया जाए। हम तो अपने बीवी बच्चों को भी साथ नहीं ले जाते।” अस्थिरता इस हद तक बनी हुई है।

बताते हैं कि पंजाब के ज्यादातर आईएएस और आईपीएस अधिकारी डेपुटेशन पर राज्य से बाहर जाना चाहते हैं और कई चले भी गए हैं तथा कई कतार में हैं। सूबे में आमफहम है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान की अगुवाई वाली सरकार आम आदमी पार्टी सरकार को ईमानदार अफसर नहीं चाहिए।

(पंजाब से वरिष्ठ पत्रकार अमरीक की रिपोर्ट)

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