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अडानी पॉवर प्लांट के लिए जबरिया कब्जाई जा रही किसानों की जमीन

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25 सितंबर 2018 को बीबीसी में एक खबर आई, इसमें माली गांव की लुखुमोयी मुर्मू ने बीबीसी से कहा, “हमने पॉवर प्लांट के लिए अपनी ज़मीन नहीं दी है। फिर जाने कैसे मेरी ज़मीन का अधिग्रहण हो गया। 31 अगस्त को अडानी कंपनी के लोग सैकड़ों पुलिस वालों और लठैतों के साथ मेरे गांव आए और मेरे खेत पर जबरन कब्ज़ा करने की कोशिश की। उन लोगों ने मेरी धान की फसल बर्बाद कर दी और बुल्डोज़र चलाकर सारे पेड़-पौधे उखाड़ दिए। मैंने उनका पैर पकड़ा। फसल नहीं उजाड़ने की मिन्नतें की, लेकिन वे अंग्रेज़ों की तरह दमन पर उतारू थे।” यह मामला है झारखंड के माली गांव का। यहां के असल हालात बताने से पहले आपको अडानी के इस प्रोजेक्ट के बारे में बताते हैं।

मार्च 2019 को एक खबर आई। खबर थी कि झारखंड सरकार ने अडानी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड की 14,000 करोड़ रुपये की विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) परियोजना को मंजूरी दे दी है। इसकी जानकारी एक अधिकारी ने दी। इस परियोजना में बनने वाली पूरी बिजली बांग्लादेश को निर्यात की जाएगी। अधिकारी ने बताया कि वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता वाले मंजूरी बोर्ड ने इस परियोजना को स्वीकृति दी है। यह मंजूरी बोर्ड सेज पर फैसला लेने वाला शीर्ष निकाय है।

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बता दें कि अडानी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड ने राज्य के गोड्डा जिले में 425 हेक्टेयर क्षेत्र में बिजली के लिए क्षेत्र विशेष सेज स्थापित करने को मंजूरी देने की मांग की थी। यह परियोजना मोतिया, माली, गायघाट और निकटवर्ती गांवों में लगाई जाएगी। कंपनी को 222.68 हेक्टेयर क्षेत्र में भूमि कब्जे की औपचारिक मंजूरी मिली है। शेष 202.32 हेक्टेयर भूमि के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिलनी बाकी है।

इस परियोजना में 14,000 करोड़ रुपये के निवेश से 800-800 मेगावाट के दो सुपरक्रिटिल इकाइयां स्थापित की जाएंगी। इसके अलावा इसमें पानी की पाइपलाइन और बिजली निकासी की व्यवस्था की स्थापना भी शामिल है। यह परियोजना 2022 के अंत तक पूरी हो जाएगी। कंपनी इस परियोजना से उत्पादित पूरी बिजली की आपूर्ति बांग्लादेश को करने के लिए पहले ही बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर कर चुकी है।

सितंबर 2017 में ऐसी खबर आई थी कि संताल का पहला पॉवर प्लांट जिसे गोड्डा में अडानी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड लगाएगी, इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय स्वीकृति (क्लीयरेंस) मिल गई है। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रालय ने सशर्त क्लीयरेंस दी है। क्लीयरेंस मिलते ही गोड्डा में अडानी पॉवर प्लांट की सारी अड़चनें दूर हो गई हैं।

14 हजार करोड़ रुपये निवेश से अडानी पॉवर के इस प्रोजेक्ट के बन जाने से न सिर्फ गोड्डा के दिन बहुरेंगे बल्कि संताल परगना के विकास में इसका अहम योगदान होगा। पॉवर प्लांट की क्षमता 1600 मेगावाट होगी। 1255 एकड़ जमीन पर यह पूरा प्रोजेक्ट स्थापित होगा। इसमें 252 एकड़ जमीन को ग्रीन बेल्ट विकास के लिए रिजर्व रखा गया है। 80 एकड़ जमीन पर मुख्य प्लांट बनेगा जबकि 172 एकड़ जमीन पर प्लांट के लिए जलाशय औ ऐश-पौंड बनेगा। यह प्लांट इंपोर्टेड कोल बेस्ड थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट होगा। इस प्लांट में पांच हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। इसमें स्किल्ड और अनस्किल्ड लेबर शामिल होंगे। इसके अलावा 1800 कर्मचारी भी यहां काम करेंगे और गोड्डा जिले के लाखों लोगों को प्लांट से प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलेगा।

आगे बताया गया है कि अडानी पॉवर ने गोड्डा थर्मल पॉवर प्लांट के लिए 841 परिवारों के पुनर्वास पर 507 करोड़ का प्रावधान रखा है। इसमें 841 परिवार के कुल 5339 लोग प्रभावित हैं। इसमें 2883 पुरुष और 2450 महिला शामिल हैं।

अडानी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड के इस मेगा वायदों में जो शामिल था उसके हिसाब से कंपनी कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसब्लिटी पर 55.62 करोड़ खर्च करेगी। इसमें शिक्षा, सेनिटेशन, हेल्थ, आजीविका, ग्रामीण संरचना और ग्रामीण खेलकूद पर ये राशि खर्च होगी।

अब आपको ले चलते हैं माली गांव। गांव में आदिवासियों के डेढ़ दर्जन घर हैं। क़रीब 100 लोगों की आबादी वाले इस गांव में एक घर लुखुमोयी मुर्मू का भी है। उन्होंने अपनी जमीन पर जबरन कब्जा करने की घटना को याद करते हुए बताया, “उन लोगों ने हमारी ज़मीन पर जबरन बाड़ लगा दिया। हमारे पुरखों के श्मशान को भी तोड़कर समतल कर दिया। उन लोगों ने कहा कि अब यह ज़मीन अडानी कंपनी की है, मेरी नहीं। हमें बताया गया कि इन ज़मीनों का अधिग्रहण हो चुका है और इसका मुआवज़ा सरकार के पास जमा करा दिया गया है। आप बताइए कि जब हमने ज़मीन ही नहीं दी, तो इसका अधिग्रहण कैसे कर लिया गया। हमको अपनी ज़मीन चाहिए, मुआवज़े का रुपया नहीं।”

बता दें कि ज़मीन पर कब्ज़े के वक़्त अधिकारियों के पैर पकड़ कर रोती उनकी तस्वीरें और फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। वे और उनके गांव के आदिवासी पॉवर प्लांट के लिए ज़मीन के अधिग्रहण का विरोध करते रहे हैं। इन आदिवासियों की क़रीब पौने सतरह बीघा पुश्तैनी ज़मीन है, जिस पर खेती कर वे अपनी आजीविका चलाते हैं।

मोतिया गांव के राम जीवन पासवान रिटायर्ड शिक्षक हैं। सात फरवरी 2018 को उनका एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें वे रोते, गिड़गिड़ाते हाथ जोड़ते दिख रहे थे। उन्होंने अपनी ज़मीन के जबरन अधिग्रहण और मारपीट के आरोप में अडानी समूह के कुछ अधिकारियों पर मुक़दमा किया हुआ है। उनका कहना है कि अडानी समूह की झारखंड सरकार से मिलीभगत है। उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड की सरकार ‘प्रो पीपुल’ न होकर ‘प्रो अडानी’ हो चुकी है और उन्हें अवैध तरीके से मदद कर रही है।

रामजीवन पासवान कहते हैं, “सरकार झूठ बोल रही है। ग़लत तथ्यों के आधार पर हमारी ज़मीनों का अधिग्रहण कर लिया गया है, जबकि हमने अपनी सहमति का पत्र सौंपा ही नहीं है। ये लोग दलालों (बिचौलियों) की मदद से लोगों को डराकर ज़मीनें अधिग्रहीत करा रहे हैं।”

वे रोते हुए कहते हैं, “फ़रवरी महीने में अडानी समूह के कुछ लोग मेरे खेत पर आए। मुझे मेरी जाति (दुसाध) को लेकर गालियां दीं और कहा कि इसी ज़मीन में काटकर गाड़ देंगे। मेरी ज़िंदगी में पहले किसी ने ऐसी गाली नहीं दी थी। मैं इस घटना को भूल नहीं पाता हूं। मेरे घर पर ईंट-पत्थर से हमला कराया गया और अब पुलिस इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।”

रामजीवन न्याय की उम्मीद में दर-दर भटक रहे हैं। वे मामले को लेकर मानव अधिकार आयोग रांची पहुंचे और बताया कि न्यायालय से लेकर सभी जगहों पर न्याय की गुहार लगाई, घटना के बाद सदमें में मेरी पत्नी की मौत हो गई। डबडबाई आंखें लिए वे कहते हैं, “डबल इंजन वाली सरकार किसानों को लाभ दिलाने के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणा कर रही है जबकि इसकी सच्चाई गोड्डा के मोतिया में देखा जा सकता है।”

सरकार ने दलित किसानों की जमीन अडानी कंपनी के लिए छीनने का काम किया है। वे कहते हैं, “कोर्ट के आदेश के बाद कंपनी के कर्मचारी पर एससी-एसटी उत्पीड़न का मामला कांड संख्या 38/18 दिनांक 18 मार्च को दर्ज हुआ लेकिन इसकी जांच में भी प्रशासन लीपापोती कर रही है।”

पहले किसान रामजीवन पासवान ने एससी-एसटी उत्पीड़न को लेकर केस दर्ज कराना चाहा लेकिन केस दर्ज नहीं हो सका था। कोर्ट के आदेश के बाद एससी-एसटी उत्पीड़न संबंधी केस मुफस्सिल थाना गोड्डा में एक माह बाद दर्ज किया गया। मामले के अनुसंधान के बाद अनुमंडल पदाधिकारी गोड्डा ने उपायुक्त को भेजी रिपोर्ट में लिखा है, थाना प्रभारी मुफस्सिल थाना गोड्डा के प्रतिवेदन के अनुसार ग्रामीण रामजीवन पासवान के मामले में जांच उपरांत गाली-गलौच मारपीट होने के संबंध में जानकारी नहीं मिली। रामजीवन पासवान के आरोप सही प्रतीत नहीं होते हैं।

मामले को लेकर डीएसपी गोड्डा ने पांच गवाहों के बयान भी दर्ज किए थे, लेकिन जांच रिपोर्ट अडानी कंपनी के पक्ष में तैयार की गई।

“रामजीवन पासवान कहते हैं, “आखिर देश में गरीब किसान कहां जाए, सरकार ही बाता दे। पुलिस-जिला प्रशासन पूरी तरह अडानी कंपनियों के लिए काम कर रही हैं। यहां किसानों को न्याय कैसे मिल सकता है। राज्य में सरकार कंपनियों के लिए जमीन लूटने का काम कर रही है। विकास के झूठे वादे के नाम पर जमीन की लूट की छूट कंपनियों को राज्य में मिली हुई है।” अंत में वे जुझारू तेवर में कहते हैं, “न्याय के लिए हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। वर्तमान रघुवर सरकार में राज्य के किसानों की जमीन सुरक्षित नहीं है।”

इसी गांव के गणेश पंडित का अलग दर्द है। सरकार ने ज़मीनों के अधिग्रहण के लिए बनाई गई रैयतों की सूची में उन्हें मृत बताकर उनकी ज़मीन अधिग्रहित कर ली है। वे बताते हैं, “मुझे कंपनी (अडानी) के लोगों ने मार दिया। तीन बेटा में दो का ही नाम दिखाया और मेरी ज़मीन को मेरी सहमति के बग़ैर अधिग्रहीत कर लिया। मैंने मुआवज़े का पैसा नहीं लिया है। इसके बावजूद मेरी ज़मीन पर बाड़ लगाकर उसकी घेराबंदी कर दी गई है।”

गंगटा गोविंदपुर गांव के सूर्य नारायण हेंब्रम की भी ऐसी ही शिकायत है। उन्होंने बताया कि जुलाई में अपने खेत में धान का बिचड़ा लगाते वक़्त अडानी कंपनी के कथित मैनेजरों ने उन्हें अपना खेत जोतने से रोक दिया। उन्होंने मुआवज़ा नहीं लिया है, क्योंकि वे पॉवर प्लांट के लिए अपनी ज़मीन देना नहीं चाहते हैं। सरकार ने उनकी ज़मीन का ज़बरदस्ती अधिग्रहण कर लिया है। सूर्यनारायण हेंब्रम (गंगटा), राकेश हेंब्रम, श्रवण हेंब्रम, मैनेजर हेंब्रम, अनिल हेंब्रम, बबलू हेंब्रम, चंदन हेंब्रम, मुंशी हेंब्रम, पंकज हेंब्रम (सभी माली गांव के) और रामजीवन पासवान और चिंतामणि साह (मोतिया) ने आरोप लगाया कि दिसंबर 2017 में जनसुनवाई के वक़्त अडानी समूह के अधिकारियों ने कथित तौर पर फर्जी रैयतों को खड़ा कर खानापूरी कर ली है।

जिले के मल्ली गांव के आदिवासी परिवार बहुत लंबे समय से खेती पर जीवन यापन कर रह हैं। इन दस परिवारों के लिए नुकसान विनाशकारी है। स्थानीय लोग दावा करते हैं कि सरकार अडानी परियोजना के लिए उनकी जमीन अधिग्रहण कर रही है, भले ही कई लोग बेचना नहीं चाहते। वे कहते हैं कि वे अडानी समूह से पैसे नहीं चाहते हैं, वे सिर्फ अपने पैतृक भूमि को अपने साथ रखना चाहते हैं क्योंकि यह उनकी एकमात्र आजीविका है।

इसी गांव की मेरी निशा हांसदा ने यह भी दावा किया कि अडानी के अधिकारियों ने उनके ‘जांग बाहा’ (पैतृक कब्रगाह ) को नष्ट कर दिया। गोड्डा के अपर समाहर्ता (एसी) अनिल तिर्की ने मीडिया को बताया कि सरकार ने अडानी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड के गोड्डा प्लांट के लिए 517 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया है। अडानी समूह को 900 एकड़ से कुछ अधिक जमीन चाहिए। इसके लिए पोड़ैयाहाट प्रखंड के सोनडीहा और गायघाट गांवों की क़रीब 398 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की गई थी। जमीनों के जबरन अधिग्रहण और आदिवासियों और दूसरे ग्रामीणों के अन्य आरोपों के संबंध में पूछे गए सवालों का उन्होंने यह कहकर जवाब नहीं दिया कि वह इसके लिए अधिकृत नहीं हैं।

वहीं, गोड्डा की डीसी कंचन कुमार पासी ने मीडिया के समक्ष दावा किया कि ज़मीनों के अधिग्रहण में भूमि अधिग्रहण क़ानूनों का पालन किया जा रहा है।

(रांची से विशद कुमार की रिपोर्ट)

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