Tuesday, October 19, 2021

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शाहजहांपुर की पीड़ित लॉ छात्रा ने दिया सुप्रीम कोर्ट में स्वामी की जमानत को चुनौती

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नई दिल्ली। शाहजहांपुर की लॉ छात्रा के साथ बलात्कार के मामले में नया अपडेट आ रहा है। बताया जा रहा है कि बीजेपी नेता रहे आरोपी स्वामी चिन्मयानंद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है। जिसमें जमानत को रद्द करने के साथ ही केस को लखनऊ से दिल्ली ट्रांसफर करने की मांग की गयी है। इसके साथ ही एक अलग से याचिका दायर होनी है जिसमें धारा 376 (C) को चुनौती देने की योजना है। 

आपको बता दें कि स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ इसी धारा को लगाया गया है। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है वह भी बेहद दिलचस्प है। आमतौर पर जमानत के समय जज कोई रूलिंग नहीं देता है। क्योंकि उससे केस की नियमित सुनवाई पर असर पड़ सकता है। लेकिन यहां कोर्ट ने स्वामी को जमानत देते समय जो बातें कही हैं वह न सिर्फ अंतरविरोधी हैं बल्कि कोर्ट के सामान्य परंपराओं और नियमों के भी खिलाफ जाती हैं। 

जस्टिस राहुल चतुर्वेदी ने अपने फैसले में इस बात को स्वीकार किया है कि स्वामी ने छात्रा के साथ संबंध बनाने में अपनी ताकत का इस्तेमाल किया है। लेकिन इसके साथ ही उसी समय यह टिप्पणी भी कर डाली है कि यह बलात्कार के दायरे में नहीं आता है। इस मामले पर अपनी राय देते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ वकील ने बताया कि एक ऊपरी अदालत अगर किसी मामले में इस तरह की रूलिंग देती है तो निचली अदालत में चलने वाले ट्रायल पर उसका असर पड़ना स्वाभाविक है।

जस्टिस चतुर्वेदी यहीं नहीं रुकते आगे वह कहते हैं कि “इस स्टेज पर यह तय कर पाना मुश्किल है कि किसने किसको इस्तेमाल किया”।…”इस मौके पर कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचती है कि यह पूरी तरह से लेन-देन का मामला है। एक लंबे समयांतराल में और ज्यादा हासिल करने की लालच में ऐसा लगता है कि वह और उसके दोस्त मिलकर आवेदनकर्ता (स्वामी) के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। और उस वीडियो के जरिये जिसको उसने खुद बनायी थी, उनसे फिरौती की मांग कर उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश करते हैं।“

इसके आगे कोर्ट कहती है कि क्योंकि चार्जशीट पहले ही दायर हो चुकी है और मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान ले चुके हैं इसलिए केस से छेड़छाड़ की कोई आशंका नहीं दिखती है।

इतना ही नहीं कोर्ट कहती है कि छात्रा को पहले ही जमानत दे दी गयी है (यहां फिरौती मामले में जमानत की बात की जा रही है)। “इसलिए मौजूदा आवेदक को जमानत न देने का कोई वैध कारण नहीं है।”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने केस को भी शाहजहांपुर से लखनऊ ट्रांसफर कर दिया। जबकि इसकी पीड़िता की तरफ से कोई मांग नहीं की गयी थी। और न ही सरकार ने ऐसा कोई आवेदन दिया था। अगर ऐसा स्थानीय स्तर पर केस को प्रभावित करने की आशंका के चलते किया गया तो जिस तरह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ स्वामी के करीबी रिश्ते होने के आरोप लगते रहे हैं उससे वहां इसके और ज्यादा प्रभावित होने के आसार हैं।

इस मामले में जिस तरह से एक नतीजे पर पहुंच कर हाईकोर्ट की बेंच टिप्पणी करती है वह न केवल केस पर असर डाल सकता है बल्कि यह पीड़िता के रुख के भी खिलाफ है। पीड़िता के एक नजदीकी सूत्र ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि उसे (पीड़िता) फिरौती संबंधी प्रकरण की कोई जानकारी नहीं थी। और उसको उसके साथ राजस्थान गए दोस्त संजय सिंह के दो संबंधियों जिसमें एक उसका सगा भाई था दूसरा मौसी का लड़का, ने अंजाम दिया था। उसने बताया कि चूंकि क्लिप संजय सिंह को मिल गयी थी लिहाजा उसका फायदा उसके रिश्तेदारों ने उठाने की कोशिश की।

यहां एक बात और बताना मौजू होगा कि इस जमानत के आदेश के एक हफ्ते के भीतर जस्टिस राहुल चतुर्वेदी का प्रमोशन कर उन्हें तदर्थ से स्थाई जज बना दिया गया। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने लिया।

इसके अलावा घटना के सामने आने के बाद पीड़िता के परिजनों को प्रताड़ित करने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह आज भी जारी है। पीड़िता के पक्ष के लोगों का आरोप है कि मामले में जांच के लिए गठित एसआईटी एकतरफा तरीके से कार्रवाई कर रही है। 7 सितंबर, 2019 से उसने जांच शुरू कर दी थी। उसका रवैया कितना पक्षपातपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक दिन पीड़िता से लगातार 11 घंटे पूछताछ की गयी। और जब भी मौका पड़ता था एसआईटी की टीम पीड़िता के घर उसके परिजनों से पूछताछ के बहाने धमक पड़ती थी।

एक लड़की जो खुद बलात्कार की पीड़ित है क्या कोई एजेंसी उसके साथ इस तरह से पेश आ सकती है? यह एक बड़ा सवाल बनकर रह जाता है। जबकि दूसरी तरफ स्वामी कभी अपने आश्रम से निकले ही नहीं। पूछताछ के नाम पर उनसे सिर्फ औपचारिकताएं निभायी जाती थीं। पीड़िता के उस नजदीकी शख्स ने बताया कि बाकायदा डीएम ने लॉ छात्रा के पिता को फोन पर धमकी दी।

बताया जा रहा है कि पीड़िता का परिवार बेहद डरा हुआ है। और उसको सबसे ज्यादा अपनी बेटी की जान का खतरा है। लिहाजा सबसे पहले सुरक्षित होने की कड़ी में वह केस को यूपी से दिल्ली ट्रांसफर करवाना चाहता है। हालांकि इस पूरे प्रकरण में अभी तक चीजें जिस तरह से आगे बढ़ी हैं और पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक की जो भूमिका रही है उसको लेकर पीड़िता बेहद निराश है। उसको लगता है कि इस मामले को सामने लाना ही नहीं चाहिए था क्योंकि न्याय की जगह उसके परिजनों को परेशानी मिल रही है। और अब उसकी उम्मीद का आखिरी केंद्र सुप्रीम कोर्ट है जहां से उसकी सुनवाई का सिलसिला शुरू हुआ था। एक बार फिर वह उसके दरवाजे पर है।

इसी कड़ी में एक और मामले का खुलासा हुआ है। जिसमें बताया जा रहा है कि कोमल गुप्ता नाम की एक और छात्रा ने बीजेपी के इस पूर्व नेता पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। और उसने मामले में बाकायदा 2011 में शाहजहांपुर में एफआईआर दर्ज करवाई थी। और यहां तक कि अदालत ने अपनी टिप्पणी में स्वामी के बलात्कार का आदी होने तक की बात कही थी। दिलचस्प बात यह है कि इतना संगीन आरोप होने के बाद भी स्वामी को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया। यह उनकी पहुंच और रुतबे का ही नतीजा था।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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