Tuesday, December 7, 2021

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इंफ्रास्ट्रक्चर बनाओ, संवारो और फिर निजी क्षेत्र को बेच दो – माले मुफ्त दिले बेरहम !

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कुशीनगर, हवाई अड्डा के भी अगले साल तक निजी क्षेत्र को सौंपे जाने की योजना है। कुशीनगर का हवाई अड्डा कल देश को प्रधानमंत्री ने समर्पित कर दिया, पर यह हवाईअड्डा अगले ही साल राष्ट्रीय मोनेटाइजेशन कार्यक्रम में निजी पूंजीपतियों को सौंपे जाने की सूची में सरकार द्वारा रखा गया है। देश के छह बड़े एयरपोर्ट 50 सालों के लिए पहले ही अडानी ग्रुप को सौंपे जा चुके हैं, और 25 अन्य हवाईअड्डों को भी बेचने की योजना है। इसमें फिलहाल कोई संशय नहीं है कि यह सब हवाई अड्डे अडानी ग्रुप को ही मिलेंगे। बस प्रक्रिया और अन्य औपचारिकताओं की देर है।

भारतीय हवाईअड्डा प्राधिकरण के बोर्ड ने 13 हवाई अड्डों के निजीकरण को मंजूरी दे दी है। यह मंजूरी, राष्ट्रीय मुद्रीकरण योजना के अंतर्गत दी गयी है। मोनेटाइजेशन की यह योजना, निजीकरण का एक खूबसूरत नाम है, जो और कुछ नहीं, बस सरकारी संपदा को बेच देने का एक उपक्रम है। सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2024 तक हवाई अड्डों में 3,660 करोड़ रुपये का निजी निवेश करना है। यानी इतनी कीमत तक के हवाई अड्डों को निजी क्षेत्रों को बेच देना है।

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक खबर के अनुसार, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया, एएआई बोर्ड ने देश के छह प्रमुख हवाई अड्डों भुवनेश्वर, वाराणसी, अमृतसर, त्रिची, इंदौर, रायपुर और सात छोटे हवाई अड्डों, झारसुगुडा, गया, कुशीनगर, कांगड़ा, तिरुपति, जबलपुर और जलगांव हवाई अड्डों के निजीकरण को मंजूरी दे दी है। इन छोटे हवाई अड्डों को, बड़े हवाई अड्डों के साथ जोड़ कर, एक खरीदो, एक पाओ, योजना की नकल पर, बड़े हवाई अड्डों के साथ जोड़ कर मोनेटाइज किया जाएगा। ऐसा, निवेशकों को बड़े पैमाने और आकार के साथ लुभाने के लिए किया जाएगा।

एएआई, नीलामी के लिये, बोली हेतु, दस्तावेज तैयार करने के लिए एक सलाहकार की नियुक्त करेगा, जो इन हवाई अड्डों की रियायत अवधि और आरक्षित मूल्य तय करेगा। नीलामी हेतु, बोलियां 2022 की शुरुआत तक बुलाए जाने की संभावना है।

यह भी पहली बार ही है, जब बड़े हवाई अड्डों को छोटे हवाई अड्डों से जोड़ कर, एक नए मॉडल के अनुसार, यह हवाई अड्डे निजी क्षेत्रों को सौंपे जाएंगे। सरकार का उद्देश्य है, सभी हवाई अड्डों को निजी क्षेत्रों को सौंप देना है। पर छोटे शहरों के हवाई अड्डे, कम और सीमित उड़ान के कारण, उतने लाभकारी नहीं होते हैं और, उन्हें अपने नियंत्रण में लेने के लिये, पूंजीपति उतने उत्साह से आगे नहीं आते हैं, तो इसे भी मार्केटिंग के सूत्र, बाय वन, गेट वन के अनुसार, बड़े हवाई अड्डों के साथ क्लब कर के जोड़ने की योजना नीति आयोग ने बनाई है।

नीति आयोग द्वारा तैयार किये गए, राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन दस्तावेज के अनुसार,

“निजी क्षेत्र के निवेश और भागीदारी की मदद से लाभकारी हवाई अड्डों के साथ-साथ गैर-लाभकारी हवाई अड्डों के विकास को सुनिश्चित करने के लिए, छह बड़े हवाई अड्डों में से प्रत्येक के साथ छोटे हवाई अड्डों की जोड़ी / क्लबिंग और पैकेज के रूप में पट्टे पर देने का पता लगाया जा रहा है,” इसी दस्तावेज में दिए गए दिशानिर्देशों के अनुसार, सरकार, इन हवाई अड्डों को मोनेटाइज कर के धन एकत्र करेगी।

एएआई के अनुसार, झारसुगुडा हवाईअड्डे को भुवनेश्वर, कुशीनगर और गया हवाईअड्डों के साथ जोड़ा जाएगा, जबकि वाराणसी, कांगड़ा, अमृतसर, जलगांव और त्रिची हवाईअड्डों को क्रमश: रायपुर जबलपुर, इंदौर और तिरुपति हवाईअड्डों के साथ जोड़ा जाएगा। संभावित निवेशक और सलाहकार जिनसे बिजनेस स्टैंडर्ड ने बात की थी, ने कहा है कि,”बड़े निवेशकों के ज्यादा दिलचस्पी दिखाने की संभावना नहीं है क्योंकि ये सीमित आकार और पैमाने वाले छोटे हवाई अड्डे हैं।”

हालांकि, उन्होंने बताया कि “गया और कुशीनगर के हवाई अड्डों के साथ, वाराणसी का हवाई अड्डा, निवेशकों और पूंजीपतियों को आकर्षित करेगा, क्योंकि तीनों हवाई अड्डे बौद्ध सर्किट पर आते हैं और इन पर, अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को आकर्षित करने की क्षमता भी है।”

बौद्ध सर्किट, बौद्ध पर्यटन क्षेत्रों को साथ जोड़ कर बनाया गया एक मार्ग है, जो नेपाल में, भगवान बुद्ध के जन्मस्थान, लुंबिनी, उनके निर्वाण स्थल, कुशीनगर, श्रावस्ती, जहां पर, बुद्ध ने अपने चौबीस वर्षावास बिताये हैं, वाराणसी, सारनाथ जहां बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन किया है, बोधगया, जहां उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था और राजगीर, जो मगध की राजधानी थी, को साथ साथ जोड़ कर चलता है। इसे ही पर्यटन की भाषा मे बौद्ध सर्किट कहा जाता है। यह महत्वाकांक्षी योजना यदि अपनी योजना के अनुसार लागू हो जाय तो, पूर्वांचल और बिहार के जिलों की सूरत बदल कर रख सकती है। भारत में चीन, जापान, दक्षिण पूर्व के एशियाई देशों और श्रीलंका से बहुत से पर्यटक इन बौद्ध तीर्थो के भ्रमण के लिये आते हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, “एक इंफ्रास्ट्रक्चर फर्म के एक एग्जिक्यूटिव ने कहा, जीएमआर या अडानी ग्रुप जैसे ऑपरेटरों के बजाय, हम अन्य छोटे समूहों के प्रवेश को भी, इस सौदे में देख सकते हैं। यदि उन शहरों का स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर भी सुव्यवस्थित हो तो, जहां यह हवाईअड्डे स्थित हैं।”

निजीकरण के अंतिम दौर में, अडानी समूह ने देश के, उन सभी छह हवाई अड्डों- अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु और गुवाहाटी को जीतने के लिए आक्रामक बोली लगाई थी, जो सरकार के मोनेटाइजेशन कार्यक्रम में शामिल थे। इन हवाई अड्डों को अडानी ग्रुप को सौंपने की कार्यवाही भी सरकार ने शुरू कर दी है। मुम्बई, लखनऊ और जयपुर के हवाई अड्डे सौंपे भी जा चुके हैं। अडानी ग्रुप की बोली भी सबसे अधिक थी। कुछ मामलों में अडानी ग्रुप द्वारा लगाई गई बोली की राशि अन्य के द्वारा लगाई गयी, दूसरी सबसे ऊंची बोली से भी दोगुनी थी। रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के अनुसार, “आक्रामक बोली लगाने से एएआई को अप्रत्याशित लाभ होगा, जो अडानी समूह से रियायत शुल्क के रूप में प्रति वर्ष 600 करोड़ रुपये से अधिक कमा सकता है।”

 सरकार ने एक अध्ययन किया है कि, “महामारी के कारण यात्री यातायात और हवाई अड्डों के राजस्व में गिरावट के बावजूद, हवाई अड्डों में निवेशकों की दिलचस्पी स्थिर बनी हुई है।”

आर्थिक मामलों पर लगातार शोधपरक और तथ्यात्मक लेख लिखने वाले, गिरीश मालवीय के एक लेख के अनुसार, “इन सारे एयरपोर्ट को अडानी के हवाले करने से पहले सरकार इनका ढांचा दुरुस्त करने के नाम पर 14,500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। देश भर में लगभग 100 से अधिक एयरपोर्ट हैं इन पर कुल 25 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई गई थी लेकिन मोदी सरकार इसमें से आधी से ज्यादा रकम उन्हीं हवाई अड्डों पर खर्च करती रही है जिन्हें या तो अडानी को सौंपा जा चुका हैं या भविष्य में उसे ही देने की तैयारी है।”

उसी लेख के अनुसार, “गुवाहाटी हवाईअड्डे पर 1,000 करोड़ रुपये की लागत से एयरपोर्ट टर्मिनल की नई इमारत का निर्माण किया गया है, इंदौर में तो पूरी तरह से नया एयरपोर्ट निर्माण किया गया है, तिरुवनंतपुरम एवं गुवाहाटी की हवाईपट्टियों के विस्तार में 100 करोड़ रुपये लगाए गए हैं, इस प्रकार 2017 से 2020 के दौरान 2,500 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की गयी है।”

यानी इन हवाई अड्डों को जनता के टैक्स से सजा संवार कर, बस अडानी ग्रुप को सौंप देने की योजना है, जैसे कि सरकार एक प्रकार से व्यापारिक दलाल की भूमिका में है। बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार के अनुसार, एयरपोर्ट अथॉरिटी कर्मचारी संघ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सूचित भी किया था कि, “मेंगलुरु, लखनऊ और अहमदाबाद एयरपोर्ट पर मौजूद एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की 1300 करोड़ रुपये की एयरोनॉटिकल और नॉन-एयरोनॉटिकल संपत्तियों को अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड को मात्र 500 करोड़ रुपये में बेंच दिया गया जबकि निजीकरण के लिए सरकार के पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी (पीपीपीएसी) से मंजूरी मांगे जाने के दौरान खुद नागरिक विमानन मंत्रालय ने इन संपत्तियों की कीमत 1300 करोड़ रुपये आंकी थी।”

लेकिन इस पत्र पर क्या कार्यवाही हुयी यह न तो सरकार से कोई पूछ रहा है, और न ही सरकार किसी को कुछ बताने ही जा रही है।

बिजनेस स्टैण्डर्ड अखबार के अनुसार प्राधिकरण के कर्मचारी संगठन ने जून में ही प्रधानमंत्री को लिखे उक्त पत्र में बताया था कि “इन हवाईअड्डों के रखरखाव का जिम्मा अडानी समूह को सौंपे जाते समय जारी निर्माण कार्यों का भुगतान निजी कंपनी को करना चाहिए, अनुबंध में इसका उल्लेख है कि निर्माणाधीन कार्यों पर आए खर्च को वहन करने के लिए अडानी उत्तरदायी हैं।”

इस लेख में यह भी कहा गया है कि “अडानी ने तीन हवाईअड्डों को सौंपे जाने के बाद 2,000 करोड़ रुपये भी जमा नहीं किए हैं अगर फौरन इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो फिर जमानत जब्त करने के साथ करार भी रद्द करने के सख्त कदम उठाने चाहिए।”

बिजनेस स्टैंडर्ड और अन्य अर्थ विशेषज्ञों के लेख के अनुसार, यह मोनेटाइजेशन स्कीम, देश की सारी सम्पदा को, कुछ चहेते पूंजीपतियों को, सारे नियम कायदे कानून तोड़कर या पूंजीपतियों के हित में उसे बदल कर, सौंप देने का एक कार्यक्रम है। नीति आयोग के पास देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने का एक ही सूत्र है, कि सब कुछ, निजी क्षेत्र या उसमे भी कुछ चुनिंदा लोगों को बेच दिया जाय। पर इस निजीकरण से देश की जनता की मूलभूत समस्याओं का समाधान और लोककल्याणकारी राज्य का उद्देश्य जो संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में प्राविधित है, कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इस पर सरकार भी मौन है और सत्तारूढ़ दल भी।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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