Saturday, October 16, 2021

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अमरुल्लाह सालेह ने तालिबानी हुकूमत के खिलाफ ठोकी ताल

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नई दिल्ली। भले ही अफगानिस्तान को अमेरिका बीच अधर में छोड़ गया हो। भले ही चीन, रूस और पाकिस्तान तालिबान के साथ खड़े दिखाई दे रहे हों, भले ही दुनिया के शासक अफगानिस्तान में तालिबानियों की दरिंदगी को अनदेखा कर रहे हों, भले ही अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर फरार हो गये हों। इन सबके बावजूद अफगानिस्तान में एक ऐसा शख्स भी है जिसने तालिबान राज के खिलाफ ताल ठोक दी है। यह शख्स है अफगानिस्तान में दशकों से विद्रोहियों का गढ़ रहे पंजशीर घाटी का एक बेटा। बात हो रही है तालिबान के सबसे बड़े दुश्मन और अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह की। अमरुल्लाह सालेह ने अशरफ गनी के देश से फरार होने के बाद बाकायदा खुद को अफगानिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं ताजिकिस्तान में अफगान दूतावास ने अमरुल्लाह सालेह को अपना राष्ट्रपति घोषित किया है। दूतावास ने अशरफ गनी की तस्वीर को हटाकर उनकी जगह पर सालेह की तस्वीर लगाई है। यही नहीं पंजशीर के शेर कहे जाने वाले कमांडर अहमद शाह मसूद की भी तस्वीर लगाई गई है। माना जा रहा है कि ताजिकिस्तान में अफगान दूतावास ने खुलकर सालेह का समर्थन कर दिया है।

अमरुल्लाह सालेह ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन पर भी निशाना साधते हुए कहा कि उनसे बहस करना अब बेकार है। सालेह ने नॉर्दन अलायंस की तरह अफगान नागरिकों से तालिबान के विरोध में खड़े होने की भी अपील की है। अमरुल्लाह सालेह ने ट्वीट कर कहा कि अफगानिस्तान के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति की अनुपस्थिति, पलायन, इस्तीफा या मृत्यु में उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बन जाता है। मैं वर्तमान में अपने देश के अंदर हूं और वैध देखभाल करने वाला राष्ट्रपति हूं। मैं सभी नेताओं से उनके समर्थन और आम सहमति के लिए संपर्क कर रहा हूं। हमें अफगानों को यह साबित करना होगा कि अफगानिस्तान वियतनाम नहीं है और तालिबान भी दूर से वियतनामी कम्युनिस्ट की तरह नहीं हैं।

सालेह का इतिहास रहा है कि अक्सर पाकिस्तान पर निशाना साधते रहते हैं। सालेह को भारत का करीबी दोस्त भी कहा जाता है। तालिबान इन्हें मारने की कई बार कोशिश कर चुका है पर सफल नहीं हो पाया। तमाम खतरों को दरकिनार करते हुए सालेह से फिर से तालिबान के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है।

यह सालेह की दूरगामी सोच ही थी कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जब अमेरिकी-नाटो सेनाएं कम होंगी तो तालिबानी हमले करेंगे। सालेह की रिपोर्ट सच साबित हुई और तालिबान ने आईएसआई की मदद से पूरे अफगानिस्तान पर 20 साल बाद कब्जा कर लिया। बताया जाता है कि करजई सालेह की इस रिपोर्ट पर भड़क गए थे और उन्होंने सालेह के निष्कर्षों को खारिज कर दिया था। हालांकि बाद में सालेह देश उपराष्ट्रपति बने। सालेह को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने भी ट्रेनिंग दी है। सालेह ने अपने जासूसों का ऐसा नेटवर्क तैयार किया है जो उन्हें अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान तक में तालिबान और आईएसआई की हरकतों पर नजर रखने में मदद करता है। कहा जाता है कि सालेह के भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ से अच्छे रिश्ते हैं। सालेह की इस दोस्ती की वजह से पाकिस्तानी उनसे नफरत करते हैं। जिहादियों के खिलाफ उनके सख्त कदमों के कारण तालिबान के वह सबसे बड़े दुश्मन हैं। तालिबानी सालेह को पकडऩा चाहते थे लेकिन वह चुपके से पंजशीर घाटी चले गए जो विद्रोहियों का अभेद्य किला है।

जनरल मुशर्रफ और जनरल कयानी से भिड़ चुके हैं सालेह : तालिबान के सबसे बड़े दुश्मन होने के नाते सालेह हमेशा आईएसआई और आतंकियों के निशाने पर रहते थे। सालेह पर सितंबर 2020 समेत अब तक कई बार भीषण जानलेवा हमले हो चुके हैं। ऐसे ही सालेह तालिबान और पाकिस्तान का दुश्मन नहीं बना है। सालेह के नेतृत्व में ही एनडीएस ने वर्ष 2004 में ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान के आवासीय इलाके का पता लगाया था। सालेह ने वर्ष 2006 में बगराम में पाकिस्तानी तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ और तत्कालीन आईएसआई चीफ जनरल अशफाक परवेज कयानी के सामने ही उनकी पोल खोलकर रख दी थी।

इस बैठक में कयानी इतने ज्यादा झल्ला उठे थे कि उन्होंने कहा कि मुझे अपने बेटे के उम्र के लड़के से खुफिया एजेंसी का काम नहीं सीखना है। सालेह ने इसके बाद भी अपनी बात को रखना जारी रखा। मुशर्रफ और करजई की बैठक में सालेह ने एक बार फिर से ओसामा का मुद्दा उठाया। इस पर मुशर्रफ भड़क गए और उन्होंने कहा, ‘करजई आप इस पंजशीरी आदमी को मुझे गुप्तचरी सिखाने के लिए क्यों लाए हैं। मुशर्रफ के इस बयान के बाद भी करजई ने अपना भरोसा सालेह पर बनाए रखा। सालेह हमेशा से ही मानते रहे हैं कि तालिबान के खिलाफ सेना की कार्रवाई जरूरी है।
अमरुल्लाह सालेह ऐसे ही तालिबान के दुश्मन नहीं बने हैं। इसके पीछे बड़ी कहानी है। दरअसल सालेह अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति का पदभार संभालने से पहले देश की खुफिया एजेंसी एनडीएस के चीफ थे। ताजिक जातीय समूह से आने वाले अमरुल्लाह की एक बहन थी।

तालिबान आतंकियों ने अमरुल्लाह सालेह का पता लगाने के लिए उनकी बहन को पकड़ लिया और बुरी तरह से प्रताड़ित किया। तालिबान प्रताडऩा के दौरान अमरुल्लाह की बहन की मौत हो गई। यह सालेह के दिल में बहन की मौत का बदला लेने और देशभक्ति की आग ही थी कि अफगानिस्तान में वर्ष 1980 के दशक में जब सोवियत सेनाएं घुसी थीं, उस समय सालेह ने पाकिस्तान में हथियारों का प्रशिक्षण हासिल किया और पंजशीर के शेर कहे जाने वाले कमांडर अहमद शाह मसूद के नेतृत्व में जंग लड़ी। इसके बाद जब तालिबान ने अफगानिस्तान में पैर पसारना शुरू किया तब सालेह मसूद के नेतृत्व में तालिबान के खिलाफ जंग में कूद गए। इसके बाद सालेह ने भारत के साथ दोस्ती बढ़ाई। उन्होंने अहमद शाह मसूद की भारतीय अधिकारियों से मुलाकात कराई और सहायता हासिल की।

सालेह ने खोली थी पाक-तालिबान नापाक दोस्ती की पोल : वर्ष 2001 में अमेरिका पर हमले के बाद तालिबान के खिलाफ शुरू हुए अमेरिकी सैन्य अभियान के दौरान खुफिया एजेंसियों के प्रभारी थे और अमेरिका की मदद की। वर्ष 2006 में सालेह ने एनडीएस के चीफ रहने के दौरान तालिबान पर एक जमीनी सर्वेक्षण कराया था जो लगातार हमले कर रहे थे।

उन्होंने पाया कि ये आतंकी पाकिस्तान में सक्रिय हैं और वहीं से हमले करते हैं। अपने अध्ययन को उन्होंने एक रिपोर्ट की शक्ल दी। इसका नाम ‘तालिबान की रणनीति दिया गया। इसमें सालेह की टीम ने लिखा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वर्ष 2005 में तालिबान को समर्थन देने का फैसला किया और नकद तथा पैसे मुहैया कराए।
इस बीच, अफगानिस्तान की हामिद करजई सरकार ने भारत को अपना दोस्त मानना शुरू कर दिया जिससे पाकिस्तान भड़क गया। इसके बाद पाकिस्तान ने तालिबान को पालना शुरू किया।

(चरण सिंह पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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