Wednesday, October 20, 2021

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- न्यायिक कार्यवाही शुरू होने के बाद मीडिया ट्रायल अवमानना

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि मीडिया ट्रायल न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप करता है और इसलिए न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत परिभाषित ‘न्यायालय की अवमानना’ की श्रेणी में आता है। हाई कोर्ट ने कहा की न्यायिक कार्यवाही शुरू होने के बाद मीडिया ट्रायल न्यायालय का अवमान होता है। खंडपीठ ने मीडिया हाउसेज को नसीहत दी कि आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान संयम बरतें।

चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की खंडपीठ ने दो चैनलों की रिपोर्टिंग को मानहानिकारक बताते हुए कहा, मीडिया ट्रायल से न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप और बाधा उत्पन्न होती है। खंडपीठ ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में मुंबई पुलिस के खिलाफ रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ द्वारा किया गया मीडिया कवरेज प्रथम दृष्टया घृणायुक्त/तिरस्कारपूर्ण था। खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री के मद्देनजर, टीवी मीडिया द्वारा शहर की पुलिस की आलोचना अनुचित थी। शहर की पुलिस जांच के बहुत ही बुनियादी स्तर पर थी। हालांकि खंडपीठ ने कहा कि इसने फिर भी चैनलों के खिलाफ कार्रवाई का फैसला नहीं किया है।

खंडपीठ ने कहा है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद रिपब्लिक टीवी पर दिखाई गईं कुछ रिपोर्ट्स बेहद घृणापूर्ण थीं। खंडपीठ ने कहा कि हालांकि वह इस बारे में फैसला लेगी कि चैनल पर कोई कानूनी कार्रवाई की जाए या नहीं। खंडपीठ ने कहा है कि अगर किसी भी मीडिया संगठन की कोई ऐसी रिपोर्ट चल रही है जो जांच में या न्यायपालिका के काम में बाधा बनती है, तो उसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।

खंडपीठ ने सुसाइड के मामलों में रिपोर्टिंग के लिए मीडिया संगठनों के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। खंडपीठ ने कहा कि मीडिया द्वारा किया गया ट्रायल पुलिस द्वारा आपराधिक जांच में हस्तक्षेप करता है। खंडपीठ ने कहा कि मीडिया ट्रायल, केबल टीवी एक्ट के तहत बनाए गए प्रोग्राम कोड के विरोध में है, इसलिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अपराध रिपोर्टिंग पर दिशा-निर्देश, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी लागू होंगे। मीडिया को जांच के बारे में चर्चा को लेकर संयम का पालन करना चाहिए, ताकि आरोपी और गवाह के अधिकारों का हनन न हो। अभियुक्त द्वारा स्वीकारोक्ति बयान को प्रकाशित करना, जैसे कि यह एक स्वीकार्य प्रमाण है, बिना जनता को यह बताए कि वह अदालत में सबूत के रूप में मान्य नहीं है, अनुचित है।

खंडपीठ ने कहा कि आत्महत्या की रिपोर्ट करते समय, यह सुझाव देने से कि व्यक्ति कमजोर चरित्र का था, बचा जाना चाहिए। अपराध के दृश्यों का पुनर्निर्माण, संभावित गवाहों के साथ साक्षात्कार, संवेदनशील और गोपनीय जानकारी लीक करने से बचना चाहिए। जांच एजेंसियों को जांच जारी रखने के बारे में गोपनीयता बनाए रखने का अधिकार है और वे सूचना को बांटने के लिए बाध्य नहीं हैं।

खंडपीठ ने रिपब्लिक टीवी का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ताओं से पूछा कि यदि आप अन्वेषक, अभियोजक और न्यायाधीश बन जाएंगे, तो हमारा क्या उपयोग है? हम यहां क्यों हैं? खंडपीठ ने रिपब्लिक टीवी की वकील से पूछा कि क्या यह खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है? सार्वजनिक रूप से पब्लिक की राय लेना कि मामले में किसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए? जब एक मामले की जांच चल रही है और मुद्दा यह है कि क्या यह एक हत्या या आत्महत्या है, और एक चैनल कह रहा है कि यह हत्या है, तो क्या वह खोजी पत्रकारिता है? पीठ ने चैनल के वकील से कहा, “सीआरपीसी के तहत पुलिस को खोजी शक्तियां दी गई हैं।

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सुशांत सिंह राजपूत मामले में कुछ मीडिया हाउसों की रिपोर्टिंग के पैटर्न की आलोचना करते हुए मौखिक टिप्पणी की थी कि हम चाहते हैं कि मीडिया सीमाओं को पार न करे। यदि आप अन्वेषक, अभियोजक और न्यायाधीश बन जाते हैं, तो हमारा क्या उपयोग है? हम यहां क्यों आए हैं। अगर आपको सच्चाई का पता लगाने में इतनी दिलचस्पी है, तो आपको सीआरपीसी पर ध्यान देना चाहिए! कानून की अनदेखी कोई बहाना नहीं है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि पत्रकार पहले और तटस्थ थे, अब मीडिया अत्यधिक ध्रुवीकृत है। मीडिया के स्व-नियमन की अवधारणा विफल हो गई है।

खंडपीठ ने कहा कि किसी भी मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा ऐसी खबरें दिखाना अदालत की मानहानि करने के बराबर माना जाएगा, जिससे मामले की जांच में या उसमें न्याय देने में अवरोध उत्पन्न होता हो। मीडिया ट्रायल के कारण न्याय देने में हस्तक्षेप और अवरोध उत्पन्न होते हैं और यह केबल टीवी नेटवर्क नियमन कानून के तहत कार्यक्रम संहिता का उल्लंघन भी करता है। कोई भी खबर पत्रकारिता के मानकों और नैतिकता संबंधी नियमों के अनुरूप ही होनी चाहिए, अन्यथा मीडिया घरानों को मानहानि संबंधी कार्रवाई का सामना करना होगा।

खंडपीठ ने कहा है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में मीडिया ट्रायल के दौरान ‘केबल टीवी नेटवर्क रेगुलेशन एक्ट’ का उल्लंघन किया गया है। इतना ही नहीं खंडपीठ ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में कुछ टीवी चैनलों को फटकार भी लगाई है कि उन्होंने मुंबई पुलिस को बदनाम करने की कोशिश की।

खंडपीठ ने कहा है कि मीडिया ने पुलिस की आपराधिक जांच में हस्तक्षेप किया है। अपराध के दृश्यों का पुनर्निर्माण, संभावित गवाहों के इंटरव्यू, संवेदनशील और गोपनीय जानकारी लीक करने से बचा जाना चाहिए। प्रेस/मीडिया को ऐसी चर्चा से बचना चाहिए। आपराधिक जांच से संबंधित बहस और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में केवल सूचनात्मक रिपोर्टों तक ही सीमित होना चाहिए।

खंडपीठ ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत की घटना की प्रेस खासकर टीवी समाचार चैनलों द्वारा खबर दिखाने पर रोक लगाने की मांग करने वाली अनेक जनहित याचिकाओं पर पीठ ने पिछले वर्ष छह नवंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। ये याचिकाएं वरिष्ठ अधिवक्ता अस्पी चिनॉय, कार्यकर्ताओं, अन्य नागरिकों और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों के समूह द्वारा दायर की गई थीं। इनमें यह मांग भी की गई थी कि समाचार चैनलों को सुशांत मामले में मीडिया ट्रायल करने से रोका जाए।

गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत पिछले साल 14 जून को अपने मुंबई स्थित अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे। मुंबई पुलिस ने अपनी जांच में इसे आत्महत्या माना था। हालांकि सुशांत के परिवार और बिहार सरकार की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने यह केस सीबीआई के हवाले कर दिया था। सीबीआई अभी मामले की जांच कर रही है और किसी नतीजे तक नहीं पहुंची है। सुशांत के केस में सीबीआई के अलावा ड्रग्स के एंगल से नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से प्रवर्तन निदेशालय भी जांच कर रहा है।

सुशांत की मौते के बाद सुशांत के पिता केके सिंह ने पटना में अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के खिलाफ उनके बेटे को आत्महत्या के लिए उकासने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवाई थी। इसके बाद रिया चक्रवर्ती से सीबीआई, ईडी और एनसीबी ने लंबी पूछताछ भी की है। इस मामले में ड्रग्स का एंगल सामने आने के बाद रिया चक्रवर्ती और उनके भाई शौविक चक्रवर्ती को एनसीबी ने गिरफ्तार किया था। करीब एक महीने बाद अभिनेत्री को जमानत मिली थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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