Monday, January 24, 2022

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महिलाओं की निजता पर आपराधिक हमला है बुल्ली बाई प्रकरण

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निजता, मौलिकता की पहली अनिवार्य शर्त है जो मौलिक और सार्वभौमिक है। आज़ादी को 75 वर्ष बीत चुके हैं। 75 वर्ष बाद भी हम देश की आधी आबादी को उनके अधिकार नहीं दिला पाए। संसदीय कार्यपालिका में महिलाओं की आधी भागीदारी के हिमायती सत्ता के चारासाज भले ही लम्बी- लंम्बी क्यूं न हांक लें? लेकिन सच ये है कि अपने ही देश में माताएं-बहनें सुरक्षित नहीं हैं। बुली बाई एप के द्वारा मुस्लिम महिलाओं की निजी स्वतंत्रता में सेंधमारी यही दर्शाती है। 

अनुच्छेद-21 जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है। न्यायपालिका पहले भी कई निर्णयों के माध्यम से इसके दायरे का विस्तार कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में जस्टिस केएस पुटृस्वामी बनाम भारत संघ में संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का दर्जा दिया। कहा गया कि, जब निजता भी मौलिक अधिकार का हिस्सा बन गई है तो अब कोई भी नागरिक अपनी निजता के हनन की स्थिति में याचिका दायर कर न्याय की मांग कर सकता है। इस निर्णय सुनाने वाली पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ़. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल थे।

निजता के अधिकार को लेकर बहस तब तेज़ हुई जब सरकार ने आधार कार्ड को ज़्यादातर सुविधाओं के लिए ज़रूरी बनाना शुरू कर दिया था।सुप्रीम कोर्ट में 2015 में सरकारी वकीलों की तरफ़ से तर्क दिया गया कि हो सकता है कि आधार लोगों की निजता में दखल देता हो, लेकिन क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? सरकार का इस बारे में तर्क था कि इसका संविधान में भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है। खैर, यह एक संवैधानिक अधिकार की बात है। हम समाज के अंग हैं, इस नाते समाज के प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं। आखिर हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं? जिस उम्र के बच्चों के हाथों में क़लम- दवात होनी चाहिए थी, वो मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों की बोली लगवा रहे हैं।

जिन बच्चों को कल देश की तामीर लिखनी है, साम्प्रदायिकता की द्वेष भावना में आज वो कुकर्मों पर उतर आए।

द्वेषपूर्ण मानसिकता की तीव्रता स्वानुभूत है। यह पहली दफा नहीं हुआ जब किसी की निजता हनन करने के प्रयास किए गए हों। याद हो कि, पिछले वर्ष जुलाई 2021 में, पेगासस नामक निगरानी स्पाइवेयर कम्पनी के द्वारा भी प्राइवेसी पॉलिसी को खंडित किया गया था जिसमें मानवाधिकार रक्षकों, पत्रकारों, वकीलों, सरकारी अधिकारियों और विपक्षी राजनीतिज्ञों समेत 300 भारतीय फोन नंबर लीक हुए थे।

सवाल केवल यही नहीं कि मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा में सेंधमारी की जा रही है, बात मानसिकता की भी है जिसने समाज को विभक्त करके रख दिया है। जहां धर्म सभा के नाम पर देश में विष घोला जाता हो, जिस देश में, फूहड़ता और कदाचार के लिए पुरस्कार दिये जाएं आखिर वहां नैतिकता कैसे टिक सकती है? जिस तरह की मानसिक फूहड़ता राजनीतिक पार्टियों के द्वारा फैलाई जा रही है उससे देश में लंपट, धूर्त और वंचक पैदा हो रहे हैं केवल यही नहीं इसका असर मानसिक स्वास्थ्य, दिमाग और समाज पर भी पड़ रहा है। 

कुंठित साम्प्रदायिकता क्या नहीं करा सकती? कुपठित विद्या विष के समान होती है। सवाल यह है कि इतनी नृशंसता, कट्टरपंथियों में आती कहां से है? कहीं यह एथेंस और स्पार्टा की ही तर्ज़ पर लोकतंत्र और अधिनायक वादी विचारधाराओं के मध्य द्वंद तो नहीं। जैसे एथेंस, लोकतंत्र का गवाह बना वहीं स्पार्टा अधिनायकवाद का। आमतौर पर भारत में बुद्धिपक्षता की आलोचना की जाती रही है ठीक वैसे ही जैसे स्पार्टा ने बुद्धि पक्ष की अवहेलना की।

 (लेखक प्रत्यक्ष मिश्रा स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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