Friday, December 2, 2022

योगी नहीं जुटा सके अयोध्या और मथुरा से लड़ने की हिम्मत, लौटे अपने घर

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है और भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा ने अपनी पहली लिस्ट जारी कर दी है। भाजपा की पहली लिस्ट में पहला नाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरा नाम उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का है, जो क्रमश: गोरखपुर सदर और कौशांबी के सिराथू विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारे गए हैं। इसके साथ ही यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि चुनाव पूर्व भारी दलबदल से भाजपा भीतर से पूरी तरह हिल गयी है और रक्षात्मक मोड में आ गई है। ऐसे में भाजपा नहीं चाहती कि चुनाव में उसके बड़े नामों की पराजय हो, इसलिए बड़े नामों को सेफ सीटों से चुनाव में उतारने की रणनीति के तहत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को गोरखपुर सदर और सिराथू से भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है।

गोरखपुर शहर सीट योगी आदित्यनाथ के लिए सबसे सेफ इसलिए मानी जा रही है क्योंकि साल 1967 के बाद से बीजेपी और जनसंघ यहां से नहीं हारीं। सिर्फ 2002 में एक बार हारी थी। हार अखिल भारतीय हिंदू महासभा के हाथों हुई थी। तब महासभा के उम्मीदवार डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल थे, जिन्हें 39% वोट और बीजेपी उम्मीदवार शिव प्रताप शुक्ला को 14% वोट मिले थे। ये तीसरे नंबर पर थे। योगी आदित्यनाथ तब गोरखपुर से सांसद थे। योगी आदित्यनाथ को मथुरा या अयोध्या की बजाय गोरखपुर से टिकट देने के पीछे एक बड़ी वजह हो सकती है कि पार्टी को लगता है कि इससे पूर्वी यूपी में फायदा मिल सकता है।

गोरखपुर शहर सीट की बात करें तो साल 2017 में यहां से कुल 23 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। बीजेपी की तरफ से राधा मोहन दास अग्रवाल उम्मीदवार थे। उन्हें सबसे ज्यादा 55.9% वोट मिले थे। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के उम्मीदवार राणा राहुल सिंह थे। उन्हें 28.1% वोट मिले।तीसरे नंबर पर बीएसपी के जनार्दन चौधरी थे, जिन्हें 11.1% वोट मिले थे।

सिराथू विधानसभा सीट से डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या को टिकट दिया गया है। साल 2017 में सिराथू से कुल 16 उम्मीदवार थे। बीजेपी के उम्मीदवार शीतला प्रसाद को 40% वोट मिला था। वहीं दूसरे नंबर पर एसपी उम्मीदवार वाचस्पति को 26% वोट मिले थे।

भाजपा ने शनिवार को जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 107 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की तो उसमें नजरें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम को लेकर थीं। योगी अयोध्या या मथुरा से नहीं, गोरखपुर से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। वहीं गोरखपुर, जो अब तक उनका गढ़ रहा है। भाजपा की पहली सूची यह साफ इशारा कर रही है कि स्वामी प्रसाद मौर्य,अवतार सिंह भड़ाना,दारा सिंह चौहान , जैसे कद्दावर मंत्रियों और कुछ विधायकों के पार्टी छोड़कर जाने के बाद भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति बदलनी पड़ी है और क्योंकि वह ज्यादा प्रयोग करने की स्थिति में नहीं है ।

पिछले कुछ दिनों से चर्चा थी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने वाले हैं। कहा जा रहा था कि पार्टी उन्हें मथुरा या अयोध्या से चुनावी मैदान में उतारेगी। योगी की छवि, भाजपा का राम मंदिर का एजेंडा और अयोध्या में हो रहे मंदिर निर्माण की वजह से योगी को अयोध्या से टिकट देना भाजपा के लिए बड़ा सांकेतिक कदम होता। चर्चा यह भी थी कि योगी मथुरा से चुनाव लड़ सकते हैं, क्योंकि भाजपा नेताओं के बयानों में बार-बार मथुरा का जिक्र आ रहा था। लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने योगी को गोरखपुर से चुनावी मैदान में उतारने का फैसला किया है।

योगी आदित्यनाथ ने 1998 में पहली बार गोरखपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत गए। 2017 में मुख्यमंत्री बनने से पहले तक वे लगातार पांच बार गोरखपुर से सांसद रहे। जाहिर है कि गोरखपुर योगी का गढ़ है। भाजपा ने अयोध्या या मथुरा की जगह योगी को गोरखपुर से उतारने का फैसला इसलिए किया है, क्योंकि यहां से चुनाव लड़ने के लिए खुद योगी या पार्टी को ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी।

इस सूची से स्पष्ट है कि भाजपा काफी सतर्क हो गई है। पहले कहा जा रहा था कि पार्टी 40 फीसदी विधायकों के टिकट काट सकती है, लेकिन पहली सूची में मात्र 21 टिकट काटे गए हैं, यानी करीब 20 फीसदी। इस तरह पार्टी ने डैमेज कंट्रोल किया है और संभावित बगावत को टालने के लिए पुराने चेहरों पर भरोसा किया है।

पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा प्रयोगधर्मिता से भी बची है। भाजपा को चिंता है कि किसान आंदोलन से उसे ज्यादा नुकसान न हो। इस आंदोलन की वजह से कुछ विधायकों का गांवों में विरोध भी हुआ था। फिर भी पार्टी ने पुराने नाम रिपीट किए हैं। दूसरे दलों से आए नेताओं को भी टिकट मिले हैं। जैसे- बेहट सीट से कांग्रेस विधायक नरेश सैनी जीते थे। वे भाजपा में आ गए और पार्टी ने उन्हें टिकट दे दिया। छपरौली राष्ट्रीय लोक दल का गढ़ मानी जाती है। यह पिछले चुनाव में रालोद की जीती हुई इकलौती सीट थी। यहां से सहेंद्र सिंह रमाला जीते थे, लेकिन वे भाजपा में चले गए। इस बार उन्हें ही भाजपा ने टिकट दिया है।

पार्टी ने युवा चेहरों को भी मौका दिया है। जैसे- मेरठ शहर सीट का मिजाज ऐसा रहा है कि यहां भाजपा एक बार जीत जाती है, दूसरी बार हार जाती है। यह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी की पुरानी सीट है। वाजपेयी भाजपा का बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं, लेकिन पार्टी ने इस बार युवा चेहरे कमल दत्त शर्मा को यहां से टिकट दिया है। इसी तरह मेरठ कैंट से भाजपा ने विधायक सत्य प्रकाश अग्रवाल की जगह अमित अग्रवाल को मौका दिया है।

पहली सूची में महिलाओं की संख्या कम है। एक चौंकाने वाला नाम पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य का है, जिन्हें आगरा से टिकट दिया गया है। भाजपा ने जातिगत संतुलन साधने की कोशिश की है। सवर्ण, पिछड़े, दलित सभी को मौके दिए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी तादाद में मुस्लिम वोटर हैं, इसके बावजूद भाजपा की पहली सूची में कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी की बात करें तो मायावती ने 53 उम्मीदवारों की पहली सूची में 14 मुस्लिमों, 12 पिछड़े और नौ ब्राह्मणों को टिकट दिया है।

लेकिन वर्ष 2003-04 के बाद पहली बार ऐसा होने जा रहा है, जब कोई मुख्यमंत्री विधानसभा चुनाव लड़ेगा। इसके पहले आखिरी बार 2003-04 में मुख्यमंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव ने गुन्नौर से विधानसभा चुनाव लड़ा था और रिकॉर्ड 1.83 लाख मतों से जीत हासिल की थी। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनावी मैदान में उतरने का फैसला लिया है।

वर्ष 2007 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की जीत हुई। दलित-ब्राह्मण गठजोड़ से मायावती ने अपनी सरकार बनाई। मायावती विधान परिषद की सदस्य बनकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंची। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की जीत हुई। मुस्लिम-यादव गठजोड़ से अखिलेश यादव ने अपनी सरकार बनाई। अखिलेश ने भी विधान परिषद के सदस्य के तौर पर मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की। मोदी और केशव मौर्य के चेहरे पर भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। भाजपा ने गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया। सांसद पद से इस्तीफा देने के बाद योगी विधान परिषद के सदस्य बने और फिर मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली।

राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। वर्ष 2002 में तब गोरखपुर जिले से भारतीय जनता पार्टी ने शिव प्रताप शुक्ला को अपना प्रत्याशी बनाया। इससे खफा होकर मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तब अखिल भारतीय हिन्दू महासभा से डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को शिव प्रताप शुक्ला के खिलाफ मैदान में उतार दिया। शुक्ला के खिलाफ योगी ने खूब प्रचार किया। नतीजा ये रहा कि डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल जीत गए और बीजेपी बुरी तरह हार गई।

चर्चा है कि योगी खुद चाहते थे गोरखपुर, वरना पूरा जिला ही हाथ निकलने का डर था।योगी आदित्यनाथ यदि गोरखपुर क्षेत्र से बाहर रहते तो, शहरी के साथ ही आसपास के 17 विधानसभा सीटों पर असर पड़ने के आसार थे। गोरखपुर ग्रामीण के साथ ही पिपराइच, चौरीचौरा की सीट भी फंसती हुई दिखाई दे रही थी। कुशीनगर में स्वामी प्रसाद मौर्या के अलग होने से पडरौना, तमकुहीराज, फाजिलनगर की सीट पर भी सपा का कब्जा होता दिख रहा था। क्योंकि, यहां पर कांग्रेस के साथ ही मौर्या का दबदबा है। संत कबीर नगर में तीन विधानसभा सीट में खलीलाबाद की सीट हाथ से निकलती दिखाई दे रही थी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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