Friday, April 19, 2024

बिहार में बादशाह के बेशर्मी की बयार है!

कितनी ताज्जुब की बात है कि लगभग डेढ़ दशक (15 वर्ष) तक किसी राज्य पर शासन करने करने वाली सरकार के शूरमा सुशील मोदी जी कह रहे हैं कि – “सरकार के पास प्रवासी मजदूरों को वापस लाने के लिए संसाधन नहीं हैं।”

कितनी बेशर्म और संवेदनहीन बयान है ये? क्या हक बनता है ऐसी सरकार को सत्ता में बने रहने का ?

सरकार के पास मजदूरों को लाने का संसाधन नहीं है लेकिन कोटा में फँसे बीजेपी विधायक जी के बेटे-बेटियों के लिए पूरा सरकारी तंत्र हाजिर है, आराम से सरकारी पास उपलब्ध है। ये है बिहार की सुशासन व्यवस्था और बढ़ता बिहार।

देश के विभिन्न राज्यों में रोजगार और रोजी-रोटी की तलाश में जाने वाले मजदूरों के प्रति सुशासन सरकार की संवेदना शून्य में ही सिमटती जा रही है। सुशासन बाबू समय-समय पर बड़े-बड़े दावे करते रहे हैं, जिसमें उन्होंने कई बार कहा कि बिहार तरक्की के पथ पर है, राज्य में रोजगार की कोई कमी नहीं है, इस कारण राज्यों से पलायन रुका है। कोरोना संकट से उपजे लॉक डाउन ने बिहार सरकार के ऐसे तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक अनुमान के तहत लगभग 20 लाख बिहारी मजदूर लॉक डाउन में विभिन्न राज्यों में फँसे हैं जो कोरोना संकट की इस भयंकर विपदा में अपने घर आना चाहते हैं। 

लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में जब लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर दूर स्थित  अपने घर पहुँचने के लिए पैदल ही निकल पड़े तो सरकार ने इन मजदूरों की समस्या और व्यथा का समाधान करने के बदले मजदूरों पर पुलिसिया कार्रवाई करने में जुट गई, मजदूरों से अपील की गई कि वो जहाँ हैं, वहीं रहें। लेकिन वहाँ भी इनके रहने, खाने-पीने का कोई इंतजाम नहीं किया गया। 

बिहार में मुख्य विपक्षी दल राजद बार-बार सरकार पर प्रवासी मजदूरों को वापस लाने का दबाव बनाता रहा लेकिन सुशासन बाबू के तानाशाही तेवर तो ‘किम जोंग’ वाले ही बने रहे। जब कोटा में फंसे बिहारी छात्रों को लाने की बात हुई तो भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने रुख पर अड़े रहे। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोटा में फँसे यूपी के बच्चों को स्पेशल बसों द्वारा मँगवा लिया। जब योगी आदित्यनाथ ने अपने राज्य के बच्चों को स्पेशल बसों द्वारा वापस लाए तो बिहार के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़बोले नेता सुशील मोदी ने कहा – “यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने शानदार काम किया है।”

इधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा- “सरकार कोटा में फँसे बच्चों को वापस नहीं लाएगी क्योंकि कोटा में रहने वाले बच्चे प्रायः धनाढ्य व सक्षम परिवार से हैं, सरकार मजदूरों को नहीं ला पा रही है इस कारण कोटा में फँसे छात्रों को भी नहीं लाया जाएगा। नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा- “नीतीश कुमार बेहतर कार्य कर रहे हैं।”

योगी आदित्यनाथ ने कोटा में फंसे बच्चों के वापसी की व्यवस्था की तो भी बढ़िया काम, और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बच्चों को कोटा से वापस नहीं लाया तो भी बढ़िया काम…….है न सुशील मोदी जी की गजब की नीति। इसे कहते हैं – “चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी।”

बिहार में एक गाना प्रचलित है जो सुशील मोदी जी पर बिल्कुल फिट बैठता है 

“भतीजा तोरो माईयो ज़िंदाबाद, 

भतीजा तोरो मौसियो जिंदाबाद”

बिहार के मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार कोटा में फँसे छात्रों और प्रवासी मजदूरों के मसले पर बार-बार नियमों का हवाला देते रहे और केंद्र सरकार से नियमों में बदलाव का भी आग्रह करते रहे। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया। इसके बाद केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को वापस लाने संबंधी नियमों में बदलाव करते हुए गेंद राज्यों के पाले में डाल दिया। 

केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों (Immigrant laborers) को वापस अपने गृह राज्य लाने के लिए बुधवार को नई गाइडलाइन जारी करते हुए राज्यों को इस संबंध में आदेश जारी किया। इसमें कहा गया है कि फंसे मजदूरों, छात्रों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों आदि को बसों से उनके गंतव्य तक पहुंचाया जाएगा। बसों को अच्छी तरह सैनिटाइज किया जाएगा और लोगों को बैठाने में फिजिकल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखना होगा, आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है।

नई गाइडलाइन जारी होने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने इसका स्वागत भी किया, लेकिन सुशासन राज्य के फायर-ब्रिगेड उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी अब संसाधन का रोना रो रहे हैं। सुशील मोदी कह रहे हैं कि –

“बिहार सरकार के पास प्रवासी मजदूरों सहित अन्य लोगों को वापस लाने के लिए संसाधन नहीं है, इतनी संख्या में बसों की उपलब्धता नहीं हो सकती।”

बार-बार नियमों की दुहाई देने वाली सुशासन सरकार अब नई गाइडलाइन जारी होने के बाद क्यों तिलमिला रही है? सुशील मोदी को बताना चाहिए कि 15 वर्षों तक शासन करने वाली सरकार की उपलब्धि यही है क्या?  

राष्ट्र निर्माता कहलाने वाले शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन देने के लिए सरकार के पास संसाधन नहीं है (विदित हो कि बिहार में नियोजित शिक्षक ‘समान काम, समान वेतन’ और ‘सेवा शर्त’ जैसी मांगों को लेकर हड़ताल पर है, लॉकडाउन की इस भयंकर विपदा में सरकार उन्हें वेतन तक नहीं दे रही है, 50 से अधिक शिक्षकों की मृत्यु तक हो गई है) लंबी अवधि से प्रवासी मजदूरों को लाने के लिए सरकार के पास संसाधन नहीं है ……बिहार में सुशासन सरकार को एक नया सरकारी टैगलाइन जारी कर देना चाहिए – 

“सुशासन राज्य में संसाधनों का अभाव है।”

याद कीजिए बिहार की राजधानी में होने वाले उस जल जमाव को…..जिसमें उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को उनके आवास से परिवार सहित रेस्क्यू ऑपरेशन करके बाहर निकाला गया था। उस समय सुशील मोदी से अगर यह कहा जाता कि बाढ़ से बचाने के लिए सरकार के पास संसाधन का अभाव है तो आज इतना संवेदनहीन बयान सुनने को नहीं मिलता।

(दया नन्द स्वतंत्र लेखक हैं और शिक्षा के पेशे से जुड़े हुए हैं।)

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