Friday, July 1, 2022

बहुजनों को अब हुकूमतों से मांगने से आगे बढ़कर इस देश के मालिक बनने की दावेदारी करनी होगी: डॉ. सिद्धार्थ

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बिहार के भागलपुर जिले के बिहपुर के रेलवे सामुदायिक भवन में 13 जून को ‘बढ़ते मनुवादी-सांप्रदायिक हमले व कॉरपोरेट कब्जा के खिलाफ बहुजन दावेदारी’ को लेकर एक सम्मेलन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता चर्चित बहुजन बुद्धिजीवी डॉ.विलक्षण रविदास ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में साफ कहा कि “इस मुल्क में आज भी भूख, फटेहाली, बेरोजगारी, भूमिहीनता, अशिक्षा, अपमान व चौतरफा अधिकारहीनता बहुजनों के हिस्से हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व की बात करने वाली ताकतें बहुजनों के जीवन की तस्वीर नहीं बदलना चाहती हैं। बल्कि बहुजनों की गुलामी व अपमानजनक स्थिति को बनाये रखना चाहती हैं।

वहीं दिल्ली से आए पत्रकार-लेखक और दलित चिंतक डॉ.सिद्धार्थ रामू ने कहा कि बहुजनों को अब हुकूमतों से मांगने से आगे बढ़कर इस देश के मालिक बनने की दावेदारी करनी होगी। बहुजनों को केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने तक नहीं रुकना है, सामाजिक-सांस्कृतिक व धार्मिक सत्ता और आर्थिक सत्ता पर भी कब्जा करना होगा। इसके लिए लोकतांत्रिक आधार पर बहुजनों की एकता गढ़नी होगी।

सम्मेलन सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) बिहार, फुले अंबेडकर युवा मंच और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित था।

इस मौके पर सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी ने कहा कि केन्द्र सरकार जातिवार जनगणना कराने की गारंटी करे। जातिवार जनगणना में ओबीसी के साथ सवर्णों को भी शामिल किया जाए, ताकि किसके पास क्या है, किसने किसका हिस्सा मार रखा है, यह सच सामने आ सके। लेकिन भाजपा सच को दबाकर सवर्ण वर्चस्व को छुपाये-बचाये रखना चाहती है। जातिवार जनगणना सामाजिक न्याय की नीतियों व योजनाओं को ठोस व सुसंगत बनाने के लिए जरूरी है।

उन्होंने कहा कि राज्यों द्वारा जातिवार जनगणना कराया जाना केन्द्र सरकार द्वारा जातिवार जनगणना कराने का विकल्प नहीं हो सकता है। बिहार में जातिवार जनगणना कराना अच्छी बात है, लेकिन नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव केन्द्र सरकार द्वारा जातिवार जनगणना कराने की मांग पर लड़ाई से पीछे नहीं भागें।

उन्होंने आगे कहा कि भाजपा के सांप्रदायिक मुहिम के खिलाफ बहुजन आंदोलन को नारा बुलंद करना होगा, “हिंदू हो या मुसलमान, दलित-पिछड़ा एक समान!”

इस अवसर पर डीयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.लक्ष्मण यादव ने कहा कि मुसलमानों को निशाने पर लेकर सांप्रदायिकता के खाद-पानी के जरिए हिंदू पहचान को उभारने के साथ ही मनुवादी वर्चस्व व कॉरपोरेट कब्जा मुहिम को आगे बढ़ाया जा रहा है। अंतिम तौर पर चौतरफा बेदखली और अधिकारहीनता, अपमान, गुलामी-दमन-उत्पीड़न-हिंसा बहुजनों के ही हिस्से आ रही है।

उन्होंने कहा आगे की नई शिक्षा नीति-2020 सामाजिक न्याय विरोधी है, शिक्षा के अधिकार से बहुजनों की बेदखली का फरमान है, इसके खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी। 

बहुजन चिंतक ई.हरिकेश्वर राम ने कहा कि संविधान, धर्मनिरपेक्षता व लोकतंत्र पर हो रहा हरेक हमला, कॉरपोरेटों के पक्ष में लिया गया हरेक सरकारी फैसला, अंतिम तौर पर बहुजनों के खिलाफ ही जाता है। इसलिए संविधान व लोकतंत्र बचाने और कॉरपोरेट लूट के खिलाफ बहुजनों को ही मोर्चा लेना होगा।

सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए द शूद्र व न्यूज़ वीक के फ़ाउंडिंग एडिटर सुमित चौहान ने कहा कि एससी-एसटी-ओबीसी के आरक्षण पर 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण की मार तो पड़ ही रही है, लैटरल एंट्री भी जारी है और पहले से आरक्षण को लागू करने में जारी गड़बड़ी व बेईमानी भी बढ़ गयी है। सत्ता, संपत्ति-संसाधनों, सम्मान, ज्ञान व अन्य क्षेत्रों में बहुजनों के पास जो कुछ है, जो भी हासिल उपलब्धियां हैं, अंतिम तौर पर छीन लेने की मुहिम चल रही है।

आर्टिकल19 इंडिया के संपादक नवीन कुमार ने कहा कि रोजगार के अवसर खत्म किये जा रहे हैं। रेलवे में लगभग 70 हजार नौकरियां खत्म किया जा चुका है, अब 80-90 हजार खत्म किया जा रहा है। सरकारी नौकरियां खत्म करने की मार सबसे ज्यादा बहुजनों पर ही पड़ती है, क्योंकि निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है।

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव ने कहा कि 8 साल में नरेन्द्र मोदी सरकार ने मनुवादी-पूंजीवादी शक्तियों की अधिकतम सेवा की है। संविधान व लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते हुए शासन का प्रतीक बुल्डोजर को बना चुकी है। इस बीच कोरोना महामारी की त्रासदी से गुजरते हुए भी अडानी-अंबानी की संपत्ति बढ़ रही है तो गरीबों रेखा से नीचे की तादाद बढ़ रही है, 8 साल में 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये हैं। 80 करोड़ लाभार्थी बनकर अपमानजनक जीवन गुजार रहे हैं और सरकार कुछ अनाज देकर अपना पीठ थपथपा रही है।

नवीन प्रजापति (अति पिछड़ा अधिकार मंच,बिहार) ने कहा कि रेलवे-बैंक सहित सरकारी संस्थानों-कंपनियों, शिक्षा-चिकित्सा-पानी सहित अन्य सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण की मार बहुजनों पर ही पड़ती है। निजीकरण बहुजन विरोधी है, बहुजनों की बेदखली की मुहिम है।

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रामानंद पासवान ने कहा कि बिहार में आज तक भूमि सुधार नहीं हुआ है। आज भी बहुजनों में काफी भूमि हीनता है। बिहार सरकार भूमिहीनों की झोपड़ियों पर शहर से गांव तक बुल्डोजर चलवा रही है।

सम्मेलन का संचालन करते हुए सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के गौतम कुमार प्रीतम ने कहा कि मोदी सरकार जन वितरण प्रणाली को खत्म कर देने की साजिश कर रही है, तो मनमाना पैमाना तय कर राशन कार्ड छीना जा रहा है। किसान तबाही-बर्बादी के रास्ते पर धकेले जा रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार लागत के डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की गारंटी के लिए तैयार नहीं है।

अन्य वक्ताओं में अखिलेश रमण, अनुपम आशीष, अरूण अंजाना, श्यामनंदन सिंह, राजेश पासवान, मनोज कुमार, निर्भय कुमार, प्रीति किरण, जेडी कौशल, सुलोचना देवी, सुनीता कुमारी, कौशल्या देवी ने भी अपने विचार रखे, वहीं सम्मेलन में गौरव पासवान, पाण्डव शर्मा, अभिषेक आनंद, मिथुन पासवान, मो.सोहराब आलम, दीपक पासवान, मो. परवेज आलम, बिट्टू ठाकुर, संतोष मालाकार, भोला अंबेडकर, गुरूशरण पासवान, श्रवण मंडल, संजीत यादव, शिव कुमार, दीपक कुमार, इनोद पासवान, जयकिशोर शर्मा, देवराज दीवान आदि शामिल थे। धन्यवाद ज्ञापन किया-बिहार फुले-अंबेडकर युवा मंच के नसीब रविदास ने किया।

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