Sunday, May 22, 2022

फेक एनकाउंटर स्पेशल: ‘उसे तो पुलिस वालों ने मार दिया और हमें मुंह भी नहीं दिखाया’

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आजमगढ़। आजमगढ़ पूर्वांचल का एक ऐसा जिला जिसका नाम सुनते ही हर किसी के जहन में एकबारगी आतंक और जुर्म का ख्याल आता है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले गृहमंत्री अमित शाह ने आजमगढ़ को आतंकगढ़ की संज्ञा दी थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में इस जिले को उसी नजर से देखा जाने लगा। इन शब्दों का असर यह हुआ कि यहां फेक एनकाउंटर के नाम पर कई बेगुनाहों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद साल 2017 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की बहुमत के साथ जीत हुई। इस जीत के साथ ही योगी आदित्यनाथ राज्य के मुख्यमंत्री बने। सीएम योगी ने इस जीत के बाद ही राज्य में कानून व्यवस्था ठीक करने के नाम पर कथित अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाया जिसमें ढेर सारे बेगुनाह और मासूम लोग शिकार हुए।

इस नीति के तहत पुलिस द्वारा राज्य में कई एनकाउंटर किए गए जिसमें कई युवाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस लिस्ट में यूपी का आजमगढ़ जिला और अलीगढ़ सबसे ऊपर था। लगातार होते एनकाउंटर के बीच अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक खबर में बताया था कि जितने भी एनकाउंटर प्रदेश में कानून व्यवस्था ठीक करने के नाम पर किए गए थे उनमें से ज्यादातर फेक थे। इसी बीच विधानसभा चुनाव 2022 से पहले सीएम योगी ने आजमगढ़ में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि सपा की सरकार में आजमगढ़ आतंकगढ़ बन गया था।

सोनकर का घर

आजमगढ़ आने से पहले यह सारी बातें मेरे जहन में भी थीं। यह भी पता था कि निजामाबाद के संजरपुर को आतंक की नर्सरी कहा जाता है। चुनावी माहौल में मैंने भी इन फेक एनकांउटर वाले परिवारों से मिलने की कोशिश की। वैसे तो जिले में कई केस हैं। लेकिन मेरी मुलाकात सिर्फ एक से हुई वह था छन्नू सोनकर का परिवार। इस परिवार से मिलने जब मैं पहुंची तो उनकी घर की जो स्थिति दिखी उसको देखकर कोई भी उनकी गरीबी का अंदाजा लगा सकता है। घर के आसपास सूअरों का ढेर था। घर अभी बन रहा था।

सही से दीवार भी नहीं खड़ी हुई थी। उसमें बैठने की भी जगह नहीं थी। जैसे ही उनके घर पहुंची थी। सबसे पहले मुझे उसकी भाभी मिलीं। चूंकि छन्नू सोनकर के माता-पिता का देहांत बहुत पहले हो गया था तो छन्नू को उसकी भाभी ने ही पाल पोसकर बड़ा किया था। मुझे देखते ही कहती हैं उसे तो पुलिस वालों ने मार दिया और हमें मुंह भी नहीं दिखाया। इतनी देर में छन्नू का एक भतीजा मेरे पास आता है और उस दिन की सारी घटना का जिक्र करता है। छन्नू का भाई घर पर नहीं था तो ऐसे समय में उसके भतीजे ने ही सारी बात बताई।

उसने शुरुआत करते हुए कहा कि ठंडी का दिन था और बहुत ज्यादा कोहरा था। शाम को पुलिस का फोन आता है कि चाचा का एक्सीडेंट हो गया। ठंड बहुत थी इसलिए घर वालों ने सोचा की सुबह जाएंगे। लेकिन सुबह जब पापा सदर अस्पताल पहुंचे तो वहां उनकी बॉडी मिली। इस बात को कन्फर्म करने के लिए मैंने छन्नू सोनकर के भाई से फोन पर बात की। उन्होंने भी वही बात बताई। वह कहते हैं कि मैंने उसे बच्चे की तरह पाला था। कभी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन देखना पड़ेगा। एनकांउटर से पहले वाले दिन को याद करते हुए वह बताते हैं कि हमने अमरुद का बाग लिया हुआ था।

परिवार के साथ पूनम मसीह

मेरा भाई रात को उसकी देखभाल करता था। रात को लगभग 9 बजे मेरी बेटी अपने चाचा को फोन करती है। ताकि उससे पूछे कि खाना खा लिया कि नहीं। लेकिन उधर से कोई दूसरा शख्स फोन उठाता है और कहता है कि जिनका फोन है उन्होंने एक्सीडेंट कर दिया है। इस वक्त वह जहानागंज थाने में हैं। मैं थाने का एसएचओ बोल रहा हूं। आप लोग थाना आकर देख लीजिए।

इसके बाद छन्नू के भाई बताते हैं कि जनवरी का महीना था बहुत ज्यादा कोहरा था। इसलिए हमने सोचा कि सुबह जाकर मिल लेंगे। लेकिन सुबह का दृश्य तो कुछ और ही था। हमारे घर एक दरोगा और दो सिपाही आए। उन्होंने आते ही कहा कि आपका भाई सदर अस्पताल में है। जाकर मिल लीजिए।

छन्नू के भाई बताते हैं कि इस बात को सुनने के बाद मैं तुरंत ही सदर अस्पताल गया और अपने भाई को ढूंढने लगा। लेकिन वह नहीं मिला। अंत में वह ठंडा घर (मुर्दाघर) में मुझे मिला। जब इस बारे में हमने पुलिस से पूछा तो उन्होंने कुछ नहीं बताया। यहां तक कि हमें लाश भी नहीं दी। सिर्फ श्मशान घाट पर पंडित को बुलाकर अंतिम संस्कार कर दिया गया।

वह कहते हैं कि ये सारी बातें होने के बाद हमें बताया जाता है कि छन्नू किसी की चेन छीनकर भाग रहा था और मुठभेड़ में उसे गोली लग गई। छन्नू के भाई सवाल करते हुए कहते हैं कि जब वह अमरुद के बाग में रखवाली कर रहा था तो वह जहानागंज कैसे चला गया। वह यह भी बताते हैं कि मेरे भाई के पास यामाहा बाईक थी जबकि एफआईआर के अनुसार जिस वक्त वह चेन छीनकर भाग रहा था उसके पास इस्प्लेंडर बाइक थी। वह कहते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में हम कैसे मानें कि उसने छिनताई की थी। जबकि वह अमरुद के बाग में था जो हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं है और जहानागंज थाना हमारा यहां से काफी दूर है।

ऐसे फेक एनकांउटर के मामले में लगातार संघर्ष कर रहे रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव का कहना है कि पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश में साढ़े आठ हजार एनकांउटर हुए हैं जिनमें से 3300 लोगों के पैरों में गोलियां मारी गई हैं और 153 से अधिक लोगों की जान गई है। जिसमें 54 प्रतिशत मुस्लिम और बाकी दलित और ओबीसी हैं। इसमें गुंडा एक्ट और गैंगस्टर एक्ट के तहत उन्हें अपराधी बताया गया है।

अर्धनिर्मित सोनकर का घर

राजीव हाल के प्रसिद्ध कामरान एनकाउंटर का जिक्र करते हुए बताते हैं कि मुख्तार अंसारी मामले में उसका एनकांउटर किया गया था। लेकिन उसकी बॉडी में पड़े निशान से यह साफ पता चलता था कि एनकाउंटर से पहले उसे खूब मारा गया था। जिसमें उसके दांत तोड़े गए थे। आंख फोड़ी गई थी। लेकिन उसकी बॉडी घरवालों को सौंपी गई थी। वह बताते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी की बॉडी उसके घरवालों को मिल पाई थी।

इससे पहले जितने भी दलित और ओबीसी को मारा गया था उनकी लाश भी नहीं मिलती थी। पुलिस जबरन उसे जलवा देती थी। ऐसे ही एक वाकये का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि मुकेश राजभर के पिता तो यह भी नहीं देख पाए कि लाश उनके बेटे की ही है या किसी और की।

राजीव यादव सबसे बाएं

फेक एनकाउंटर के मामले में लगातार संघर्ष कर रहे राजीव यादव का कहना है कि पूर्वांचल के आजमगढ़ में मुकेश राजभर, जयहिंद यादव और रामजी पासी का केस सबसे महत्वपूर्ण है। वह बताते हैं कि आजमगढ़ में लगभग 13 से अधिक फेक एनकाउंटर के केस हैं। जिसमें से 13 केस सुप्रीम कोर्ट जा चुके हैं। इन एनकांउटरों में एक बात जो सामने आई वह यह है कि गौ तस्करी और गौ हत्या के मामले में मुस्लिम धर्म के कुरैशी समुदाय को टारगेट किया गया है।

वहीं दूसरी ओर आजमगढ़ में पासी समुदाय के लोगों का एनकांउटर हुआ है। जिसका कारण यह है कि अंग्रेजों को जमाने में इन्हें अपराधियों की दृष्टि से देखा जाता था। जिसका असर आज भी है। किसी भी घटना पर पुलिस इस समुदाय के लोगों को पूर्वाग्रह के अनुसार अपराधी मानती है और उन्हें ले जाती है। वह बताते हैं कि यह तो फेक एनकाउंटर के मामले हैं। इसके अलावा हिरासत में भी कई लोगों की मौत हुई है। इन सब मामलों को यूएन और राष्ट्रीय मानवाधिकार तक पहुंचाने के मामले में राजीव यादव को एसपी अजय साहनी के समय में अरविंद यादव नामक दारोगा ने उन्हें मारने की धमकी दी थी।

सोनकर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट

राजीव बताते हैं कि सभी मामलों में एक ही तरह के पैटर्न का इस्तेमाल किया गया। जिसमें से ज्यादातर लोगों के नाम अज्ञात दोष लगाए गए हैं। इतना ही नहीं कई लोगों को ईनामी अपराधी बताया गया है।

फेक एनकाउंटर के मामलों में मारे गए लोगों के परिवारों की मदद करने वाले वकील विनोद यादव से भी मैंने बात की। वह अभी तक कई परिवारों से मिल चुके हैं और कानूनी रूप से उनकी मदद कर रहे हैं। विनोद ने मुझे एमए कर रहे एक लड़के की फेक एकांउटर की बात बताई। उन्होंने मेहगढ़ थाने के अंतर्गत आने वाले जयहिंद यादव की कहानी बतायी। उन्होंने बताया कि जयहिंद शारीरिक तौर पर बेहद हृष्ट-पुष्ट था और पिताजी के धंधे में हाथ बंटाता था। उसे पुलिस ने 22 गोलियां मारी थीं।

इस घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए वह कहते हैं कि जयहिंद की बहन की शादी तय हुई थी। इसी दौरान एक शाम पुलिस आती है। जयहिंद अपने पिता के साथ सड़क पर खड़ा था उसी दौरान पुलिस उसे उठाकर ले जाती है जो कि सिविल ड्रेस में थी। जब पक़ड़ने का कारण पूछा गया तो पता चला कि जयहिंद ने पास के ही बाजार में एक ज्वेलरी शॉप से चोरी की थी। जबकि बाद में पता चलता है कि वह उस घटना में शामिल ही नहीं था।

उठाने के बाद पुलिस उसका एनकाउंटर कर देती है। वह बताते हैं कि एनकाउंटर से पहले पुलिस उसे बहुत मारती है। यहां तक कि उसके जननांग पर बंदूक के बट से मारा जाता है। इस चोट के बाद वह गिर जाता है लेकिन पुलिस लगातार मारती रहती है। वह इस मार को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। और बाद में उसका एनकाउंटर कर दिया जाता है। स्थिति ऐसी होती है कि उसके घर वालों को उसका चेहरा तक नहीं दिखाया जाता है। विनोद बताते हैं कि जब हमने पुलिस से लगातार इस एनकाउंटर के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हमने उसे घेरकर मारा, जिसमें उसे 22 गोलियां लगीं।

विनोद बताते हैं कि इस घटना के बाद जयहिंद यादव के पिता पूरी तरह से टूट गए। वह लगातार यह कहते रहे कि मेरे बेटे को साजिश के तहत मरवाया गया है। वह ऐसा नहीं था। चूंकि उसका धंधा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लेकिन माफिया नहीं चाहते थे कि उनका परिवार आगे बढ़े। इसलिए उसका एनकाउंटर करवा दिया गया। जयहिंद एनकाउंटर के एक साल बाद उसके पिता की भी मृत्यु हो गई।

योगी सरकार पर मुठभेड़ों का ही आरोप नहीं है बल्कि प्रशासनिक अक्षमता के साथ हिरासत में मौत (कस्टोडियल डेथ) के मामलों में भी उत्तर प्रदेश नंबर वन पर है। 27 जुलाई, 21 को लोकसभा में पूछा गया कि देश में कितने लोगों की मौत पुलिस और न्‍याय‍िक हिरासत में हुई है। इसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के आंकड़े पेश किए। जिसके मुताबिक उत्तर प्रदेश में पिछले तीन साल में 1,318 लोगों की पुलिस और न्‍याय‍िक हिरासत में मौत हुई है।

एनएचआरसी के आंकड़े बताते हैं कि यूपी में 2018-19 में पुलिस हिरासत में 12 और न्‍याय‍िक हिरासत में 452 लोगों की मौत हुई। इसी तरह 2019-20 में पुलिस हिरासत में 3 और न्‍याय‍िक हिरासत में 400 लोगों की मौत हुई। वहीं, 2020-21 में पुलिस हिरासत में 8 और न्‍याय‍िक हिरासत में 443 लोगों की मौत हुई है।

प‍िछले तीन साल में हुई इन मौतों को जोड़ दें तो उत्तर प्रदेश में कुल 1,318 लोगों की पुलिस और न्‍याय‍िक हिरासत में मौत हुई है। उत्तर प्रदेश का यह आंकड़ा देश में हुई हिरासत में मौत के मामलों का करीब 23 फीसद है। देश में प‍िछले तीन साल में पुलिस और न्‍यायिक हिरासत में 5,569 लोगों की जान गई है।

प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगा हुआ जिला है उन्‍नाव। इसी साल 21 मई को उन्‍नाव के बांगरमऊ कस्‍बे में एक 18 साल के युवक की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। दरअसल यूपी पुलिस के दो स‍िपाही कोरोना कर्फ्यू का पालन कराने गए थे और फैज़ल को सब्‍जी का ठेला लगाने के जुर्म में थाने लेकर चले गए। पुलिस हिरासत में ही फैज़ल की तबियत खराब हुई और फिर मौत हो गई। मामले में पुलिस के दो सिपाहियों और एक होम गार्ड पर मुकदमा दर्ज हुआ है। फैज़ल की मौत का मामला अभी कोर्ट में चल रहा है।

दरअसल योगी की ठोक दो की सर्वजनिक घोषणाओं से यूपी पुलिस का रवैया लगातार निरंकुश होता चला गया। पुलिस हिरासत में हुई मौतों का मामला हो या फिर गोरखपुर में कानपुर के कारोबारी मनीष गुप्ता की पुलिसकर्मियों द्वारा हत्या का मामला,यह लगातार सुर्ख़ियों में बना है।

दरअसल अपराधियों के खिलाफ चलाए गए ‘मिशन क्लीन’ अभियान के नाम पर  सूबे की पुलिस बेलगाम हो गयी है।

मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार आई तो सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐलान किया था कि बदमाश पुलिस पर गोली चलाएगा तो अब पुलिस भी बदमाश की गोली का जवाब गोली से देगी। जिसका नतीजा ये हुआ उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक लखनऊ से लेकर ललितपुर तक, पुलिस ने एनकाउंटर किए।

मार्च 2017 के बाद पुलिस और बदमाशों के बीच कथित मुठभेड़ की घटनाएं बढ़ीं। मार्च 2017 से जुलाई 2021 तक पुलिस और बदमाशों के बीच 8472 मुठभेड़ें हुईं ,जिनमे 146 बदमाश मारे गए। लेकिन 3302 बदमाश पुलिस की गोली का शिकार होकर घायल हो गए। बदमाशों के साथ मुठभेड़ में 13 पुलिसकर्मी मारे गये, जबकि 1157 पुलिस वाले घायल हुए।

सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने यूपी सरकार को सबसे ज्यादा फेक एनकाउंटर और कस्टोडियल डेथ के लिए नोटिस जारी किया है। प्रदेश की जनता को कानून व्यवस्था के नाम पर सरकार और पुलिस ने लगातार भयादोहित किया। आजमगढ़, बागपत और अलीगढ़ में फेक एनकाउंटर के केंद्र बन गए। पीड़ितों के मां-बाप गुहार लगाते रहे लेकिन उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई।

कई जगहों पर तो इनकी कलई खुल गयी। गोरखपुर का मनीष हत्याकांड इसी का उदाहरण है। गोरखपुर में थाने के एसएचओ ने पूरी टीम के साथ एक होटल पर रेड डाली और कानपुर के मनीष गुप्ता को पीट-पीट कर मार डाला। पहले तो पुलिस ने आनाकानी की, लेकिन जब दाल नहीं गली तो पुलिसवालों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। फरार होने पर ईनाम भी घोषित किया और बाद में गिरफ्तारी भी हुई। अब सब जेल में हैं।

हाथरस के गैंगरेप का मामला तो इससे भी ज्यादा भयावह था। यूपी पुलिस के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर तो पीड़िता के साथ रेप होने से ही इंकार करते रहे, लेकिन जब सीबीआई ने जांच शुरू की तो पाया कि रेप हुआ था और चार्जशीट भी उन आरोपियों के खिलाफ ही फाइल हुई जिन्हें स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह के साथ आजमगढ़ से पूनम मसीह की रिपोर्ट।)

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