Friday, December 9, 2022

किसी भी दल के लिए मुश्किल है बस्तर के आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को नजरंदाज कर पाना

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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में दो चरणों मे होने वाले हैं जिसमें पहले चरण में आदिवासी बाहुल्य बस्तर संभाग के 12 विधानसभा चुनाव में 12 नवंबर को मतदान होगा । बस्तर के सात जिलों में 12 विधानसभा सीटें हैं । इस क्षेत्र में भाजपा अपना भाग्य बदलने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है क्योंकि 2013 में कांग्रेस ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया था। यहां कांग्रेस की झोली में 2013 में 8 सीटें आई थीं। लिहाजा 12 सीटों वाला देश में सबसे अधिक नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र विधानसभा चुनाव परिणाम में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

लेकिन सवाल अब भी आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार, संरक्षण को लागू कर पालन करने का दोनों बड़ी पार्टियों के नेताओं तथा पार्टी के एजेंडे से गायब है । आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को देखते हुए उन्हें महत्वपूर्ण कानून पेसा एक्ट 1996, पांचवी अनुसूची, और वन अधिकार अधिनियम 2006 कानून जैसे जल, जंगल, जमीन पर मालिकाना हक के अधिकार देते हैं।

“हमारे गांव में हमारा अधिकार, मावा नाटे मावा राज” के नारे को बुलंद करती गांव में ग्रामसभा लोगों को स्वशासन का अधिकार देती है । लेकिन बस्तर सरगुजा संभाग में किसी भी प्रावधान का अमल न ही कांग्रेस 2003 तक और न ही बीजेपी 2004 से 2018 तक किया बल्कि इतने महत्वपूर्ण अधिनियम पांचवीं अनुसूची का खुल्लमखुल्ला उलंघन सरकार व प्रशासन द्वारा किया जा रहा है जिससे आदिवासी समुदाय में इन दोनों पार्टियों के नीति व नेताओं से भारी आक्रोश है।

दोनों सम्भाग में आदिवासी समुदाय द्वारा इन प्रावधानों के अमल के लिए लगातार संघर्ष किया जा रहा है वहीं राज्य सरकारें एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव करने के लिए जिस तरह से आतुर हैं इससे साबित होता है कि सरकारें व पार्टियां आदिवासियों का विकास नहीं चाहतीं।

लेकिन क्या इस विधानसभा में आदिवासियों को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों को लेकर मुद्दा बनने वाला है? आप को बता दें बीजेपी, कांग्रेस, जोगी कांग्रेस, सीपीएम, आप पार्टियों ने बस्तर के 12 विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। बस्तर में घोषित प्रत्याशियों से आदिवासियों को मिले संवैधानिक अधिकारों को लेकर हमने राय जाननी चाही । जिसमें बीजेपी के पार्टी के अधिकतर प्रत्याशियों ने फोन नहीं उठाया। जिन्होंने उठाया उनका कहना था अधिकार का पालन हो रहा है। कांग्रेस के प्रत्याशियों का कहना है कि हमारी सरकार आए तो लागू करवाएंगे।

आम आदमी पार्टी अपने घोषणा पत्र को स्टाम्प पेपर में नोटरी करके इन वादों पर अमल करने की घोषणा की है। बसपा ने भी इन अधिकारों को लागू कराने की बात कही। हालांकि कई वर्षों से सिर्फ हर चुनाव में वादे हैं लेकिन आदिवासियों के अधिकार हासिये पर रख दिए जाते हैं। यह कड़वी सच्चाई पांचवीं अनुसूची के मामले में सात दशकों से जारी है।

सबसे पहले हमने बस्तर संभाग के उत्तर बस्तर कांकेर के कांकेर विधानसभा में बीजेपी के प्रत्याशी हीरा मरकाम से बात किया उन्होंने कहा कि वन अधिकार कानून लागू है और इसका लाभ आदिवासी समुदाय को मिल भी रहा है । उन्होंने आगे कहा कि कुछ हमारे आदिवासी भाई हैं जो समाज के बीच में राजनीति करना चाहते हैं वो लोग इस विषय पर गहराई में जाने का प्रयास करते हैं । अधिकार तो मिले ही हैं लेकिन प्राथमिकता आदिवासी समुदाय को सशक्त बनाने पर रहेगा। आर्थिक स्थिति में मजबूती लाने का होगा। हालांकि संवैधानिक अधिकारों से सशक्तीकरण को हीरा मरकाम नहीं मान रहे थे उन्हें सरकार की योजनाओं पर विश्वास था।

हमने कांकेर विधानसभा से ही कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी शिशुपाल सोरी से बात करना चाहा लेकिन उन्होंने इस संबंध में हमसे कोई बात नहीं की।

हमने कांकेर क्षेत्र के ही भानुप्रतापपुर विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी मनोज मंडावी से बात किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन संवैधानिक अधिकारों को लंबित कर रखा है और आदिवासियों के समूल नष्ट करने पर तुली हुई हैं । यह भी गौर करने वाली बात है कि खुद मनोज मंडावी के क्षेत्र में पेसा एक्ट और संवैधनिक अधिकारों का पालन नहीं हो रहा है । जिसको लेकर उन्होंने कहा कि जब सरकार ही लागू नहीं कर रही तो कहां से लागू होगा । हमने इस विधानसभा से भाजपा प्रत्याशी देवलाल दुग्गा से भी बात करना चाहा वो अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं लेकिन उन्होंने बात नहीं किया। 

आप को यह भी बताना जरूरी है कि आदिवासियों के महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार पेसा एक्ट, वन अधिकार कानून, और पांचवीं अनुसूची के पालन की बात सिर्फ आम आदमी पार्टी के घोषणा पत्र में है और उसके सीएम प्रत्याशी कोमल हुपेंडी भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट से प्रत्याशी हैं। उन्होंने कहा कि हमारा बस्तर में पहला लक्ष्य ही आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को लागू करना है इन्हीं अधिकारों से आदिवासियों की स्थिति सुधरेगी और स्वशासन बस्तर की हर एक समस्या का हल है।

अब हमने बस्तर के बीजापुर से कांग्रेस विधानसभा प्रत्याशी विक्रम मंडावी से बात किया उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पेसा एक्ट, वन अधिकार कानून, पांचवीं अनुसूची बस्तर में लागू होनी चाहिए और हम इसके लिए प्रयासरत हैं । हमने इसी विधानसभा से बीजेपी प्रत्याशी और वन मंत्री रहे महेश गागड़ा से भी बात करनी चाही लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

हमने बस्तर के सुकमा विधानसभा से सीपीआई प्रत्याशी मनीष कुंजाम से बात किया। उनका साफ तौर पर कहना था कि कांग्रेस हो या बीजेपी संवैधानिक अधिकारों के हनन में दोनों सबसे आगे हैं। अगर बस्तर में आदिवासियों के अधिकारों का पालन किया जाता तो बस्तर में समस्याएं ही नहीं रहतीं। किसी भी राजनैतिक दल को आदिवासियों के अधिकारों को लेकर रुचि ही नहीं है ।

सम्भाग की एकमात्र अनारक्षित विधानसभा सीट जगदलपुर में एसटी-एससी-ओबीसी-अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा के द्वारा समर्थित प्रत्याशी पपू नाग धुरवा ने बातचीत में कहा कि यहां का मूल बस्तरिया समाज विगत 5 साल से पांचवीं अनुसूची, पेसा एक्ट, वनाधिकार अधिनियम ,डीएमएफ फण्ड, परंपरागत ग्रामसभा के प्रस्ताव पर अक्षरश: पालन हेतु सड़क से लेकर गांवों तक संघर्ष कर रहा है लेकिन इन दोनों पार्टियों के नेता व प्रशासन जानबूझकर बात ही नहीं करते हैं ना ही इन्हें पांचवी अनुसूची की जानकारी है। मुझे सयुंक्त मोर्चा ने इन्हीं मुद्दों को विधानसभा तक पहुचाने के उद्देश्य से मैदान में उतारा है। इन मुद्दों के साथ ही बस्तर में वनों पर आधारित लघु उद्योग, प्रसंस्करण व खनिज संपदा का ग्रामसभा के निर्णय के अनुसार दोहन जैसे मुद्दों को लेकर जनता के पास जाने की बात कही।

आप को बता दें कि आज बस्तर में नक्सलवाद और सैन्य सुरक्षा बल दोनों की लड़ाई में आम आदिवासियों की बलि चढ़ रही है। लेकिन आदिवासी बुद्धिजीवी वर्ग मानता है कि बस्तर में अगर शांति स्थापित होगी तो वो आदिवासियों के हक व संवैधानिक अधिकारों को पांचवीं अनुसूची, पेसा एक्ट, सामूहिक वनाधिकार अधिनियम, परम्परागत ग्रामसभा के प्रस्ताव पर अमल करने से ही होगा। जिसे किसी ने लागू नहीं किया है। जिसके कारण आदिवासी समुदाय ठगा सा महसूस कर रहे हैं। इस बार दोनों दलों को इसका प्रभाव मतदान पर पड़ सकता है।

इस विधानसभा में देखने को मिल रहा है कि आप पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में बाकायदा इन अधिकारों का जिक्र किया है। वहीं कांग्रेस और प्रतिपक्ष के नेता ने बस्तर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी सरकार आएगी तो पेसा एक्ट और पांचवीं अनुसूची लागू करेंगे। लेकिन 2003 तक तो कांग्रेस की ही सरकार थी तब तक पेसा एक्ट 1996, पांचवीं अनुसूची का अनुपालन नहीं हो पाया। बीजेपी का घोषणा पत्र अभी तक जारी नहीं हुआ है और 15 साल से छत्तीसगढ़ में सरकार है। जब 15 साल से इसने अधिकारों को लंबित कर रखा है तो अब क्या भला लागू करेंगे? 

सच ये है कि बीजेपी सरकार द्वारा भू राजस्व संहिता 1959 में आदिवासी समुदाय की जमीन को राज्य सरकार या अन्य कम्पनियों के लिए आपसी सहमति से क्रय करने का संशोधन किया गया था जिसे सर्व आदिवासी समुदाय व परम्परागत ग्राम सभाओं के भारी विरोध को देखते हुए वापस लेना पड़ा। आदिवासी समुदाय इस मामले से बहुत ज्यादा आक्रोशित है। बातचीत में आज भी लोग इस काले कानून की वापसी की आशंका से हिसाब चुकता करने की बात कर रहे हैं।

किसी भी राजनीतिक पार्टी ने आदिवासियों के हमारा गांव, हमारा शासन के नारे को बुलंद नहीं किया है। बल्कि उन अधिकारों के संशोधन में लगी हुई हैं। वहीं कई वर्षों से आदिवासी समाज इन अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू कराने आंदोलन के किए बाध्य होते रहे है और संघर्ष ही राह में है।

बरहाल यह गौर करने वाली बात है कि आदिवासी युवाओं और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र, भाषणों में आदिवासी अधिकारों के पालन करने को लेकर किए गए वादों को ढूंढ रही है । जो बस्तर के 12 विधानसभा की तकदीर तय करेगी। सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने हाल ही में एक बयान जारी कर कहा था कि अनुसूचित क्षेत्र की पार्टियों के जनप्रतिनिधि नकारा ही साबित हुए हैं। वे केवल पार्टियों में 5 साल के संविदा कर्मचारियों की भांति कार्य करते हैं और 5 साल पूर्ण होने पर नौकरी बचाने के जुगत में रहते हैं।

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