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अर्णब गोस्वामी मामला: ‘ए समरी’ क्लोजर नहीं बल्कि पर्याप्त सबूत न होने की है रिपोर्ट

2018 के आत्महत्या के मामले में गिरफ्तार किए गए अर्णब गोस्वामी के मामले में पूर्व विवेचनाधिकारी ने क्लोजर रिपोर्ट नहीं लगाई थी, बल्कि रायगढ़ पुलिस ने इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक की आत्महत्या के मामले में 2019 में ‘ए समरी’ रिपोर्ट दाखिल की थी। बॉम्बे पुलिस मैनुअल के अनुसार ‘ए समरी’ रिपोर्ट, ऐसे मामले में दायर की जाती है, जहां अपराध किया जाता है, लेकिन सबूत का पता नहीं लग पाया है या आरोपी नहीं मिले हैं। इसे क्लोजर रिपोर्ट नहीं कहा जाता। यदि यह ‘ए समरी’ है, तो इसका मतलब है कि सबूत पर्याप्त नहीं थे, लेकिन अपराध हुआ था। कुछ समय बाद, पुलिस को सबूत मिलते हैं तो क्या पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश का इंतजार नहीं करती।

पूरे देश में व्हाइट कालर लोगों के बीच बहस हो रही है कि जब क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद मजिस्ट्रेट ने उसे स्वीकार कर लिया था तो बिना अदालती आदेश के अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार किया जाना ठाकरे सरकार का द्वेषपूर्ण कार्य है और अर्णब गोस्वामी की पूर्वाग्रह से ग्रस्त प्रताड़ना है, जबकि पूरा मामला बॉम्बे पुलिस मैनुअल के प्रावधानों पर आधारित है।

अर्णब गोस्वामी की जमानत याचिका पर बॉम्बे हाई कोर्ट में शनिवार को हुई सुनवाई के दौरान, जस्टिस एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट अमित देसाई से ‘ए समरी’, ‘बी समरी’ और ‘सी समरी’ के बीच अंतर पूछा। अमित देसाई ने पुलिस द्वारा दर्ज की गई ‘ए समरी’, ‘बी समरी’ और ‘सी समरी’ रिपोर्ट की अवधारणाओं को समझाया। दरअसल रायगढ़ पुलिस ने इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक की आत्महत्या के मामले में 2019 में ‘ए समरी’ रिपोर्ट दाखिल की थी। बाद में, इस मामले को दोबारा खोल दिया गया, जिसके कारण रिपब्लिक टीवी के प्रमुख अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी हुई, जिसका नाम नाइक के सुसाइड नोट में बताया गया है।

गोस्वामी के वकीलों ने दलील दी थी कि मजिस्ट्रेट द्वारा ‘ए समरी’ रिपोर्ट की स्वीकृति के बाद पुलिस को दोबारा जांच के लिए न्यायिक आदेश की आवश्यकता होती है। इसके जवाब में देसाई ने बॉम्बे पुलिस मैनुअल का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘ए समरी’ रिपोर्ट, ऐसे मामले में दायर की जाती है, जहां अपराध किया जाता है, लेकिन सबूत का पता नहीं लग पाया है या आरोपी नहीं मिले हैं। दूसरी ओर, ‘बी’ समरी’ रिपोर्ट, ऐसे मामले में दायर की जाती है, जहां आरोप झूठे पाए जाते हैं या जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिलता है। ‘सी समरी’ रिपोर्ट उन मामलों में दर्ज की जाती है, जहां एफआईआर तथ्य की गलती के आधार पर की गई, पाई जाती है।

उन्होंने कहा कि यदि यह ‘ए समरी’ है, तो इसका मतलब है कि सबूत पर्याप्त नहीं थे, लेकिन अपराध हुआ था। यदि यह गलत अभियुक्त का मामला था, तो यह ‘बी समरी’ होता। उन्होंने बताया कि ‘ए समरी’ का मतलब है कि सबूतों की कमी के कारण जांच पूरी होनी बाकी है। दूसरी ओर, ‘बी समरी’ और ‘सी समरी’ रिपोर्टों का मतलब है कि जांच पूरी हो गई है और या तो अपराध नहीं किया गया है या आरोप गलत अपराध‌ियों के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि जब मजिस्ट्रेट ‘ए समरी’ को स्वीकार करता है, तो इसका मतलब है कि अपराध हुआ है। यह ड‌िस्चार्ज या क्लोज़र का मामला नहीं है। इसका मतलब है कि यह अपराध का वास्तविक मामला था, लेकिन जांच में सबूत इकट्ठा नहीं हो पाए। देसाई ने कहा कि ‘ए समरी’ अपूर्ण जांच को दर्शाता है। ‘बी’ और ‘सी समरी’ में, जांच पूरी हो गई है और या तो कोई अपराध नहीं हुआ या आरोपी गलत है। अंतर महत्वपूर्ण है। इन दलीलों के आधार पर, उन्होंने याचिकाकर्ताओं के तर्क को खारिज कर दिया कि मजिस्ट्रेट ने मामले को बंद कर दिया था। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को स्वीकार करने के लिए कि एक मामले में, जहां ‘ए समरी’ दायर की जा चुकी है, जांच को पुनर्जीवित करने के लिए न्यायिक आदेश आवश्यक हैं, का मतलब जांच एजेंसी की शक्तियों पर रोक लगाना होगा।

देसाई ने आतंकवाद के एक मामले के उदाहरण के जरिए इस बिंदु को समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि आतंकवाद का एक मामला लें, जहां सबूत नहीं मिल पा रहे हैं। कुछ समय के बाद, पुलिस मजिस्ट्रेट के सामने ‘ए’ सारांश दाखिल करती है। कुछ समय बाद, पुलिस को आतंकवादी के सबूत मिलते हैं। क्या पुलिस को उसे गिरफ्तार करने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश का इंतजार करना चाहिए? उन्होंने कहा कि धारा 173 (8) के तहत आगे की जांच करने के लिए जांच अधिकारी की शक्ति और उसी के लिए न्यायालय के आदेश की शक्ति अलग-अलग है।

देसाई ने कहा कि निर्मल सिंह कहलों बनाम पंजाब राज्य में भरोसा रखा गया, जहां उच्चतम न्यायालय  ने कहा था कि यह कहना एक बात है कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय के पास पर्यवेक्षण क्षेत्राधिकार होगा, लेकिन यह दूसरी बात है कि जांच अधिकारी के पास मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जांच करने का अधिकार क्षेत्र नहीं होगा।

देसाई ने महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 4 का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार पुलिस बल का संचालन राज्य सरकार में निहित और व्यवहार्य है, इसलिए तो राज्य सरकार के पास जांच का निर्देश देने की शक्ति है। उन्होंने खंडपीठ को बताया कि‌ फिर भी मजिस्ट्रेट, जिसने क्लोज़र का आदेश पारित किया था, को एफआईआर को दोबारा खोले जाने की सूचना दी गई थी, ताकि वह मामले की निगरानी कर सके। (सकीरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के संदर्भ में) उन्होंने कहा कि मामले में मजिस्ट्रेट ने धारा 164 के तहत बयान भी दर्ज किए थे और उन बयानों की रिकॉर्डिंग की अनुमति देने का मतलब है कि मजिस्ट्रेट जांच के खोले जाने के बारे में जानते हैं और उसे मंजूरी दी है।

पीड़िता का निष्पक्ष और पूर्ण जांच का अधिकार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज राज्य सबूत जुटाने की प्रक्रिया में है। अनुच्छेद 14 पीड़िता पर भी लागू होता है। पीड़िता को भी निष्पक्ष और पूर्ण जांच का मौलिक अधिकार है। यह राज्य का कर्तव्य है कि वह पीड़िता और आरोपी के अधिकारों को संतुलित करे। उन्होंने कहा कि जब जांच चल रही हो तो उसे रोका नहीं जा सकता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि एक सुसाइड नोट है, जिस पर लोगों के नाम हैं और इस प्रकार यह एक ऐसा मामला है जिसकी जांच की जानी चाहिए। नारायण मल्हारी थोराट बनाम विनायक देवरा भगत पर भरोसा जताया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने आत्महत्या के एक मामले को रद्द करने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट की आलोचना की थी, जहां सुसाइड नोट में आरोपी का नाम था। पीठ अंतरिम जमानत पर आज सोमवार को दोपहर तीन बजे फैसला सुनाएगी।

इस बीच गोस्वामी को अलीबाग से तलोजा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। पुलिस ने कहा कि उसे ‌हिरासत में किसी और के फोन पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते पाए जाने के बाद स्थानांतरित किया गया। गोस्वामी को एक स्थानीय स्कूल में रखा गया था, जिसे अलीबाग जेल के लिए कोविड-19 सेंटर बनाया गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 9, 2020 9:09 am

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