Tuesday, March 5, 2024

होली के त्योहार में किसानों की चेतना के भौतिक शक्ति में बदलने की रंगीली दास्तान

शनिवार की शाम को दिल्ली से अपने पैतृक निवास जाने वालों के वाहनों की भीड़ ने नोएडा एक्सप्रेसवे पर 2-3 घंटों का जाम लगा डाला था। कमोबेश यही स्थिति देश के सभी महानगरों की होली, दीवाली के अवसरों पर देखने को मिलती है। 

कश्मीर या पूर्वोत्तर भारत की सीमाओं पर डटे सैनिकों की ओर से भी सबसे अधिक छुट्टी के आवेदन इन्हीं मौकों पर आते हैं, और अक्सर काफी दबाव में उनकी छुट्टियों को मंजूरी देनी पड़ती है। यदि इसमें आनाकानी या मनाही हो गई, तो वह अफसर सैनिकों की नजरों में हमेशा के लिए गिर सकता है, और ऐसा कोई अधिकारी नहीं चाहता। 

लेकिन इस बार होली के अवसर पर जब सारा देश अपने परिवारों के साथ रंगों के साथ सरोबार है, घर में पकवान, भंग और खाने-पीने की मस्ती जारी है, 120 दिनों से दिल्ली की सीमा पर डटे हुए किसानों की होली अपने परिवार और बच्चों के बीच नहीं मनाई जा रही है। 

टीवी पर गाजीपुर सहित देश के विभिन्न कोनों में उनके द्वारा इस बार तीन कृषि कानूनों को जलाकर होली मनाई गई, और सुबह से ही वे अपने साथ संघर्षों में साझीदार बने किसान साथियों के साथ होली की मस्ती मना रहे हैं, जो अपने आप में अनोखा दृश्य है। 

इसमें भले ही उनकी अपने निकट सम्बन्धियों के साथ इस बेहद बड़े त्यौहार को मनाने का मलाल नजर आये, लेकिन साथ ही साथ यह उनके अंदर एक ऐसे कृत संकल्प को भी निर्मित करता जा रहा है, जो सत्ता की लोहे की जंजीरों को चुटकियों में पिघला देने की क्षमता रखता है। 

सरकार के माथे पर अन्नदाता को कलंकित करने, आपराधिक साजिश रचने, गिरफ्तार करने, तमाम सरकारी एजेंसियों के जरिये धमकाने के साथ-साथ अब उनकी खुशियों को खराब करने का भी इल्जाम शामिल हो गया है। 

पंजाब सहित हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भाजपा और संघ विरोधी लहर लगातार घनीभूत होती जा रही है। पंजाब में भाजपा विधायक के कपड़े तार-तार करना इसका चरम उदाहरण है। भले ही हरियाणा में भाजपा-जजपा सरकार ने विधानसभा में सरकार बचा ली हो, लेकिन उन सभी को मालूम है कि यह सरकार जनता की निगाह में पूरी तरह से गिर चुकी है। अब तो इन राज्यों में डर इस बात का रहेगा कि अगला चुनाव कैसे और किस बूते लड़ा जाए?

लेकिन वहीं दूसरी तरफ पिछले 6 वर्षों से छात्रों, युवाओं और बुद्धिजीवियों की ओर से जारी आन्दोलन को जैसे लकवा मार गया है। 

इसकी एक बड़ी वजह कोरोना वायरस महामारी है, जिसने शिक्षण संस्थाओं को बंद कर रखा है। इस बीच पिछले कुछ महीनों से शहरों में लोगों का घरों से बाहर निकलकर मिलना-जुलना शुरू ही हुआ था कि कोरोना की दूसरी लहर ने एक बार फिर से इसमें ब्रेक लगा डाला है। 

पिछले दिनों बैंक, साधारण बीमा एवं जीवन बीमा कर्मियों की देशव्यापी हड़ताल देखने को मिली थी, जो लगातार 4 दिनों तक जारी रही। भारत सरकार ने 2021-22 बजट में दो राष्ट्रीयकृत बैंकों, एक साधारण बीमा को निजी क्षेत्र में बेचने और जीवन बीमा (एलआईसी) के विनिवेश की पेशकश की थी। 1 अप्रैल, 2021 से इसे अंजाम देना है। यह हड़ताल अपने आप में अभूतपूर्व रही, और आगे भी इसमें उत्तरोत्तर तेजी देखने को मिलने की संभावना है।

लेकिन किसानों के आंदोलन के समकक्ष यदि देखें तो छात्रों, बेरोजगारों, बैंक कर्मियों एवं सार्वजनिक क्षेत्र की यूनियनों के आन्दोलन कहीं नहीं टिकते। ये सभी लोग बौद्धिक तौर पर किसानों की तुलना में कई गुना उन्नत हैं। इनके संगठन ऐतिहासिक रूप में उनसे ज्यादा संगठित हैं, लेकिन इन सबके बावजूद वे कोई प्रभावी असर या सरकार को पुनर्विचार के बाध्य कर पाने में विफल हैं।

सरकार के पास संसद में संख्या बल है, और संख्या बल पर वह स्थापित नैतिकता के मूल्यों को लात मारते हुए एक के बाद एक कानून पारित करती जा रही है। विपक्ष का विरोध होता है और उसे एक दिन बाद ही भुला दिया जाता है। सरकार के प्रचार, मीडिया पर मजबूत पकड़ और आलोचना और जनता के उनके खिलाफ हो जाने की जरा भी परवाह न होने का भौकाल दिखाकर विपक्षी दलों सहित बौद्धिक वर्ग की बुद्धि घास चरने चली जाती है, और कुछ दिन बाद वही चीजें स्वीकार्य हो जाती हैं, जिसे सरकार ने अपनी अहमन्यता में जारी किया और वे नए नॉर्म बनते चले जाते हैं। 

बाकी आंदोलनों और किसान आंदोलन का फर्क 

किसानों के अंदर वर्गीय, जातीय, धार्मिक भेद और जकड़न जितनी अधिक पाई जाती है, उतनी किसी भी शहरी इलाके या समुदायों में शायद ही हो। लेकिन इस सबके बावजूद मध्यम और धनी किसानों से शुरू हुए इस आंदोलन ने अपने आगोश में न सिर्फ छोटे और मझोले किसानों सहित भूमिहीन खेतिहर किसानों को अपने भीतर समाहित कर लिया है, बल्कि दिनों दिन यह उत्तर भारत की सीमाओं से पार भाषा और दूरी की सीमाओं को लांघता जा रहा है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक सहित उड़ीसा तक में इस आंदोलन की धमक गूंजती जा रही है।

किसानों ने बंगाल में जाकर भाजपा के विरोध में चुनाव प्रचार किया है। देखने में भले ही यह लगे कि किसानों के इस अभियान ने कुछ खास असर नहीं डाला होगा, लेकिन जब चुनाव परिणाम आयेंगे तो इसमें एक अहम् योगदान किसानों के प्रचार का होने जा रहा है। 

फासीवादी कॉरपोरेटीकरण के खिलाफ मुकम्मल लड़ाई लड़ते किसान 

इस बात में अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि मुकम्मल तौर पर यदि भारतीय राज्य और भाजपा संघ की वैचारिक हमले कर सकता है तो इसे किसान समुदाय ने ही जबरदस्त चुनौती दी है। किसानों ने न सिर्फ हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनने से इंकार कर दिया है, बल्कि इसने सरकार की तमाम चालबाजियों को एक एक कर ख़ारिज कर डाला है। जिन आतंकी, खालिस्तानी, माओवादी, देशद्रोही, हिंदुत्व के विरोधी आरोपों के सामने कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियाँ समय-समय पर सिकुड़ती चली गईं, उसका संयम और सूझ-बूझ के साथ अपनी मांगों पर मजबूती से टिके रहकर किसान नेताओं ने लगभग चकनाचूर कर दिया है।

आज स्थिति यह है कि किसान यदि हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा नेताओं, मंत्रियों के खिलाफ नारेबाजी लगाते हैं, मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर को उतरने नहीं देते, मंत्रियों को होली मिलन के बहाने लोगों से मेल-जोल नहीं बढ़ाने देते, यहां तक कि कपड़े फाड़ देते हैं, तो इसके बावजूद भाजपा संघ उनसे दो-दो हाथ करने या देश द्रोही साबित करने, यूएपीए जैसे खतरनाक कानूनों में फंसाने के बजाय अधिक से अधिक उपेक्षा करते हैं। मानो कुछ हुआ ही नहीं। 

उन्हें अच्छी तरह से मालूम है, यदि किसानों को टेढ़ी अंगुली दिखाई तो वे अंगुली ही चबा सकते हैं। 

किसानों की ताकत वह चेतना है जो आज एक भौतिक शक्ति में तब्दील हो चुकी है। 300 से अधिक मौतों ने उनके इरादों को फौलादी बना डाला है। उन्हें भी इस बात का अहसास होता जा रहा है कि आजादी के बाद जिस सबसे बड़े नैतिक आंदोलन को वे चला रहे हैं, वह न सिर्फ भारत में ऐतिहासिक है, बल्कि विश्व के सभी देशों की लोकतंत्र की चाहत रखने वाली आबादी उनकी ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है।

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि देश की बाकी आबादी में मौजूद समुदायों को उनके उदाहरणों से कुछ सीखकर इस आंदोलन को अपने तरीके से मजबूती प्रदान करना चाहिए, और उन हर छिद्रों को बंद कर देना चाहिए जहाँ से भारत की बिकवाली के लिए सरकार को सांस मिल रही है। यही उनकी ओर से 90% आबादी के साथ अपनी मुक्ति का जरिया बना सकती है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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