Fri. May 29th, 2020

खूनी हमलों में 2000-2018 के बीच 65 पत्रकारों ने गंवाई जान, ‘साइलेंसिंग जर्नलिस्ट्स इन इंडिया’ किताब में विस्तृत रिपोर्ट

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प्रेस क्लब में किताब का विमोचन।

नई दिल्ली। देश में प्रेस की आज़ादी एक चुनौतीपूर्ण दौर से होकर गुज़र रही है जब पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं और उन्हे अपने काम से रोकने के लिए मुकदमों में फंसाया जाना जारी है। प्रेस की आज़ादी के लिए ये हमले कितने घातक हैं ये बृहस्पतिवार को रिलीज़ हुई एक किताब ‘साइलेंसिंग जर्नलिस्ट्स इन इंडिया’ सामने आयी है। इस स्टडी में सन 2000 से 2018 तक के पत्रकारों पर जानलेवा हमलों का लेखा जोखा है।

स्टडी के मुताबिक इस दौरान कुल 65 पत्रकारों की उनके लेखन की वजह से हत्यायें हुईं जिसमें सबसे ज्यादा 12 पत्रकारों की मौत उत्तर प्रदेश में हुई। हाल के वर्षों में गौरी लंकेश पत्रिके की संपादक गौरी लंकेश की बंगलोर में उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गई थी तो दूसरी तरफ राइजिंग कश्मीर के संपादक आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गए।

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‘साइलेंसिंग जर्नलिस्ट्स इन इंडिया’ नामक इस स्टडी को मनवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स, मुंबई प्रेस क्लब, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स, बृहमुंबई पत्रकार यूनियन और मीडिया स्टडीज़ ग्रुप के साथ मिल कर प्रकाशित किया है।

स्टडी में बारह राज्यों के 31 उन पत्रकारों की भी जानकारी दी गई है जिन पर उनके लेखन की वजह से मुकदमों में फसाया गया है।

पत्रकारों को संबोधित करते हुये प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अनंत बगैतकर ने स्वतंत्र मीडिया के सामने की चुनौतियों को रेखांकित करते हुये ज़ोर दिया कि पत्रकार संगठनों और सिविल सोसाइटी को साथ मिल कर काम करना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया स्टडीज़ ग्रुप के संपादक अनिल चमड़िया ने कहा कि मीडिया पर हमले एक सुनियोजित ढंग से हो रहे हैं और कॉर्पोरेट और सरकारें न्याय प्रक्रिया की खामियों का फायदा उठा कर प्रेस की आज़ादी और पत्रकारों के अधिकारों का दमन करने में कामयाब हो जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट और ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के संस्थापक कॉलिन गोंसाल्विस ने कहा कि राजद्रोह कानून का इस्तेमाल निर्भीक पत्रकारिता को दबाने के लिये लिये हो रहा है। कॉलिन गोंसाल्विस ने मौजूदा समय में पत्रकारिता के सामने आए खतरे से निपटने के लिये ‘कमेटी फॉर डिफ़ेंसे ऑफ जर्नलिस्ट्स’ बनाने का प्रस्ताव रखा जिसके तहत वकील, सिविल सोसाइटी और पत्रकार संगठन मिलजुल कर काम करेंगे।

इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स और दिल्ली यूनियन ऑफ जरनिस्ट्स की महासचिव विनीता पांडे और सुजाता मधोक ने भी प्रेस की आज़ादी को बचाने के लिये सभी पत्रकार संगठनों को एक साथ आने का आह्वान किया।

किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ पत्रकार और द सिटिज़न की संस्थापक संपादक सीमा मुस्तफा ने लिखी है। ‘साइलेंसिंग जर्नलिस्ट्स इन इंडिया’ का गुरुवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस क्लब के प्रेसिडेंट, इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स, की महसचिव विनीता पांडे, दिल्ली यूनियन ऑफ जरनिस्ट्स के अध्यक्ष एसके पांडे, सुप्रीम कोर्ट से सीनयर एडवोकेट और एचआरएलएन के सास्थापक अध्यक्ष कॉलिन गोंसाल्विस और मीडिया स्टडीज़ ग्रुप के कनवीनर और वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने किया।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित रिपोर्ट।)

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