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Friday, September 17, 2021

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धर्मांतरण कानून संबंधी याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मांगा यूपी सरकार से जवाब

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में लाए गए धर्मांतरण कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने जवाब के लिए सरकार को चार सप्ताह का समय दिया है। यह आदेश चीफ जस्टिस संजय यादव और जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट ने याचियों से सरकार का जवाब दाखिल होने के बाद उस पर एक सप्ताह में प्रतिउत्तर शपथपत्र दाखिल करने को कहा है। साथ ही मामले को अगली सुनवाई के लिए दो अगस्त से प्रारंभ हो रहे सप्ताह में सूचीबद्ध करने को कहा है।

एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनीशिएटिव व एक अन्य की ओर से दाखिल याचिका के जरिए धर्मांतरण कानून को चुनौती दी गई है। याचिका में धर्मांतरण कानून को संविधान के विपरीत बताते हुए कहा गया है कि सिर्फ सियासी फायदा उठाने के लिए यह कानून बनाया गया है। यह भी कहा गया कि इससे एक वर्ग विशेष के लोगों का उत्पीड़न भी किया जा सकता है। याचिकाओं में धर्मांतरण कानून के दुरुपयोग की भी आशंका जताई गई है।

इसके अलावा कोर्ट ने अध्यादेश को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं को अधिनियम को चुनौती देने वाली एक नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ खारिज भी किया है। कोर्ट ने कहा कि धर्मांतरण अध्यादेश अब कानून बन चुका है। ऐसे में इसे लेकर लंबित याचिकाओं पर सुनवाई करने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने इसी के साथ धर्मांतरण अध्यादेश को चुनौती देने वाली इन छह याचिकाओं में संशोधन की अर्जी भी नामंजूर कर दी है।

खंडपीठ ने एडवोकेट वृंदा ग्रोवर के माध्यम से एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स द्वारा 2021 के अधिनियम को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। खंडपीठ ने निर्देश दिया है कि अगली तारीख से पहले मामले में दलीलें पूरी कर ली जाएं। मामले को 2 अगस्त, 2021 से शुरू होने वाले सप्ताह में बहस के लिए सूचीबद्ध किया गया। इसके अलावा, जैसा कि पहले कहा गया था, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिकाओं को निष्प्रभावी बताते हुए वापस लेने के लिए कहा, क्योंकि अध्यादेश को एक अधिनियम के साथ बदल दिया गया है।

खंडपीठ ने संशोधन आवेदनों को अनुमति देने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं को नए सिरे से दाखिल करने के लिए कहा। चीफ जस्टिस यादव ने शुरुआत में कहा कि आप पूरी याचिका में कैसे संशोधन कर सकते हैं? हम आपको केवल प्रार्थना खंड में संशोधन करने की अनुमति दे सकते हैं। अन्यथा वापस ले लें या हम इसे खारिज कर रहे हैं।

इस साल फरवरी में पारित अधिनियम, विशेष रूप से विवाह द्वारा धर्मांतरण को अपराध मानता है। अधिनियम की धारा 3 एक व्यक्ति को विवाह द्वारा दूसरे व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करने से रोकती है। दूसरे शब्दों में, विवाह द्वारा धर्म परिवर्तन को गैर-कानूनी बना दिया जाता है। इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर कम से कम एक साल की कैद की सजा हो सकती है, जिसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है और कम से कम पंद्रह हजार रुपये का जुर्माना हो सकता है। यदि परिवर्तित व्यक्ति एक महिला है, तो सजा सामान्य अवधि से दोगुनी हो सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह कानून सलामत अंसारी मामले में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ की आधिकारिक घोषणा के विपरीत है। यूपी सरकार ने हालांकि दावा किया कि अध्यादेश सभी प्रकार के जबरन धर्मांतरण पर समान रूप से लागू होता है और यह केवल अंतरधार्मिक विवाह तक ही सीमित नहीं है। इसने यह भी कहा कि सलामत अंसारी मामले में हाईकोर्ट के हाल के खंडपीठ के फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि इसने अंतर-मौलिक अधिकार और अंतर-मौलिक अधिकारों से संबंधित प्रश्न से निपटा नहीं है, क्योंकि इसने माननीय का ध्यान भी छोड़ दिया है।

खंडपीठ ने कहा कि सामाजिक हित के लिए किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा क्या होगा। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत अध्यादेश बनाने की शक्ति का प्रयोग करने के लिए कोई आकस्मिक आधार नहीं है और राज्य कानून को सही ठहराने के लिए किसी भी अप्रत्याशित या तत्काल स्थिति को दिखाने में विफल रहा। इससे पहले, उच्चतम न्यायालय ने कानून के खिलाफ याचिकाओं पर विचार करने से इनकार करते हुए पक्षकारों को हाईकोर्ट जाने को कहा था।

याचिकाओं में संविधान के आर्टिकल 14 और 21 के उल्लंघन के रूप में अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है क्योंकि यह कथित रूप से राज्य को किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दबाने और किसी व्यक्ति की पसंद की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करने का अधिकार देती है। इस साल फरवरी में पारित अधिनियम, विशेष रूप से विवाह द्वारा धर्मांतरण को अपराध घोषित करता है। अधिनियम की धारा 3 एक व्यक्ति को विवाह द्वारा दूसरे व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करने से रोकती है। दूसरे शब्दों में, विवाह द्वारा धर्म परिवर्तन को गैर-कानूनी बना दिया गया है। इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर कम से कम एक साल की सजा हो सकती है, जिसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है और कम से कम पंद्रह हजार रुपये का जुर्माना हो सकता है। यदि धर्म परिवर्तन करने वाली व्यक्ति एक महिला है, तो सजा सामान्य अवधि से दोगुनी है और जुर्माना होगा।

याचिका में कहा गया है कि यह कानून सलामत अंसारी मामले में हाईकोर्ट न्यायालय की एक खंडपीठ की आधिकारिक घोषणा के विरोधात्मक है। यूपी सरकार ने हालांकि दावा किया है कि अध्यादेश सभी प्रकार के जबरन धर्मांतरण पर समान रूप से लागू होता है और यह केवल अंतर्धार्मिक विवाहों तक ही सीमित नहीं है। इसने यह भी कहा कि सलामत अंसारी मामले में हाल ही में हाईकोर्ट डिवीजन बेंच के फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि इसने इंटर-मौलिक अधिकार और इंट्रा-मौलिक अधिकारों से संबंधित प्रश्न पर विचार नहीं किया है। वही इस निर्णय में डिवीजन बेंच का ध्यान इस बात पर भी नहीं गया कि सामाजिक हित के लिए किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा क्या होगा?

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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