Saturday, May 28, 2022

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोर्ट की अनुमति के बगैर शिक्षा सेवा अधिकरण के गठन पर लगाई रोक

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इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस गोविंद माथुर एवं जस्टिस एसएस शमशेरी की खंडपीठ ने स्वतः कायम जनहित याचिका पर शिक्षा सेवा अधिकरण की विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप न करते हुए कोर्ट की सहमति के बगैर अधिकरण के गठन पर रोक लगा दी है। साथ ही न्यायिक कार्य से विरत प्रयागराज व लखनऊ के वकीलों से काम पर लौटने का आग्रह किया है। इसके अलावा चीफ जस्टिस से शैक्षिक व गैर शैक्षिक स्टॉफ के विचाराधीन मामलों के निस्तारण को गति देने के लिए अतिरिक्त पीठें बनाने को कहा है।

खंडपीठ ने राज्य सरकार को बार एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल को आमंत्रित कर उनकी शिकायतों के निवारण का प्रयास करने का निर्देश भी दिया है। जीएसटी अधिकरण के मुद्दे पर लखनऊ पीठ में सुनवाई के कारण कोई आदेश नहीं किया है। खंडपीठ ने कहा कि कोरोना काल के दौरान लॉकडाउन में भी हाई कोर्ट में न्यायिक कार्य सुचारु रूप से चला, लेकिन शिक्षा सेवा अधिकरण की पीठ स्थापित करने के मुद्दे को लेकर देश के सबसे बड़े इलाहाबाद हाई कोर्ट के अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत हैं, जिससे न्यायिक कार्य के निस्तारण में अवरोध उत्पन्न हुआ है।

खंडपीठ ने शैक्षिक और गैर शैक्षिक स्टॉफ के बीते 20 साल के मुकदमों का चार्ट देखा, जिससे पता चला कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की प्रयागराज स्थित प्रधान पीठ में सेवा के 188632 मामले दाखिला हुए, जिनमें से 33290 विचाराधीन हैं। इसी प्रकार लखनऊ खंडपीठ में 55913 मामले दाखिल हुए और 15003 विचाराधीन हैं।

शिक्षा सेवा अधिकरण कानून में लखनऊ में मुख्यालय और प्रयागराज में पीठ के गठन की व्यवस्था है। चेयरमैन को बैठने के दिन तय करने का विवेकाधिकार दिया गया है। इसके गठन को लेकर इलाहाबाद व लखनऊ के बार एसोसिएशन को शिकायत है, जिसे लेकर वे न्यायिक कार्य से विरत हैं नतीजतन हाई कोर्ट के मुकदमों के निस्तारण में अवरोध उत्पन्न हुआ है। अधिकरण गठित होने से त्वरित निस्तारण का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

शिक्षण संस्थाओं के अधिक मुकदमे प्रयागराज में हैं। ऐसे में यहां अधिक बेंच बैठाकर निस्तारण में तेजी लाई जा सकती है। न्यायिक कार्य बहिष्कार से कोर्ट के कीमती समय की बर्बादी हो रही है। इसी तरह 2019 में भी हड़ताल हुई थी। कहा कि मुकदमों के निस्तारण में वकीलों की सहभागिता जरूरी है, इसलिए न्यायिक कार्य चालू रखने को यह निर्देश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश इलाहाबाद व लखनऊ में अतिरिक्त बेंच बैठाकर मुकदमों के निस्तारण मे तेजी लाएंगे और सरकार को बार एसोसिएशन से बात करनी होगी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की मांग है कि शिक्षा अधिकरण बिल वापस हो, सुप्रीम कोर्ट के टीएम पाई केस के निर्णय के अनुसार अधीनस्थ न्यायालयों की शक्ति बढ़ाई जाए, यदि बिल वापस नहीं होता है तो अधिकरण का गठन सुप्रीम कोर्ट के मद्रास बार एसोसिएशन केस में दिए फैसले के अनुरूप किया जाए। अधिकरण बनने की स्थिति में हाई कोर्ट की प्रधानपीठ और लखनऊ खंडपीठ के क्षेत्राधिकार के अनुसार ही अधिकरण के क्षेत्राधिकार का भी बंटवारा हो।

आन्दोलनरत वकीलों का कहना है की इससे उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार समाप्त कर अब न्यायाधिकरण को शिक्षा सम्बन्धी वादों का क्षेत्राधिकार दिया जा रहा है।

अधिकरण में अधिवक्ताओं की भूमिका समाप्त
अधिकरण का निर्णय सीधे उच्चतम न्यायालय में ही चुनौती दे सकेंगे, कितने वादकारियों में क्षमता है उच्चतम न्यायालय जाने की। केन्द्र सरकार न्यायाधिकरण समाप्त कर रही है। सुप्रीम कोर्ट भी मानता है कि न्यायाधिकरण अपेक्षित परिणाम देने में असफल रहे हैं। अधिकतर न्यायाधिकरणों में पद रिक्त हैं। न्यायाधिकरणों की गुणवत्ता उच्च न्यायालय अथवा जनपद न्यायालय की अपेक्षा आप सभी स्वयं समझते हैं। नौकरशाहों की सुविधा के अतिरिक्त न्यायाधिकरण में कौन सी विशेष बात है?

न्यायाधिकरण से उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार ही नहीं कम हुआ शिक्षकों, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों, प्रबंधतंत्रों को भ्रष्ट व्यवस्था में झोंक दिया गया है। ढाई लाख मुकदमें उच्च न्यायालय इलाहाबाद व लखनऊ पीठ से तत्काल हटेंगे। विधि आयोग की रिपोर्ट भी न्यायाधिकरणों को सफेद हाथी मानकर समाप्त करने की संस्तुति कर चुका है। वकीलों का कहना है कि सुलभ न्याय के लिए न्यायाधिकरण के स्थान पर सभी जनपद न्यायालयों को क्षेत्राधिकार देना उचित विकल्प होगा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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