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ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग में जुटे बीएमसी कमिश्नर ने पाया तबादले का तोहफ़ा

नौकरशाही को दुनिया भर में समाज के सबसे सुरक्षित तबक़े का स्थान हासिल है। इसके बावजूद जब कभी सियासी हुक़्मरानों की मिट्टी पलीद होती है, उन पर नाकामियों का ठीकरा फूटने की नौबत आती है तो उनकी खाल बचाने के लिए भी अफ़सरों को ही बलि का बकरा बनना पड़ता है। इसीलिए मुम्बई में बीएमसी के मुखिया प्रवीण परदेशी के ऐन संकट-काल में बदल दिया गया। उन्हें शहरी विकास विभाग की उसी जगह पर भेज दिया गया जहाँ से नये बीएमसी मुखिया इक़बाल सिंह चहल को लाया गया है। अब सवाल ये है कि तबादले के ऐसे चिर-परिचित हथकंडे के पीछे असली ख़बर क्या है?

मेनस्ट्रीम मीडिया को औपचारिक तौर पर तबादले की वजह नहीं बतायी गयी तो उसने ‘कॉमन सेंस’ के घोड़े दौड़ाकर और सत्ता के प्रति अपनी स्वामी-भक्ति को जताते हुए ये बताना शुरू किया कि मुम्बई में कोरोना महामारी के दिनों-दिन बढ़ते आँकड़ों को देखते हुए उद्धव ठाकरे सरकार ने प्रवीण परदेशी पर अपना हंटर चला दिया। जबकि यही मेनस्ट्रीम मीडिया, महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे के हवाले से ये भी बता रहा है कि राज्य सरकार को यक़ीन है कि ‘अगले 15-20 दिनों में कोरोना के प्रसार पर काबू पा लिया जाएगा।’ ज़ाहिर है, या तो स्वास्थ्य मंत्री झूठ बोल रहे हैं, या फिर सत्ता के इशारे पर मेनस्ट्रीम मीडिया हालात की ग़लत तस्वीर पेश कर रहा है।

नये कमिश्नर चहल।

राजेश टोपे यदि सच्चाई बता रहे होते कि मुम्बई में हालात अगले तीन हफ़्ते में काबू में आ सकते हैं तो फिर बीएमसी में नये मुखिया की तैनाती का कोई तुक़ नहीं हो सकता। इसका मतलब तो ये समझा जाना चाहिए कि प्रवीण परदेशी और उनकी टीम ने सराहनीय काम किया है। वर्ना, कोरोना ने जैसी तबाही दुनिया के तमाम विकसित देशों में मचायी है, उसके मुक़ाबले मुम्बई में दिखे इसके क़हर तो ‘कुछ भी नहीं’ जैसा क्यों नहीं कहा जा सकता? ये सही है कि मुम्बई ‘रेड ज़ोन’ में है, लेकिन 8 मई तक वहाँ सिर्फ़ 11 हज़ार संक्रमित मिले और 462 लोग कोरोना की भेंट चढ़े। जबकि अत्यधिक जनसंख्या घनत्व वाले इस महानगर की आबादी क़रीब सवा दो करोड़ है।

दूसरी ओर, 13 करोड़ की आबादी वाले महाराष्ट्र में 19 हज़ार से ज़्यादा कोरोना संक्रमित पहचाने गये हैं, तब मृतकों की संख्या 731 तक पहुँची है। देश में 48 दिन के लॉकडाउन के बाद क़रीब 57 हज़ार लोग संक्रमित घोषित हुए हैं और मृतकों की संख्या 2 हज़ार पार करने को है। इसीलिए मुम्बई के आँकड़ों को कोई कितना भी भयावह बनाकर पेश करे, लेकिन इस सच्चाई से आँखें नहीं फेरी जा सकतीं कि वहाँ सबसे ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से टेस्टिंग हुई है। अब सरकारों को छोड़ बाक़ी सभी ये जानते हैं कि जहाँ टेस्टिंग ज़्यादा होगी, वहीं पॉज़िटिव भी ज़्यादा मिलेंगे।

ख़ुद ICMR (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) क़रीब तीन हफ़्ते पहले ही बता चुका है कि भारत में 80 फ़ीसदी लक्षण रहित (asymptomatic) संक्रमित हैं। यही कोरोना के निरंकुश करियर बनते है। ऐसे लोग अनजाने में ही औरों को तब तक संक्रमित करते रहते हैं, जब तक इनकी टेस्टिंग करके, इन्हें पॉज़िटिव पाकर क्वारनटीन (एकान्तवास) में नहीं रख लिया जाता। लिहाज़ा, भले ही कई शहर मुम्बई से भी कहीं ज़्यादा गम्भीर दशा में हों लेकिन टेस्टिंग कम होने की वजह से वहाँ की भयावहता सामने नहीं आ पाती। गुजरात मॉडल वाला अहमदाबाद और राम राज्य मॉडल वाला आगरा, साफ़ तौर पर इसी श्रेणी में आते हैं।

फिर आख़िर वो क्या वजह थी जिसने प्रवीण परदेशी को सूली पर चढ़ा दिया? इसके जवाब में अन्दर की बात सिर्फ़ इतनी सी है कि प्रवीण परदेशी लगातार मुम्बई में टेस्टिंग की रफ़्तार को और तेज़ी से बढ़ाने पर ज़ोर पर ज़ोर दिये जा रहे थे। मुम्बई में पहला कोरोना पॉज़िटिव 11 मार्च को मिला जबकि महाराष्ट्र का पहला केस दो दिन पहले पुणे में मिला था। उस वक़्त मुम्बई में टेस्टिंग भी नहीं हो पाती थी। धीरे-धीरे टेस्टिंग केन्द्र बढ़े और टेस्टिंग्स की संख्या भी। परदेशी के जाने तक शहर में रोज़ाना 4,000 से ज़्यादा नमूनों की जाँच होने लगी थी। परदेशी इसे और कई गुना ज़्यादा बढ़ाना चाहते थे, क्योंकि शहर को सामुदायिक संक्रमण (Community spread) के सर्वोच्च ख़तरे से बचाने का इसके सिवाय और कोई तरीक़ा नहीं हो सकता।

परदेशी ने 11 मार्च से 7 मई के दौरान मुम्बई को देश में सबसे अधिक टेस्टिंग करने वाला शहर बना लिया था। टेस्टिंग में आयी तेज़ी से संक्रमितों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ती नज़र आने लगी। इससे मेनस्ट्रीम मीडिया ये ख़ौफ़ फैलाने लगा कि मुम्बई में हालात बेकाबू हो गये हैं। जबकि सबको कोरोना के इस वैज्ञानिक पक्ष के बारे में पता है कि मुम्बई में जो नये पॉज़िटिव पाये जा रहे थे, उनमें लक्षण रहित श्रेणी का अनुपात 81 फ़ीसदी तक था।

उधर, उद्धव ठाकरे सरकार पर दिनों-दिन भयावह हो रहे आँकड़ों को दबाने-छिपाने और घटाने का राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। सघन बस्तियों से आ रही ग़रीबों और प्रवासी मज़दूरों की बदहाली की ख़बरें भी बेकाबू लगने लगी थीं। हालाँकि, शहर के कुल प्रवासी मज़दूरों में क़रीब 60 फ़ीसदी महाराष्ट्र के ही हैं। फिर आँकड़ों से सत्तासीन नेताओं में भी बेचैनी भी बेकाबू होती जा रही थी। इसीलिए तय हुआ कि यदि प्रवीण परदेशी को बलि का बकरा बना दिया जाए तो इस बात को फ़ैलाना आसान होगा कि उद्धव सरकार बहुत सख़्ती और मुस्तैदी से काम कर रही है।

बस, फिर क्या था? प्रवीण परदेशी को हटा दिया गया। लेकिन ये तबादला कोई सज़ा नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के इस अफ़सर को उसी जगह पर भेजा गया, जहाँ से उनका विकल्प आया है। अब इस तबादले से सायन के अस्पताल में मरीज़ों के वार्ड में लाश रखे जाने के मामले से मचे कोहराम पर पर्दा पड़ने लगेगा, औरंगाबाद में रेल की पटरी पर हुई मज़दूरों की मौत, आर्थर रोड जेल में एक ही बैरक़ के 77 क़ैदियों और 26 जेलकर्मियों तथा जेजे रोड पुलिस स्टेशन के 26 पुलिसकर्मियों के एक-साथ पॉज़िटिव पाये जाने जैसी सनसनीखेज़ ख़बरें ठंडी पड़ने लगेंगी।

दरअसल, सरकारों की अपनी ख़ामियों पर शर्म नहीं आती, पछतावा नहीं होता, लेकिन इससे पैदा होने वाली बदनामी बहुत अखरती है। इसीलिए सरकार चलाने के हथकंडों में तबादले की तरक़ीब हमेशा से बहुत लोकप्रिय और असरदायक मानी जाती है। तभी तो उत्तर प्रदेश में नोएडा के उस डीएम के सिर पर नारियल फोड़ दिया जाता है जो योगी और राजनाथ सिंह का चहेता रह चुका हो, तो इन्दौर में भी अफ़सरों पर ही गाज़ गिरती है।

धारावी की एक गली में सैनिटाइज करता नगरपालिका कर्मी।

कहीं भी प्रशासनिक विफलता और नीतिगत मूर्खता का भाँडा फूटने पर अफ़सरों पर ही गाज़ गिरती है। बहुत कम होता है कि महकमे के राजनीतिक मुखिया यानी सम्बन्धित मंत्री भी निशाने पर आ जाएं। मंत्री का इस्तीफ़ा माँगना एक सियासी रस्म है। इसीलिए मंत्री तभी बदले जाते हैं जब उसके ख़िलाफ़ कोई ऐसा मामला सामने आ जाए, जिसकी लीपापोती करने में सत्ता पक्ष को पूरी ताक़त झोंकने के बावजूद कामयाबी नहीं मिले। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के मामलों में ऐसे होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

काँग्रेस के ज़माने में और अटल जी वाली बीजेपी में तो यदा-कदा मंत्री और मुख्यमंत्री बदलने की घटनाएँ हुईं भी, लेकिन मोदी युग वाली बीजेपी या मौजूदा दौर की अन्य पार्टियों की सरकारों में अब नेताओं की कुर्सी जाने के किस्से ढूँढे से भी नहीं मिलते। वर्ना, कोरोना को लेकर शीर्ष स्तर पर जितनी मूर्खताएँ हुई हैं, उसे देखते हुए कितने ही नेताओं की कुर्सी छिन चुकी होती। पहला शिकार तो ख़ुद प्रधानमंत्री होते जिन्होंने कोरोना से मुक़ाबले के लिए ‘आव देखा, न ताव’ वाला लॉकडाउन घोषित करने के सिवाय यदि कुछ ख़ास किया तो वो है ‘मन की बात’, ताली-थाली वादन, अन्धेरा-दीया और पुष्प वर्षा ‘इवेंट’ का आयोजन तथा कुछेक दर्ज़न वीडियो कान्फ्रेन्सिंग।

यदि प्रधानमंत्री में वाकई राजनीतिक और प्रशासनिक कौशल होता तो उन्होंने 25 मार्च की जगह 10 फरवरी के आस पास लॉकडाउन का फ़ैसला लिया होता, तभी देश की सीमाओं को सील कर दिया होता, तभी टेस्टिंग किट, पीपीई किट, मॉस्क, सैनेटाइज़र, वेंटिलेटर के देश में ही उत्पादन और क्वारंटीन तथा अस्पतालों के विस्तार के लिए ऐसे स्तर की योजना बनायी होती जिससे भारत के विश्व गुरु होने वाले दावों पर मुहर लगती। जबकि केरल में 30 जनवरी को मिले देश के पहले पॉज़िटिव मामले के बाद 22 मार्च तक के वक़्त को भारत सरकार ने बुरी तरह से बर्बाद किया। उद्योगपति के हितों का ख़्याल रखते हुए देश भर में फैले 6 करोड़ प्रवासी मज़दूरों को तबाही के दलदल में धकेल दिया गया।

साफ़ है कि आज प्रवासी मज़दूरों को भूख और बेरोज़गारी की जितनी मुसीबत झेलनी पड़ रही है, जैसे लाखों लोग अब जान बचाने के लिए चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नाप रहे हैं, ग़रीबों और किसानों के सामने जीते-जी मारे जाने की चुनौती आ खड़ी हुई है, क्या इसके लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार व्यक्ति का भी कोई तबादला कर पाएगा? क्या एक से एक ऐतिहासिक लापरवाही करने वाला अपराधी भी कभी दंडित हो पाएगा? क्या जनता कभी प्रधानमंत्री को भी कटघरे में खड़ा करके उनसे अपनी दुश्वारियों का हिसाब माँगेगी?

क्या जनता ये भूल जाएगी कि यदि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को 4 मार्च को ये ख़तरा दिख रहा था कि वो होली नहीं मनाएँगे, तो उन्होंने 10 मार्च को ग़रीबों को होली क्यों मनाने दी? यदि 5 मार्च को प्रधानमंत्री को ये लग चुका था कि उनका ब्रुसेल्स जाना ख़तरनाक है तो फिर उन्होंने विमान यात्रा करने वाले सम्पन्न लोगों के लिए देश की सीमाओं को 23 मार्च तक क्यों खोले रखा? 18 जनवरी से लेकर 23 मार्च तक देश में 15 लाख लोगों को विदेश से क्या इसीलिए आने दिया गया कि वो कोरोना को कोने-कोने तक पहुँचाते रहें और सम्पन्न तबके की लापरवाही का भयानक ख़ामियाज़ा करोड़ों ग़रीबों को अपनी ज़िन्दगी की बाज़ी लगाकर झेलना पड़े? इसीलिए यदि वाकई ‘ख़ुदा के घर देर है, लेकिन अन्धेर नहीं’ तो एक दिन इंसाफ़ ज़रूर होगा।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on May 9, 2020 9:04 am

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