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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलीगढ़ में सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले पुलिसकर्मियों की निशानदेही कर कार्रवाई का दिया आदेश

इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को यूपी सरकार के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे उन पुलिसकर्मियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करें जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के छात्रों को चोट पहुंचाई और जो यूनिवर्सिटी में मोटरसाइकिलों को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं में शामिल थे। यह आदेश चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस समित गोपाल की खंडपीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मामले पर दी गई रिपोर्ट के आधार पर दिया है।

खंडपीठ ने यह आदेश मोहम्मद अमन खान द्वारा 15 दिसंबर, 2019 को एएमयू में एक एंटी-सीएए विरोध के दौरान पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने मुख्य सचिव, डीजीपी यूपी पुलिस, डीजीपी सीआरपीएफ तथा एएमयू के कुलपति को आदेश का पालन करने और अनुपालन रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया है तथा मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को निर्देश दिया था कि वह एएमयू में सीएए के विरोध-प्रदर्शन के दौरान कथित रूप से पुलिस द्वारा की गई हिंसा की जांच करे। आयोग को 5 सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया था और इसके बाद एक सप्ताह का समय और बढ़ाया गया था। इसके बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा अदालत को सौंपी गई रिपोर्ट में सिफारिशें की गयी हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया जाए कि वे उन छह छात्रों को उचित मुआवजा प्रदान करें, जो घटना में गंभीर रूप से घायल हुए हैं। जैसा कि मोटरसाइकिलों को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं में शामिल पुलिस वालों को सीसीटीवी फुटेजों में देखा गया है, डीजीपी-उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया जाए कि इन पुलिसकर्मियों की पहचान करके इन पर कड़ी कार्रवाई करें।

पुलिस बल को संवेदनशील बनाया जाना चाहिए और ऐसी परिस्थितियों से निपटने में व्यावसायिकता को विकसित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार किए जाने चाहिए। यही निर्देश भी आरएएफ के लिए महानिदेशक, सीआरपीएफ को दिए जा सकते हैं। आरएएफ एक विशेष बल है जो मुख्य रूप से दंगों से निपटने और कानून और व्यवस्था की स्थितियों को संभालने के लिए स्थापित किया जाता है, ऐसी संकटकालीन परिस्थितियों में अत्यंत व्यावसायिकता दिखानी चाहिए, साथ ही साथ नागरिकों के मानवाधिकारों का भी सम्मान करना चाहिए।

आयोग ने कहा है कि यूपी के डीजीपी को निर्देश दिया जाए कि वे यह सुनिश्चित करें कि अपने आदेश दिनांक 06 जनवरी 2020 से गठित एसआईटी सभी संबंधित मामलों की जांच योग्यता के आधार पर और समयबद्ध तरीके से करे। न्यायालय भी समय पर जांच पूरी करने के लिए समय सीमा और आवधिक समीक्षा, यदि कोई हो, निर्धारित कर सकता है। आयोग ने कहा है कि डीजीपी यूपी और वरिष्ठ अधिकारियों को एक मजबूत खुफिया एकत्रीकरण प्रणाली को सुधारने और स्थापित करने की सलाह दी जानी चाहिए। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वाले और विकृत और झूठी खबरों के प्रसार को रोकने के लिए विशेष कदम उठाए जा सकते हैं। यह ऐसी कानून और व्यवस्था की घटनाओं को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने के लिए है जो अनायास और अप्रत्याशित रूप से घटित होती हैं।

आयोग ने कहा है कि छात्रों के साथ बेहतर संचार का एक तंत्र स्थापित करने के लिए एएमयू-कुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों को निर्देशित किया जाए ताकि वे बाहरी लोगों और प्रभावित अनियंत्रित छात्रों से प्रभावित न हों। उन्हें छात्रों के विश्वास के पुनर्निर्माण के लिए सभी आत्मविश्वास बढ़ाने के उपाय करने चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से कहा है कि वे जल्द से जल्द सिफारिशों का पालन करें और 25 मार्च को एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें। आदेश में कहा गया है कि मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार, पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश सरकार, महानिदेशक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, कुलपति, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और कुलसचिव, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों का जल्द से जल्द पालन करने का निर्देश दिया जाता है। अनुपालन की एक रिपोर्ट लिस्टिंग की अगली तारीख पर इस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जानी चाहिए। 25 मार्च, 2020 को रिट याचिका को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।

यह थी याचिका अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों पर 15 दिसंबर, 2019 को पुलिस द्वारा हिंसा के खिलाफ जनहित याचिका में कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के खिलाफ 13 दिसंबर को शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे। हालांकि, 15 दिसंबर को ये छात्र मौलाना आजाद पुस्तकालय के आस पास एकत्रित हुए और विश्वविद्यालय गेट की ओर मार्च किया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि विश्वविद्यालय गेट पर पहुंचने पर वहां तैनात पुलिस ने छात्रों को उकसाना शुरू कर दिया, लेकिन छात्रों ने प्रतिक्रिया नहीं दी।

कुछ समय बाद पुलिस ने इन छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़ने शुरू कर दिए और उन पर लाठियां बरसाईं जिसमें करीब 100 छात्र घायल हो गए। वहीं राज्य सरकार की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल किया गया था और पुलिस कार्रवाई का बचाव किया। राज्य ने दलील दी थी कि विश्वविद्यालय का गेट छात्रों द्वारा तोड़ दिया गया था और विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुरोध पर पुलिस ने हिंसा में लिप्त विद्यार्थियों को काबू में करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश किया और इस कार्रवाई के दौरान कोई अतिरिक्त बल प्रयोग नहीं किया गया।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 25, 2020 1:34 pm

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