Wednesday, June 29, 2022

किसान आंदोलन से पश्चिमी यूपी में होने वाले नुकसान की भरपाई पूर्वांचल से करने की फ़िराक़ में बीजेपी

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एक महीने के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परसों तीसरी बार पूर्वांचल पहुंचे। जबकि गृहमंत्री अमित शाह भी पिछले सप्ताह वाराणसी और आजमगढ़ का दौरा कर चुके हैं। कांग्रेस ने भी गोरखपुर और वाराणसी में बड़ी रैलियां की है। और अखिलेश यादव की अगुवाई में समाजवादी पार्टी ने भी। आखिर पूर्वांचल में सारी पार्टियां विशेषकर भाजपा इतना दमखम क्यों लगी रही है। इन्हीं सवालों का जवाब जनचौक के संवाददाता सुशील मानव ने पूर्वांचल की राजनीति पर बहुत महीन नज़र रखने वाले पत्रकार और गोरखपुर न्यूजलाइन के संपादक मनोज कुमार सिंह से जानने की कोशिश की।


यूपी की सत्ता का रास्ता पूर्वांचल से होकर जाता है

सबसे पहले पूर्वांचल के सीट समीकरण की बात करें तो उत्तर प्रदेश की लगभग 33 फीसदी सीटें पूर्वांचल इलाके की हैं। उत्तर प्रदेश के 28 जिले पूर्वांचल में आते हैं, जिनमें कुल 164 विधानसभा सीटें हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल की 164 में से बीजेपी ने 115 सीट पर क़ब्ज़ा जमाया था जबकि सपा ने 17, बसपा ने 14, कांग्रेस को 2 और अन्य को 16 सीटें मिली थीं। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वाराणसी से सांसद होना और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कर्मक्षेत्र गोरखपुर होना भी एक बड़ा फैक्टर रहा था। इसके अलावा भाजपा ने छोटी जातीय पार्टियों से गठबंधन करके अपने सामाजिक आधार को विस्तार दिया था जो बड़े वोट शेयर के रूप में भाजपा से जुड़ा और अधिक सीटें भाजपा ने जीती। पूर्वांचल में बीजेपी ने अपने समीकरण को मजबूत बनाए रखने के लिए जाति आधारित पार्टियों के साथ भी गठबंधन कर रखा है। अनुप्रिया पटेल का अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी भाजपा के साथ हैं। इन दोनों ही दलों का सियासी आधार पूर्वांचल के जिलों में है।

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो साल 2017 में बीजेपी ने 26 जिलों की 156 विधानसभा सीटों में से 106 पर जीत हासिल की थी और उत्तर प्रदेश में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी। इससे पहले भी 2012 में सपा को 85 सीटें मिली थीं जबकि 2007 में बसपा को भी पूर्वांचल से 70 से ज्यादा सीटें मिली थीं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से होने वाले नुकसान की भरपाई पूर्वांचल से करना चाहती भाजपा

किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी कांड के चलते पश्चिम उत्तर प्रदेश से लेकर तराई बेल्ट और अवध के इलाके तक भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ माहौल गर्म है। गोरखपुर न्यूजलाइन के संपादक मनोज कुमार सिंह कहते हैं कि किसान आंदोलन के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसी स्थिति और समीकरण बन गए हैं जो भाजपा के ख़िलाफ़ जा रहे हैं। 2017 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज की तुलना में ठीक उलट स्थिति थी। मुज़फ्फ़रनगर हिंसा के बाद जो ध्रुवीकरण हुआ था उसका सीधा फायदा भाजपा को मिला था और भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तगड़ी जीत हासिल की थी। 

 लेकिन इस बार किसान आंदोलन के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक एंटी-बीजेपी का माहौल बन गया है। ऐसे में भाजपा को पश्चिम में जब बहुत उम्मीद नहीं लग रही है। ऐसे में जब सत्ताधारी दल को पश्चिम इलाके में सफलता की उम्मीद न हो तो दूसरा सबसे बड़ा इलाका पूर्वांचल ही बचता है और यहां पर 150 से ज्यादा सीटें आती हैं और भाजपा का इस पर फोकस करना स्वाभाविक है। 

मनोज सिंह आगे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की जातिगत राजनीति में सबसे ज्यादा लड़ाई पूर्वांचल में ही है। पूर्वांचल की जातिगत वोटों को देखें तो निषाद, राजभर, मौर्य और कुशवाहा यहां पर एक ताक़त के रूप में हैं। पूर्वांचल में जो पार्टी जातिगत समीकरण को साध लेगी उसको चुनाव में सीधा फायदा होगा। इसलिए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार पूर्वांचल का दौरा कर रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री महीने भर में दो बार पूर्वांचल के जिले कुशीनगर और सिद्धार्थनगर आ चुके हैं। इसके साथ ही अमित शाह भी पूर्वांचल पर फोकस कर रहे हैं।

लखीमपुर खीरी कांड का प्रभाव

मनोज कुमार सिंह आगे बताते हैं कि किसान आंदोलन का उस तरह का प्रभाव पूर्वांचल में नहीं है जो तराई या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। किसानों के प्रति सहानुभूति और समर्थन है। मनोज सिंह बताते हैं कि लखीमपुर खीरी कांड का कुछ नुकसान होगा भी तो दो तीन सीटों पर। इससे ज़्यादा इसलिये नहीं होगा क्योंकि भाजपा वहां सिख बनाम हिंदू विभाजन खड़ा कर रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिये स्थिति अनुकूल नहीं रह गई तो उसने जाटों के ख़िलाफ़ गूर्जरों को खड़ा करने की कोशिश की है। भाजपा को इसमें महारत हासिल है। वो तोड़-फोड़कर करके अपना वोट-शेयर बनाने में माहिर है।

मनोज कुमार सिंह।

मनोज कुमार आगे कहते हैं कि लखीमपुर की घटना ने एक बड़ी हलचल पैदा की लेकिन उसके बाद जिस एग्रेसिव तरीके से किसान आंदोलन को बढ़ना चाहिये था वो नहीं हो पाया। लखीमपुर में लोकल द्वंद है। सिखों का दख़ल है किसानी में। किसान आंदोलन को मोबिलाइज करने के लिये पदयात्रा का कार्यक्रम वहां से निघासन तक करने का कार्यक्रम बना था। लेकिन सरकार ने नहीं होने दिया। एक सभा हुयी थी। लेकिन उसमें राकेश टिकैत नहीं आए। तो लखीमपुर खीरी में भाजपा द्वारा खड़ा किये जा रहे सांप्रदायिक विभाजन को तोड़ने के लिये संयुक्त किसान मोर्चा को वहां बड़ा कार्यक्रम करना होगा।

मनोज सिंह बताते हैं कि जब पश्चिमी यूपी में जाट भाजपा के ख़िलाफ़ हो गया है जाट वोट भाजपा को नहीं मिलने वाला है तो वहां पर वो गूर्जरों को साधने में लग गये हैं। सितंबर महीने में दादरी में भाजपा ने मिहिर भोज की मूर्ति लगाया। योगी ने शिलान्यास किया लेकिन उनके वक्तव्य से गूर्जर समाज नाराज़ हो गया। तो यहां तराई में भी भाजपा सिख बनाम हिंदू बनाने की कोशिश कर रही है। ताकि जो किसान आंदोलन का नुकसान होगा उसकी भरपाई वो कर लें।

पूंर्वांचल में किसान आंदोलन से उनको कोई बड़ा नुकसान नहीं है। यहां पर उन्होंने बड़ी सीटें जीती सभी हैं। जो सपा बेल्ट है आजमगढ़, मऊ, ग़ाज़ीपुर का वहां सपा के प्रभाव को तो वो पिछली बार भी भेद नहीं पाये थे। अखिलेश के लड़ने की वजह से काफी सीटें सपा को मिली थीं वहां से।

ओबीसी जातियों में नई जातियों की जो नई चर्निंग हो रही है वो कहीं उनके ख़िलाफ़ न चली जाये इसलिये वो पूर्वांचल में बहुत फोकस कर रहे हैं।

नये सामाजिक आधार के साथ पूर्वांचल में मजबूत हो रही सपा

सपा और कांग्रेस भी लगातार पूर्वांचल में ज़ोर मार रही हैं। मनोज कुमार सिंह कहते हैं अभी कुछ बहुत निष्कर्षात्मक तौर पर नहीं कह सकते। अभी चीजें शेप ले रही हैं। पूर्वांचल में सपा ही भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंदी के तौर पर उभर रही है। कह सकते हैं कि छोटे दलों के साथ गठबंधन करने के चलते पूर्वांचल में सपा को बढ़त मिलती दिख रही है।

मनोज कुमार सिंह कहते हैं कि राजभर को साथ ले आना सपा की बहुत बड़ी सफलता है। मऊ, आजमगढ़, ग़ाज़ीपुर, बलिया, देवरिया, कुशीनगर यानि घाघरा नदी के इधर और उधर सटे हुये इलाके राजभर बाहुल्य इलाके हैं। पिछली बार राजभर को साथ लेने का फायदा भाजपा को मिला था। तो सपा के साथ आने के बाद सोशल बेस में राजभर जुड़ने से उसका विस्तार हो गया है , मजबूत हो गया है। डॉ. अनिल चौहान की पार्टी से गठबंधन करने से चौहान और रालोद के साथ करने से जाट सपा के के साथ जुड़ेंगे। इसी तरह बाबू सिंह कुशवाहा से भी सपा की बात चल रही है। तो जातिगत दलों के साथ सपा ने हाथ मिलाया है। इससे उसके सामाजिक आधार का पूर्वांचल में विस्तार हो रहा है जो भाजपा के लिये मुश्किल पैदा करेगा।

मनोज सिंह आगे कहते हैं कि सपा का वोट शेयर कम नहीं हुआ है। साल 2014, 2017, 2019 में उनका वोट शेयर 21-22 प्रतिशत था वो बरकरार रहा है भले ही उनकी सीटें कम आयी हों लेकिन वोट शेयर बरकरार रहा है। अब नये जातीय दलों के सपा के साथ आने से उसके समाजिक आधार का विस्तार होने से 10-12 प्रतिशत वोट शेयर बढ़ेगा। ये भाजपा के लिये चैलेंज होगा। पिछले 10 महीने के तमाम सर्वे देखिये सभी पिछली बार की तुलना में 100 सीटें भाजपा की कम और सपा की 100 सीट ज़्यादा दिखा रहे हैं। मनोज सिंह कहते हैं कि सर्वे कोई बहुत काम की चीज नहीं हैं। लेकिन ज़मीन पर ये चीजें हो रही हैं।  

कांग्रेस के लिये कितना स्कोप है पूर्वांचल में

मनोज सिंह कहते हैं कि कांग्रेस के पास खोने के लिये कुछ नहीं है। कांग्रेस ने पिछले दो सालों में उत्तर प्रदेश में अपना संगठन खड़ा कर लिया है। प्रियंका गांधी ने जिला से लेकर पंचायत स्तर तक इसे बदला है। कम से कम आज उनके पास एक लिस्ट है कि पंचायत स्तर पर, बूथ स्तर पर, ब्लॉक स्तर पर कौन हमारा नेता है, कौन कार्यकर्ता है। बनारस और गोरखपुर में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की रैली हुई तो इसी कारण से इतनी भीड़ इकट्ठा करने में वो कामयाब हुए। ये सब कांग्रेस के कार्यकर्ता आये हुए थे। उन रैलियों में पैसा देकर लायी भीड़ नहीं थी वो। तो कांग्रेस की क्षमता हो गई है अकेले दम पर भीड़ जुटाने की। लेकिन कांग्रेस के पास कोई सामाजिक आधार तो है नहीं। तो कांग्रेस इस बार के चुनाव में अपना वोट शेयर और सीटों की संख्या बढ़ा ले। कांग्रेस ने कोशिश की सामाजिक आधार बढ़ाने की लेकिन कोई दल उनके साथ नहीं आया तो उन्होंने अपना सारा फोकस क्लास और जेंडर पर फोकस कर दिया है। बड़ा गेम है। क्लिक कर सकता है। बिहार में शराब बंदी से नीतीश कुमार ने महिला वोट बैंक तैयार कर लिया है। जिसकी वजह से अभी वो सत्ता में बने हुये हैं। तो कांग्रेस इसमें कामयाब हो गई और उसकी सीटें 25-30 भी बढ़ गईं तो बड़ी कामयाबी होगी कांग्रेस की।

मनोज सिंह आगे कहते हैं कि बसपा का वोट शेयर कम हुआ है। केवल जाटव वोट बैंक उसके पास बचा हुआ है। बसपा फ्लोटर हो सकती है पूरी तरह से न सही तो आंशिक तौर पर ही सही। हालांकि संभावना कम है। फिर भी अगर फ्लोट हुआ तो या तो उसमें से कुछ भाजपा या कुछ कांग्रेस अपने साथ ले जायेंगी।

अयोध्या मामले पर मनोज सिंह कहते हैं उसका कुछ बन नहीं पा रहा है। भाजपा का जहरीला भाषण शुरू हो गया है। वो सपा के शासन को मुस्लिम शासन बता रहे हैं। तो भाजपा के लिये अयोध्या का कोई बहुत प्रभावकारी नहीं बन पा रहा है और सामाजिक समीकरण भी उस तरह से नहीं बन रहे तो वो वापस अपनी पिच पर लौट रहे हैं। सांप्रदायिक और विभाजन के। चुनाव को ध्रुवीकृत करना ही उनका अंतिम और प्रभावी अस्त्र है और वो उसकी ओर वापस लौट रहे हैं। सपा सामाजिक न्याय समीकरणों को मजबूत करके चुनौती देगी। और सपा के इर्द गिर्द ही ध्रुवीकरण भी होगा। 

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