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प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र

माननीय प्रधानमंत्री जी,

                          तमाम राजनैतिक-वैचारिक विरोधों के बावजूद जब आप कुछ बोलने के लिए खड़े होते हैं तो एक जिम्मेवार नागरिक होने के नाते यथासम्भव आपकी बातों को सुनने का प्रयास करता हूं। क्योंकि जब आप बोलने के लिए खड़े होते हैं तो जेहन में ये नहीं रहता कि आप बीजेपी के एक कुशल नेता हैं, न ही ये रहता है कि आप बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस के एक अनुशासित स्वयंसेवक रहे हैं। मेरे जेहन में हमेशा यही बात पहले आती है कि एक विशाल लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री बोलने जा रहा है। वैसे भी प्रधानमंत्री केवल अपने मत देने वालों का ही प्रतिनिधित्व नही करता बल्कि पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन दुर्भाग्य की हर बार आपके बयान से निराशा ही मिली है।

माननीय प्रधानमंत्री जी,

            आपके कई बयान काफी हल्के और हास्यास्पद रहे हैं। आपके बयानों के बाद अक्सर आपकी मूर्खता की चर्चा होने लगती है। हालांकि मैं नहीं मानता कि इतने लंबे राजनैतिक संघर्ष के बाद इस मुकाम पर पहुंचने वाला शख़्स मूर्ख है, ये अलग बात है कि आपकी शैक्षणिक डिग्री विवादों में रही है।

आप जब भी बोलते हैं तो झूठ बोलते हैं, गलत ऐतिहासिक तथ्य को रखते हैं, अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बात करते हैं। माननीय, आपने कभी सोचा है कि – “आप के इस रवैये के कारण पूरे देश को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है ?”

आप कभी गटर की पाइप से गैस बनाने लगते हैं तो कभी गुरुनानक और कबीर की गोष्ठी एक साथ करवा देते हैं। कल भी महामहिम के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान आपने संसद में जम्मू कश्मीर के सम्मानित नेता उमर अब्दुल्ला के संदर्भ में गलत तथ्य को रखा। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर शाब्दिक हमला करते समय आप ऐसे-ऐसे शब्दों का चयन कर रहे थे जैसे संसद में खड़ा न होकर किसी चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हों। चुनावी सभाओं में भी आपके द्वारा विपक्ष को घेरने की कोशिश में एक अहंकार, अमर्यादित आचरण की झलक दिखती है। खैर चुनावी सभा तो फिर भी समझ मे आती है …. चलिए मान लेता हूं कि चुनावी सभाओं में आपको अपने दल की विचारधारा और कार्यक्रमों को भी रखना होता है इस कारण थोड़ी-बहुत गलतियां हो जाती हैं, लेकिन जब देश के संसद में खड़े होकर झूठ बोलते हैं , गलत तथ्य रखते हैं तो पूरे देश को शर्मसार होना पड़ता है।

मान्यवर,

जब अपने घर मे बैठकर टीवी के सामने आपको संसद में भाषण करते सुनता हूं तो मुझे अक्सर ये महसूस होता है कि आपकी झूठ बोलने की सनक और मुद्दों पर चर्चा की बजाय विपक्ष पर हमलावर होने के रवैये के कारण अक्सर आपकी शारीरिक भाव-भंगिमा प्रधानमंत्री के पद के अनुरूप नहीं रह जाती है। इतने बड़े बहुमत वाले प्रधानमंत्री को बिखरे और कमजोर विपक्ष पर हमलावर होने के लिए इस कदर आपा खोना और  आंखें तरेरने वाली भाव-भंगिमा आपके जैसे एक मजबूत प्रधानमंत्री को कतई शोभा नही देता। आख़िर क्या कारण है कि आपने आज तक अपने आप को देश के प्रधानमंत्री के रूप में क्यों नहीं पेश कर पाए ?

                                          आपका शुभचिंतक

                                                दया नन्द

                                  एक आम भारतीय नागरिक

(दयानंद स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल बिहार में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 8, 2020 12:34 am

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