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किसानों के राष्ट्रव्यापी बंद में 1 करोड़ लोगों के प्रत्यक्ष भागीदारी का दावा, 28 सितंबर होगा विरोध का दूसरा पड़ाव

नई दिल्ली/रायपुर। अखिल भारतीय किसान महासभा ने देश के संघर्षरत किसानों, किसान संगठनों को तीन कृषि संबंधी बिलों के खिलाफ 25 सितम्बर के भारत बंद व प्रतिरोध दिवस की अभूतपूर्व सफलता पर क्रांतिकारी अभिवादन किया है। साथ ही इस आंदोलन को समर्थन देने वाले ट्रेड यूनियनों, छात्र, युवा, महिला, व्यापारी संगठनों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, गायकों, फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों और वाम पार्टियों सहित विपक्ष की पार्टियों का भी आभार व्यक्त किया है। संगठन के नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय मीडिया के बड़े हिस्से ने इतने व्यापक आंदोलन की अनदेखी की। फिर भी राष्ट्रीय मीडिया के उस छोटे हिस्से और सोशल मीडिया के उन तमाम साहसी मित्रों को भी धन्यवाद जो तमाम जोखिमों के बाद भी लोकतंत्र के चौथे खम्भे की ज्योति जलाए हैं।

नेताओं ने कहा कि देश के किसानों द्वारा कृषि प्रधान भारत की खेती, किसानी और खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय निगमों का गुलाम बनाने, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को कारपोरेट के मुनाफे के लिए उपभोक्ता माल में तब्दील करने के लिए लाए गए इन बिलों का इतना व्यापक विरोध स्वाभाविक है। देश की आबादी का 60 प्रतिशत किसान व ग्रामीण गरीब अपनी खेती का उत्पादन, भंडारण और बाजार को कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथ किसी भी कीमत पर नहीं जाने देंगे।

संगठन ने कहा कि यही वह बात है जिसने आज देश के सभी संघर्षरत किसान संगठनों को इन तीनों बिलों के खिलाफ संयुक्त आंदोलन में उतारा है। इस लिए मोदी सरकार द्वारा कोरोना संकट की आड़ में संसदीय नियमों की खुली अवहेलना कर जबरन पास कराए गए इन तीन बिलों का विरोध आगे भी जारी रहेगा।

25 सितम्बर के राष्ट्रव्यापी बंद व प्रतिरोध दिवस पर 6 सौ से ज्यादा जिलों के लगभग 70 हजार से ज्यादा स्थानों पर किसान और उनके समर्थन में समाज के अन्य हिस्से सड़कों पर उतरे। 25 से लेकर 5 हजार तक की गोलबंदी के इन कार्यक्रमों में एक करोड़ से ज्यादा लोगों की भागीदारी हुई। यह कोविड दौर में दुनिया भर में और आजादी के बाद भारत के जन आंदोलनों के इतिहास में सबसे बड़ी जन गोलबंदी है।

अब 28 सितम्बर को शहीद भगत सिंह के जन्म दिन पर देश की खाद्य सुरक्षा पर हमले के खिलाफ किसान देश भर में विरोध कार्यक्रम करेंगे एआईके- एससीसी ने इसका आह्वान पहले ही कर रखा है।

किसान विरोधी भाजपा और संसद में इन बिलों को समर्थन देने वाले उसके सहयोगियों का देश के किसानों ने गांव-गांव में सामाजिक बहिष्कार कार्यक्रम पंजाब से शुरू कर दिया है। पंजाब के गांवों और शहरों में भाजपा के बहिष्कार के बैनर टांगे जा रहे हैं। वहां ग्राम पंचायतों की खुली बैठकों में भाजपा व उसके सहयोगियों के बहिष्कार के प्रस्ताव पास कर गांव के बाहर इसके बैनर टांगे जा रहे हैं। कई व्यापार मंडलों या आढ़ती संगठनों ने भी ऐसे बैनर टांगे हैं। पंजाब में किसानों का 24 सितम्बर से शुरू रेल रोको आंदोलन अब भी चल रहा है। अगर केंद्र सरकार इन बिलों को वापस नहीं लेती है, तो देश के किसान संगठनों द्वारा इस अभियान को भी देश भर में फैलाया जाएगा।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी किसानों और आम जनता के प्रति आभार व्यक्त किया है। माकपा ने कहा है कि वह कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ किसानों के संघर्षों के साथ डटकर खड़ी है।

आज छत्तीसगढ़ में जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि देश और छत्तीसगढ़ की जनता ने इन कानूनों के खिलाफ जो तीखा प्रतिवाद दर्ज किया है, उससे स्पष्ट है कि आम जनता की नजरों में इन कानूनों की कोई वैधता नहीं है और इन्हें वापस लिया जाना चाहिए। सांसदों की मांग के बावजूद यदि कोई विधेयक मत विभाजन के लिए नहीं रखा जाता या विपक्ष की अनुपस्थिति में पारित करवाया जाता है, तो यह संसदीय कार्यप्रणाली के प्रति सरकार के हिकारत भरे रवैये को ही दिखाता है और किसी भी गैर-लोकतांत्रिक और संविधान विरोधी सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं है।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने कहा कि कोरोना महामारी से उपजे संकट की आड़ में सबसे छोटे सत्र में जिस प्रकार मजदूरों और किसानों के अधिकारों पर डाका डालने वाले कानूनों को पारित किया गया है, उससे यह साफ है कि यह सरकार कॉरपोरेटों के नौकर की तरह काम कर रही है।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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This post was last modified on September 26, 2020 10:02 pm

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