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साहित्य अकादमी पुरस्कार: अनामिका, कस्बाई यथार्थ की एक कवयित्री

दरवाजा

मैं एक दरवाजा थी

मुझे जितना पीटा गया

मैं उतना खुलती गई

अंदर आए आने वाले तो देखा_

चल रहा है एक वृहद चक्र_

चक्की रूकती है तो चरखा चलता है,

चरखा रुकता है तो चलती है कैंची सुई

गरज यह है कि चलता ही रहता है

अनवरत कुछ न कुछ!

…..और अंत में सब पर चल जाती है झाड़ू_ तारे बुहारती हुई

बुहारती हुई पहाड़ वृक्ष पत्थर_

सृष्टि के सब टूटे बिखरे कतरे जो

एक टोकरी में जमा करती जाती है

मन की दुछत्ती पर!

(अनामिका )

हिंदी साहित्य के इतिहास में अनामिका साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली कवयित्री बन गई हैं। उन्हें यह सम्मान “टोकरी में दिगंत” कविता संग्रह के लिए मिला है। इस बार के निर्णायकों में रामबचन राय, चित्रा मुद्गल और केएल वर्मा थे। यूं तो पिछले तीन दशकों से अनामिका जिस तरह साहित्य की दुनिया में सक्रिय थीं और उनका जिस तरह ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा था, उससे यह उम्मीद लगने लगी थी, एक न एक दिन उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार जरूर मिल जाएगा। वैसे कायदे से गगन गिल को भी यह पुरस्कार मिलना चाहिए था क्योंकि वह समकालीन हिंदी कविता की पहली कवयित्री हैं जिन्होंने कविता की दुनिया में पुरुषों के बने बनाए किले को ध्वस्त किया था। विष्णु खरे ने तब उनकी बड़ी तारीफ की थी लेकिन पिछले तीन दशकों में हिंदी कविता में स्त्रियां बड़ी तादाद में सामने आई हैं और उन्होंने हिंदी कविता के परिदृश्य को बदल दिया है। अनामिका उसकी एक प्रतिनिधि कवयित्री बन गईं। वैसे अनामिका कात्यायनी और सविता सिंह ने हिंदी कविता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

अनामिका जब बिहार से दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की छात्रा के रूप में एमए में दाखिला ले कर आई थीं तब से ही उनकी कविताएं पढ़ने को मिलती रहीं। वैसे वह पहले भी कविताएं लिखती रही थीं और जब बिहार विश्वविद्यालय में छात्रा थीं तभी उनकी काव्य प्रतिभा से लोग रूबरू हुए थे। लेकिन उनकी कीर्ति दिल्ली आने पर फहराने लगी। उन्होंने कविता कहानी उपन्यास स्त्री विमर्श अनुवाद संपादन सभी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उन्हें  साहित्य विरासत में मिला। उनके पिता श्याम नंदन किशोर जो खुद भी अपने समय के चर्चित कवि और लेखक थे, बिहार विश्वविद्यालय के बाद में कुलपति बने। इस तरह से देखा जाए तो अनामिका को कविता कब संस्कार बचपन से ही मिला था लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर अपना मुकाम हासिल किया। वह कस्बे की कवयित्री हैं।

उनकी कविताओं में एक सोंधी सोंधी महक एक माटी की गंध है। लेकिन उस कस्बाई यथार्थ में एक स्त्री का संघर्ष उसकी आकांक्षा और उसका स्वप्न भी दिखाई देता है। उनकी कविताएं जिनमें उपरोक्त कविता भी शामिल है, इस बात का दस्तावेज हैं कि स्त्री ताउम्र एक रोटी बेलती  है। उनकी ऊपर लिखी गई कविता की पंक्तियों को आप देखेंगे तो उसकी पहली पंक्ति में ही आपको एक भारतीय निम्न मध्यवर्गीय स्त्री का दर्द दिखाई पड़ेगा। मैं एक दरवाजा हूं और जितना मुझे पीटा गया मैं खुद ही खुलती गई। इस पंक्ति में ही स्त्री के व्यक्तित्व की बनावट को आप जान सकते हैं। पीटे जाने का अर्थ यह है कि स्त्री को जितनी यंत्रणा दी जाती है उतना ही उसमें एक प्रतिरोध का स्वर भी विकसित होता है और इस तरह उसका व्यक्तित्व खुलता निखरता है। भारतीय समाज में स्त्री हमेशा से एक बंद दरवाजे की तरह रही है।

एक ऐसा दरवाजा जिस पर समाज के नियमों कायदे कानून और संस्कारों का ताला जुड़ा हुआ है। यह ताला पितृसत्ता का ताला है और जब दरवाजे को पीटा जाता है तो दरवाजा खुलता है। इस तरह अनामिका ने अपनी कई कविताओं में ऐसे रूपक बनाए हैं। चुटपुटिया बटन उनकी ऐसी कविता है। इस कविता में भी एक कस्बाई गंध है और यह बटन एक खास तरह की पोशाक संस्कृति को रेखांकित करती है जो निम्न मध्यवर्गीय स्त्रियों की आर्थिक हालात का बयान भी करती है। एक स्त्री को इस बटन की जरूरत पड़ती है और वह बटन कोई फैशनेबल बटन ना होकर चुटपुटिया बटन है जो एक गरीब स्त्री के कपड़ों पर भी देखी जा सकती है। आज शहर की स्त्रियां भले ही उस बटन का इस्तेमाल ना करती हों और बाद में उस बटन की जगह हुक ने ले लिया लेकिन अनामिका ने इस प्रतीक का इस्तेमाल कर उस पूरे कस्बाई दौर को जीवित कर दिया है जहां बाजार ने अभी कदम नहीं रखा था आज की तरह। जब कस्बों की स्त्रियां इस बटन का इस्तेमाल अपनी समीज और ब्लाउज में करती थीं लेकिन यह बटन उनकी कविता में केवल बटन नहीं रह जाती बल्कि वह एक बड़ा प्रतीक बन जाती है और उसे कविता में तारों से ही जोड़ दिया गया है।

अनामिका ने इस कस्बाई यथार्थ के चित्रण में कल्पना यथार्थ का मिश्रण भी पेश किया है और उनकी कविता यथार्थ की जमीन से निकलकर तारों और आसमान को भी छूने लगती है। उनकी एक कविता है फर्नीचर। इस कविता में भी देखिए एक ही स्त्री कैसे अपने घर में लगातार फर्नीचर को साफ करती है। यहां उसके श्रम को देखा जा सकता है लेकिन उसके इस घर में शायद उसे प्रेम नहीं मिल पा रहा है तो वह इस फर्नीचर से उसका एक आत्मीय संबंध  तविकसित होता है और फर्नीचर को भी एक प्रेमी की तरह देखने लगती है। अनामिका की कविता में जीवन की बहुत ही सामान्य घटनाओं और वस्तुओं का हवाला है। उन्होंने रोजमर्रा की जिंदगी में से कविता खोजने की कोशिश की है । उनकी कविता में कोई बौद्धिक विलास नहीं है लेकिन उनकी कविता में एक विचार मौजूद जरूर है। उस विचार का शोर और आतंक दिखाई नहीं पड़ता है। वह बहुत ही सहज और सामान्य है। कई लोग उनकी कविताओं के शिल्प और भाषा के अनगढ़ होने आरोप लगाते रहे है पर यह खुरदुरापन ही उनकी कविता की पहचान है।

वह अंग्रेजी की विदुषी हैं पर उनके लेखन में अंग्रेजी का आतंक नहीं है। गत वर्ष उनका एक उपन्यास आईनसाज आया था जो अमीर खुसरो पर केंद्रित था। अनामिका धर्मनिरपेक्ष संस्कृति में यकीन रखने वाली मानवीय संवेदना और गरिमा की लेखिका रही हैं।

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फर्नीचर

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मैं उनको रोज झाड़ती हूं

पर वे ही हैं इस पूरे घर में

जो मुझको कभी नहीं झाड़ते!

रात को जब सो जाते हैं_

अपने इन बरफाते पांव पर

आयोडीन मलती हुई सोचती हूं मैं_

किसी जन्म में मेरे प्रेमी रहे होंगे फर्नीचर कठुआ गए होंगे किसी शाप से ये!

मैं झाड़ने के बहाने जो छोतीहूं इनको,

आंसुओं से या पसीने से लथपथ_

इनकी गोदी में छुपाती हुई सर_

एक दिन फिर से जी उठेंगे ये

अनामिका की कविता फर्नीचर आज अचानक याद आ गई।

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“पढ़ा गया हमको

जैसे पढ़ा जाता है कागज

बच्चों की फटी कापियों का

चना जोर गरम के लिफाफे बनाने से पहले!”

चिटपुटिया बटन

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“मेरा भाई मुझको कहता था _जानती है पूनम

तारे हैं चिटपुटिया बटन “

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स्नान

धीरे धीरे

मेरे कंधे से

उतर रहा है मेरा घर

धीरे-धीरे मेरी उतर रही है चमड़ी!

मेरे ये कपड़े

मेरे ही सामने

घुटनों के बल बैठे _

कह रहे हैं कि अब बहुत हुआ_

आओ, सब भूलकर नहाओ,

धूल जाएगी सारी मिट्टी

फिर जो बचेगा_

उसको_

न घर की जरूरत होगी

न ही चमड़ी की!

(विमल कुमार पत्रकार और कवि हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 12, 2021 7:35 pm

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